Monday, December 28, 2009

राससुन्दरी दासी के बहाने स्त्री आत्मकथा पर चर्चा


राससुन्दरी दासी की आत्मकथा 'आमार जीबोन' नाम से सन् 1876 में पहली बार छपकर आई। जब वे उनसठ बरस की थीं तो इसका पहला भाग लिखा था। 88 वर्ष की उम्र में राससुन्दरी देवी ने इसका दूसरा भाग लिखा। जिस समय राससुन्दरी देवी यह कथा लिख रही थीं, वह समय 88 वर्ष की बूढ़ी विधवा और नाती-पोतों वाली स्त्री के लिए भगवत् भजन का बतलाया गया है। इससे भी बड़ी चीज कि परंपरित समाजों में स्त्री जैसा जीवन व्यतीत करती है, उसमें केवल दूसरों द्वारा चुनी हुई परिस्थितियों में जीवन का चुनाव होता है। उस पर टिप्पणी करना या उसका मूल्यांकन करना स्त्री के लिए लगभग प्रतिबंधित होता है। स्त्री अभिव्यक्ति के लिए ऐसे दमनात्मक माहौल में राससुन्दरी देवी का अपनी आत्मकथा लिखना कम महत्तवपूर्ण बात नहीं है। यह आत्मकथा कई दृष्टियों से महत्तवपूर्ण है। सबसे बड़ा आकर्षण तो यही है कि यह एक स्त्री द्वारा लिखी गई आत्मकथा है। स्त्री का लेखन पुरुषों के लिए न सिर्फ़ जिज्ञासा और कौतूहल का विषय होता है वरन् भय और चुनौती का भी। इसी भाव के साथ वे स्त्री के आत्मकथात्मक लेखन की तरफ प्रवृत्ता होते हैं। प्रशंसा और स्वीकार के साथ नहीं; क्योंकि स्त्री का अपने बारे में बोलना केवल अपने बारे में नहीं होता बल्कि वह पूरे समाजिक परिवेश पर भी टिप्पणी होता है। समाज को बदलने की इच्छा स्त्री-लेखन का अण्डरटोन होती है। इस कारण स्त्री की आत्मकथा चाहे जितना ही परंपरित कलेवर में परंपरित भाव को अभिव्यक्त करनेवाल क्यों न हो, वह परिस्थितियों का स्वीकार नहीं हो सकता; वह परिस्थितियों की आलोचना ही होगा

राससुन्दरी की आत्मकथा में कई ऐसी चीजें हैं जो अत्यंत साधारण लगते हुए भी विशिष्ट हैं। पहले पाठ में यह आत्मकथा एक ऐसी संतुष्ट स्त्री की कहानी लगती है जो अपने घर-परिवार, घर में मिले लाड़-दुलार, सामाजिक हैसियत, बेटे-बेटियों और पोते-पोतियों, नाती-नातिनों के साथ, भरे-पूरे परिवार के बीच एक गृहस्थ स्त्री की साध भरी दुनिया में संतुष्ट है। विश्लेषण-वर्णन का अद्भुत तरीका अपनाया है राससुंदरी देवी ने! स्त्री भाषा का एकदम आदर्श नमूना ठण्डी, निरुद्वेग और किसी भी तरह की चापलूसी से रहित! न शिकायत है न आरोप -प्रत्यारोप! फिर भी स्त्री के पक्ष से सारी बातें कह जाती हैं।

सबसे पहले मैं स्त्री आत्मकथा लेखन की दिक्कतों के बारे में कुछ कहना चाहती हूँ। यह पहली बार हुआ कि 19वीं सदी के आरंभ में स्त्री लेखन और स्त्री आत्मकथात्मक लेखन दोनों सामने आते हैं। चूंकि स्त्री लेखन का संसार उसके अनुभव के संसार से ही शुरु होता है, इसलिए स्त्री के आरंभिक लेखन में स्त्री के अनुभव का संसार अति परिचय की हद तक शामिल है। घर -परिवार, पति-बच्चे, घरुआ वातावरण और इसके भीतर के शक्ति संबंधों की दुनिया सब इतनी ज्यादा पहचानी हुई लगती है कि वह महत्तवहीन हो जाती है। ध्यान रखना चाहिए कि महत्तवहीन या महत्तवपूर्ण साबित करने का काम स्त्री लेखिका नहीं बल्कि पुंसवादी लेखकीय मानदण्डों के आधार पर पुरुष आलोचक लेखक करता है। ऐसे में स्त्री के अस्तित्व को लेकर उसकी के प्रति जो उपेक्षाभाव घर और समाज में होता है, उसी की झलक विचारों और लेखन की दुनिया में भी दिखाई देती है। हिन्दी आत्मकथात्मक साहित्य का आलम यह है कि साहित्येतिहास की पुस्तकों में पहले भारतेन्दु की रचना 'कुछ आपबीती कुछ जगबीती' को हिन्दी की पहली आत्मकथा लेखन का प्रयास कहा गया और फिर जब तक बनारसीदास के 'अर्ध्दकथानक' को नहीं खोज लिया गया, आत्मकथा लेखन की शुरुआत नहीं मानी गई। जबकि स्त्रियों द्वारा लिखे गए आत्मकथात्मक गद्य के नमूने पहले भी मिलते हैं, लेकिन उन पर आत्मकथा की कोटि के तहत विचार नहीं किया गया।

मैं विधा के रूप में आत्मकथा के जेनर पर पहले बात करना चाहती हूं। आत्मकथा के विधा की जिस रूप में संरचना तय की गई है, वह अपने आप में बहिष्कारमूलक और समस्यामूलक है। यह महाकाव्य की तरह है जिसके लिए एक महान् नरैटिव और आदि-अंत का बखान जरुरी है। साथ ही विषय से दूरत्व का बोध भी जरुरी है। जितनी दूर का विषय होगा, उतनी शानदार प्रस्तुति होगी, पर मुश्किल यह है कि स्त्री लिखते समय अपने से दूरी नहीं बनाए रख सकती। स्त्री वर्तमान से गहरे संपृक्त होती है। अतीत उसका नहीं है। अतीत पर उसका नियंत्रण भी नहीं है। इस कारण लिखते समय वह वर्तमान की समस्याओं और जटिलताओं का विश्लेषण प्रस्तुत करती है। बिना ऐसा किए वह रह नहीं सकती। कारण कि जिन सामाजिक-राजनीतिक असंगतियों को वह झेलती है लिखते समय उसका विश्लेषण न करे, यह संभव नहीं है। स्त्री के सामने आत्मकथा लिखते समय अजीब द्वन्द्व की स्थिति होती है। जिसके बारे में लिख रही होती है, वह वो स्वयं होती है; जिस औजार के जरिए लिख रही होती है यानि भाषा उसमें उसके अपने अनुभव के शब्द नहीं होते। संसार को नामित करने की प्रक्रिया से वह बाहर होती है। इन सबसे मुश्किल स्थिति यह है कि वह जब तक आत्मकथा लेखन में 'सब्जेक्ट' की भूमिका में नहीं होगी, तब तक वह नहीं लिख सकती। स्त्री को 'सब्जेक्ट' की भूमिका में कभी देखा ही नहीं गया है; वह रचना में, भाषा में, समाज में ऑब्जेक्ट ही रही है।आत्मकथा 'सेल्फ' के उद्धाटन का क्षेत्र है। स्त्री के स्व को समाज और भाषा में इतनी पाबंदियों के बीच रखा गया है कि उसका ठीक ठीक बाहर आना संभव नहीं है। विखण्डन, बिखराव, टूट-फूट, असंगतियाँ इसकी विशेषता है। तो आत्मकथा का जो महाख्यानमूलक रूप है, स्त्री की आत्मकथा उसके आस-पास भी नहीं ठहरती पुरुष आत्मकथाओं में परिवेश का चित्रण उसकी महानता और गरिमा के साथ एक महान् कहानी को निर्मित करने के लिए होता है। साधारण परिवेश का गरिमापूर्ण चित्रण पुरुष 'सब्जेक्ट' के साथ द्वन्द्वात्मक और संघर्षपूर्ण रूप में दिखाया जाता है और आत्मकथा के अंत तक जाते-जाते साबित कर दिया जाता है कि पुरुष का अपने परिवेश पर नियंत्रण है। वह परिस्थितियों का दास नहीं, उनका मालिक हैं। वहाँ गरीबी जैसी डरानेवाली चीज भी पुरुष को उसकी महानता और लक्ष्य से भटका नहीं सकती। गरीबी में स्त्रियाँ बिक सकती हैं, उनकी देह और आत्मा सीधे इसका शिकार बनती है, पर पुरुष के लिए वह चुनौतियों का सृजन करती है जिसके पार उसकी महानता का संसार उसकी प्रतीक्षा में है। इसलिए गरीबी वहाँ 'गरबीली' होती है। 'पुरुष क्या श्रृंखला को तोड़ करके, चले आगे नहीं जो जोर करके' ! (दिनकर, रश्मिरथी)

Thursday, December 17, 2009

हिन्दी के भाषाविद् स्त्रीभाषा कब पढाएँगे ?




                    हिन्दी के भाषाविद् स्त्रीभाषा कब पढाएँगे ?


   आज सारे भारत में उच्च शिक्षा के स्तर पर सेमेस्टर प्रणाली लागू करने की कवायद चल रही है। यू जी सी का दबाव है और दण्डानुशासन जनित भय भी कि लगभग हर विश्वविद्यालय का प्रशासन इसे लागू करने की प्रक्रिया आरंभ कर चुका है। इस प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है पाठ्यक्रम में बदलाव। अब तक का जो पाठ्यक्रम चला आया है , जिसे पढकर मेरी पीढी और मेरी माँ की पीढ़ी बडी हुई है ,उससे स्त्री की कोई छवि निर्मित नहीं होती। बारह चौदह वर्ष की पढाई करने के बाद अगर प्रश्न किया जाए कि हमने जो अध्ययन किया उसके आधार पर बताएँ कि स्त्री कैसी थी, उसका संसार कैसा था, वह कैसे सोचती थी तो उत्तर नकारात्मक होगा। न तो इतिहास, न भाषा का अध्ययन,  न खानापूर्ति के अलावा समाजशास्त्र स्त्री के बारे में कुछ बताता है।
  समाज में पुरूषों की भूमिका वर्चस्वशाली रूप में है। पुरू हमेशा ज्ञान, दर्शन और साहित्य के केन्द्र में रहे हैं। वे हमेशा से इस सामाजिक स्थिति में रहे हैं कि पुरू श्रेष्ठता का मिथ निर्मित कर सकें और इसे स्वीकार भी करवा सकें। इस झूठ को पुष्ट करने के लिए अपनी श्रेष्ठता के पक्ष में प्रमाण जुटा सकेंयह ऐसा मिथ है जिस पर हमला तो किया जा सकता है लेकिन जिसका उन्मूलन संभव नहीं है क्योंकि इसकी जड़ें सामाजिक बुनियाद में हैं। सामाजिक तानाबाना इस झूठ को बनाए रखने, इससे सहयोग करने के पक्ष में है।
  स्त्रियाँ अपने सत्य का निर्माण जिस रूप में करत हैं या करने के लिए उत्प्रेरित किया जाता है उमें भाषा के स्वैच्छिक नियमों की अहम भूमिका होती है। सत्य के निर्माण का एक अहम हिस्सा भाषा है। भाषा इस दुनिया को वर्गीकृत और व्यवस्थित करने का माध्यम हैयह सत्य को मैनीपुलेट करने का माध्यम भी है। भाषिक बनावट और भाषिक व्यवहार के माध्यम से ही हम अपनी दुनिया को वास्तविक बनाते हैं और अगर बुनियाद में ही गड़बड़ी है तो भ्रम के शिकार होते हैं। भाषिक नियम जो सांकेतिक व्यवस्था हैं, यदि गलत हैं तो रोजाना धोखा खाते हैं।
    ्त्री हीनता के नियम भाषा में कैसे काम करते हैं देखना हो तो भाषा विज्ञान के परंपरित पाठ्यक्रम को विश्लेशित करना दिलचस्प होगा। एक उदाहरण लें। भाषा से संबंधित किसी भी अध्ययन के पुरोधा हैं सॉस्यूर। सॉस्यूर भाषा अर्थ संबंधी नियम को स्वाभाविक मानते हैं। ये नियम संसार में मौजूद हैं और उन्हें केवल अर्थ के जरिए खोजा जाना है। इस तरह से भाषा के इतिहास को सहज, स्वाभाविक और वैध मानते हैं।
  भाषाविज्ञान के एक अन्य पुरोधा येस्पर्सन ने अपनी पुस्तक में 'द वुमेन ' शीर्षक एक अध्याय लिखा और उसमें उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि स्त्रियाँ भाषा के व्यवहार के संबंध में पर्देदारी और अप्रत्यक्ष अभिव्यक्ति को प्रमुखता देती हैं। येस्पर्सन ने दंभ के साथ उदघोषणा की कि ने यदि हमने अपने को स्त्रियों की दुर्बल अभिव्यक्ति वाली भाषा के अनुकरण में लगा दिया तो यह भाषा के लिए गंभीर खतरा होगा! येस्पर्सन ने कहा कि जो और खरी अभिव्यक्ति का एक अर्थ होता है और चूँकि स्त्रियों में यह गुण नहीं होता अत: उनकी भाषा एक खतरा है।
   कुछ भाषाविद इस निष्क्ष पर पहुँचे हुए जान पड़ते हैं कि भाषा पुरू की होती है। यह एक पुंसवादी संरचना है। वे सहज ही यह मानते हैं कि पुरू ही भाषा का निर्माता और आविष्कर्ता है। मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय दृष्टि से भाषा का अध्ययन करनेवालों ने भी भाषा के निर्माण में स्त्री की किसी तरह की भूमिका को अस्वीकार किया। स्त्रियों के पास जो कुछ है वह पुरूषों का अनुकरण है या उनसे चुराया गया है। स्त्रीवादी भाषाविदों के लिए यह एक असहज स्थिति है जिसमें भाषा को पुरू संपत्ति के रूप में देखा जाता है। यह लैंगिक पूर्वाग्रह है। स्त्रियाँ चूँकि भाषा का इस्तेमाल करती हैं, अत: यह केवल पुरू संपत्ति नहीं हो सकती लेकिन पितृसत्ताक समाज में पुंसवादी वर्चस्व को देखते हुए यह भी उतना ही सच है कि स्त्रियाँ अपने को पुरू र्तों पर अभिव्यक्त करने के लिए बाध्य हैं। इस तरह से स्त्री हमेशा अन्य और उधारलेनेवाली ,कर्जखोर बनी रही। इस उधार की पूँजी ने स्त्री को कभी भाषा का क्तिशाली प्रयोक्ता नहीं बनने दिया। बल्कि इसके उलट स्त्री द्वारा पुरू भाषा के प्रयोग ने पुरूभाषा को और भी मजबूती प्रदान क
  सैंकडों बरस के शिक्षा के इतिहास में भाषा को कभी स्त्री के सन्दर्भ में नहीं देखा गया। न ही भाषा के निर्माण में स्त्री की किसी तरह की भूमिका का विश्लेषण किया गया। क्या पूरे हिन्दुस्तान के विश्वविद्यालयों में चल रहे पाठ्यक्रम परिवर्तन की कवायद में किसी भी जगह इस पर विचार किया जाएगा ?
लेखिका- सुधा सिंह , स्त्रीवादी आलोचिका

Friday, December 11, 2009

मुसलमान विरोधी ग्लोबल मीडिया -1-




फिलिस्तीन के साथ भूमंडलीय माध्यमों का रिश्ता बेहद जटिल एवं शत्रुतापूर्ण रहा है।कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिन पर ध्यान देने से शायद बात ज्यादा सफ़ाई से समझ में आ सकती है।ये तथ्य इजरायली माध्यम शोर्धकत्ताओं ने नबम्वर 2000 में प्रकाशित किए थे। शोर्धकत्ताओं ने इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष की खबर भेजने वाले संवाददाताओं का अध्ययन करने के बाद बताया कि इजरायल में 300 माध्यम संगठनों  के प्रतिनिधि इस संघर्ष की खबर देने के लिए नियुक्त किए गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में संवाददाता किसी मध्य-पूर्व में अन्य जगह नियुक्त नहीं हैं। मिस्र में 120 विदेशी संवाददाता हैं।इनमें से दो-तिहाई पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका से आते हैं। इनमें ज्यादातर संवाददाता वैस्ट बैंक और गाजा पट्टी से अंग्रेजी में खबर देते हैं।चूंकि खबर देने वाले संवादाता इजरायल में रहकर खबर देते हैं यही वजह है कि इनकी खबरें इजरायली दृष्टिकोण से भरी होती हैं।इनमें अधिकांश संवाददाता यहूदी हैं।ये वर्षों से इजरायल में रह रहे हैं।औसतन प्रत्येक संवाददाता 10 वर्षों से इजरायल में रह रहा है।अनेक की इजरायली बीबियां हैं।अनेक स्थायी तौर पर ये काम कर रहे हैं।चूंकि इन संवाददाताओं की मानसिकता पश्चिमी है अत: इन्हें इजरायल से अपने को सहज में जोड़ने में परेशानी नहीं होती। 91प्रतिशत संवाददाताओं का मानना है कि उनकी इजरायल के बारे में 'अच्छी'(गुड) समझ है।जबकि इसके विपरीत 41 प्रतिशत का मानना है कि अरब देशों के बारे में उनकी 'अच्छी' (गुड) समझ है।35 प्रतिशत का मानना है कि उनकी 'मीडियम' समझ है।ये जूडिज्म के बारे में ज्यादा जानते हैं, 57 प्रतिशत ने कहा कि वे जूडीज्म के बारे में 'अच्छा' जानते हैं।जबकि मात्र 10 फीसदी ने कहा कि वे इस्लाम के बारे में 'अच्छा' जानते हैं।ये संवाददाता अरबी की तुलना में हिब्रू अच्छी जानते हैं:54 फीसदी को हिब्रू की अच्छी जानकारी है जबकि 20 फीसदी को काम लायक ज्ञान है।इसके विपरीत मात्र 6 प्रतिशत को अरबी का अच्छा ज्ञान है।मात्र 42 फीसदी संवाददाताओं को अरबी थोड़ा सा ज्ञान है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंग्रेजी समाचार एजेन्सियों केलिए चंद इजरायली संवाददाता लिखते हैं।फिलिस्तीन के बारे छठे-छमाहे खबर दी जाती है।फिलिस्तीन के बारे में उनके इलाकों में गए वगैर खबर देदी जाती है।सबसे बुरी बात यह कि इस इलाके में होने वाली घटना के बारे फिलिस्तीनियों की राय जानने की कोशिश तक नहीं की जाती।ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि क्या फिलिस्तीन-इजरायल संघर्ष की वस्तुगत प्रस्तुति संभव है।
             भूमंडलीय माध्यम ज्यों ही आतंकवाद को इस्लामिक फंडामेंटलिज्म से जोड़कर बात करते हैं तो जाने-अनजाने इसके दुष्प्रभावों को दुनियाभर के मुसलमानों को झेलना पड़ता है। आतंकवाद चाहे वह किसी भी रुप में व्यक्त हो मूलत: राजनीतिक केटेगरी है। उसे धर्म से जोड़ना ठीक नहीं है। 11सितम्बर के आतंकवादी हमले की खबरें ज्यों ही आनी शुरु हुईं तत्काल यह खबर भी आयी कि न्यूयार्क से एशियाई मूल के ड्राईवर गायब हो गए। अमरीका में रहने वाले 80 लाख मुसलमान भयाक्रांत हो गए।किन्तु भूमंडलीय माध्यमों को इनकी कोई चिन्ता नहीं थी बल्कि अनेक जगहों पर मुसलमान समझकर सिखों पर जानलेवा हमले हुए।सोचने लायक बात है कि जब भी अमरीका में आतंकवादी हमला होता है तो तत्काल मुसलमानों से पूछा जाता है कि आपकी क्या राय है ?यहां तक कि उत्तरी आयरलैंड में आतंकवादी हमले के बारे में भी मुसलमान से पूछा जाता है कि उसकी राय क्या है ? जबकि सच यह है कि उत्तरी आयरलैंड में निरन्तर हिंसा हो रही है किन्तु किसी भी कैथोलिक से यह नहीं पूछा जाता कि उसकी राय क्या है ?प्रश्न उठता है कि क्या माध्यम भी राय लेते समय धार्मिक अस्मिता का ख्याल करता है
          आमतौर पर भूमंडलीय माध्यम धार्मिक अस्मिता का ख्याल रखते हैं।इसके लिए वे स्टीरियोटाईप प्रस्तुतियों पर जोर देते हैं।स्टीरियोटाईय प्रस्तुतियों के माध्यम से उसकी वैचारिक प्रकृति को छिपाया जाता है। इस तरह की प्रस्तुतियों में मुख्य जोर इस बात पर रहता है कि वह किसका एजेण्ट है ?जिसका एजेण्ट है उसने क्या दिया और क्या कहा ?ओसामा बिन लादेन के बारे में विभिन्न माध्यमों में जो जानकारियां पस्तुत की गयी हैं उनमें मूलत: इन्हीं बातों का विवरण है।इन पस्तुतियों से उसकी वैचारिक प्रकृति गायब है।
     प्रसिध्द माध्यम विशेषज्ञ एम.सी.वासीउनी के अनुसार स्टीरियोटाईप इमेज अंतत: दर्शक और आतंकवादी के बीच सहिष्णुभाव पैदा करती है।इस तरह की प्रस्तुतियों का समाज में व्यापक प्रभाव पड़ता है।पहला,आतंक हिंसा की गतिविधिय को मिलने वाले महत्व से अन्य को वैसी ही कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करती है।
     दूसरा,ज्यादा माध्यम कवरेज से यह संभव है कि राज्य के उत्पीड़न में इजाफा हो।यही स्थिति आतंकवादी पैदा करना चाहते हैं।इससे उन्हें अपने लक्ष्य के विस्तार में मदद मिलती है।इस तरह वे राज्य के उत्पीड़न को आमंत्रित करते हैं।जिसका आम जनता के ऊपर बुरा असर होता है।
      तीसरा,आतंकवाद का नियमित या विस्तृत कवरेज आम जनता के अंदर भावशून्य स्थिति पैदा करता है।लेकिन कुछ माध्यम विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि माध्यम कवरेज 'सेफ्टी वाल्ब' की भूमिका अदा करता है।
           माध्यम कवरेज से पैदा होने वाली भावशून्यता से आम जनता में सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है।वह आतंक और हिंसा को सच्चाई के रुप में देखने लगती है।नैतिक और राजनीतिक तौर पर उसके अन्दर प्रतिरोध का भाव खत्म होने लगता है।सामाजिक तौर पर भावशून्यता की स्थिति पैदा हो जाती है।यह वस्तुत: हिंसा की प्रकृति का विस्तार ही है।भावशून्यता की स्थिति पैदा करने में एक और तत्व मदद करता है वह है आतंकवादी को आतंकवादी की बजाय किसी और नाम से पुकारना।

मसलन् ओसामा बिन लादेन को आतंकवादी न कहकर 'जेहादी' ,'फ्रीडम फाइटर','तालिबान' या इसी तरह का कोई और नाम से जब पुकारा जाता है तो हम उसको जनता से जोड़ने और आतंकवादी गतिविधियों को वैधता प्रदान करने  का काम करते हैं।इसी तरह यदि आतंकवादी को सामाजिक नियंत्रण से परे रुपायित किया जाये तब भी भावशून्य स्थिति का निर्माण होता है।आतंकवादी गतिविधियों को अमूर्त या निर्वैयक्तिक रुप में प्रस्तुत करने से भी भावशून्य स्थिति का निर्माण होता है।आतंकवादी कार्रवाई को सिर्फ 'नुकसानदेह' घटना के रुप में प्रस्तुत करने से भी भावशून्य स्थिति का निर्माण होता है। भावशून्य या संवेदनहीन हो जाने के कारण हिंसा का स्तर बढ़ जाता है,आतंकवादी प्रभाव में वृध्दि हो जाती है,पहले से ज्यादा लोग शिरकत करने लगते हैं।
      
 आतंकवादी हिंसा का एक सिरा हिंसाचार से जुड़ा है तो दूसरा सिरा माध्यमों में प्रस्तुत हिंसा एवं आतंक के कार्यक्रमों से जुड़ा है।आतंकवाद पर नियंत्रण हासिल करने के लिए जरुरी है कि जनमाध्यमों में धर्म,हिंसा और आतंक के कार्यक्रमों पर अंकुश लगाना जरुरी है वहीं दूसरी ओर आतंकवाद के वैचारिक स्रोत पर भी पाबंदी लगाने के बारे में विचार किया जाना चाहिए।वे तमाम कार्यक्रम जो पुरानी मान्यताओं,आचार-व्यवहार,संस्कारों आदि को धारावाहिकों के जरिए प्रसारित करते हैं उनसे आतंकवाद और तत्ववाद को वैचारिक मदद मिलती है। जब तक इस क्षेत्र में प्रभावी कदम नहीं उठाए जाते तब तक आतंकवाद या तत्ववाद को वैचारिक तौर पर परास्त करना असंभव है।संस्कृति-उद्योग के विकास की गति देखते हुए और बहुराष्ट्रीय पूंजी के हितों को देखते हुए यह कार्य असंभव लग रहा है।फिर भी इस दिशा में प्रयास करना चाहिए।
( लेखक - जगदीश्वर चतुर्वेदी )

Sunday, December 6, 2009

भाषा में स्त्री के अनुभव


                  
 एन्द्रीने रीच ने लिखा है ''स्त्री संघर्ष का समस्त इतिहास सदियों से चुप्पी में डूबा हुआ है। किसी भी स्त्रीवादी लेखिका के लिए सबसे बड़ी सांकृतिक बाधा यह आती है कि प्रत्येक स्त्रीवादी लेखन किसी शून्य से पैदा हुआ जान पड़ता है; जैसे कि हममें से प्रत्येक बिना किसी ऐतिहासिक अतीत, संदर्भयुक्त वर्तमान के जीते, सोचते और काम करते हैं। यह उन कई रास्तों में से एक है जिनमें स्त्री के काम को विच्छिन्न, अनियमित और अपनी किसी भी परंपरा से यतीम मान लिया जाता है।''
    ऐतिहासिक तौर पर स्त्रियाँ किसी भी तरह के सांस्कृतिक उत्पादन से बाहर रखी गईं। भाषा संस्कृति का सबसे अहम हिस्सा है। चूँकि स्त्रियाँ उत्पादन में शामिल न होकर सिर्फ उसकी प्रयोगकर्ता हैं इसलिए वे अपने सांकेतिक अर्थ को प्रमुखता देने में असमर्थ हैं। स्त्री और पुरू दोनों ही अर्थ उत्पन्न करने की क्षमता रखते हैं लेकिन स्त्रियाँ इस स्थिति में नहीं रहीं कि उनके द्वारा दिए गए अर्थ को सामाजिक तौर पर मान्यता मिल सके। वे कभी सार्वजनिक क्षेत्र का हिस्सा नहीं रहीं, संस्कृति की निर्मात्री भी नहीं रहीं। यदि वे कोई अपना अर्थ निर्मित करने की कोशिश भी करती हैं जो पुरू के दिए गए अर्थ से भिन्न हो तो अस्थायी होता है और जल्दी ही नष्ट हो जाता है। सामाजिक पहचान निर्मित करने के जितने भी क्षेत्र हैं उनमें स्त्रियाँ कहीं नहीं हैं। जैसे वे प्रभावशाली दार्शनिक नहीं हैं, राजनेता या प्रवक्ता नहीं हैं, वैयाकरणिक नहीं हैं,भाषाविद् या शिक्षक नहीं हैं और उनके पास वैसा अवसर भी नहीं है कि वे भाषा को प्रभावित कर सकें, संसार की वस्तुओं और टनाओं को परिभाषित करने के लिए नया अर्थ चालू कर सकें। इसका यह अर्थ यह नहीं है कि स्त्रियाँ दार्शनिक नहीं हुईं हैं, भाण नहीं दिया है, कविताएँ नहीं लिखी हैं ,भाषा के सिध्दान्त नहीं जानतीं वे सब कुछ जानती हैं लेकिन केवल यह साबित करने के लिए कि उनकी प्रतिभा का प्रवाह बहुत सीमित है। प्राय: एक पीढी क़ी स्त्री लेखिकाएँ दूसरी पीढ़ी के लिए अनजानी होती हैं। कोई श्रृंखलाबध्दता नहीं है इसलिए प्रत्येक पीढ़ी को नए से शुरु करना पड़ता है। पहले क्या घट चुका है बिना यह जाने हुए।
 स्त्रियों ने उतना ही इतिहास रचा है जितना कि पुरूषों ने लेकिन इसे सूत्रबध्द और प्रसारित नहीं किया गया। स्त्रियों ने शायद उतना ही लिखा जितना कि पुरूषों ने, लेकिन इसे संरक्षित नहीं किया गया और स्त्रियों ने उतने ही अर्थ पैदा किए जितने कि पुरूषों ने पर ये बचे नहीं। स्त्री का जो अर्थ पुरू-सत्य के मेल में नहीं था उसे नहीं बचाया गया। पुरु अनुभव के संचित अर्थ हमें दायरूप में मिले हैं जबकि हमारी स्त्री पूर्वजाओं के अर्थ लगातार विस्मृत होते रहे। अर्थ और नाम मनुष्य से पहले नहीं बने हमने उन्हें बनाया लेकिन उनमें से बहुत कम को बचा कर रख पाए। यह पुरू थे जिन्होंने संसार का नामकरण किया है। यह बहुत स्वाभाविक है कि जिन्होंने नामकरण किया है अपने हित को ध्यान में रखकर किया है। अपने को संदर्भ बनाकर किया है, अपने को केन्द्र में रखकर किया है, अपने संबंध से संसार का नामकरण किया है। यह नामकरण पक्षपातपूर्ण और गलत है क्योंकि आधे अधूरे नाम और उनके आधे अधूरे अर्थ हैं। कोई अलग नाम कोई अलग अर्थ जो स्त्रियों ने देने चाहे होंगे नहीं देने दिए गए परिणामत: स्त्रियाँ और उनके अनुभव अदृश्य कर दिए गए। जब हम स्त्री के अर्थों की खोज भाषा में करते हैं तो एक गहरी चुप्पी पाते हैं





 स्त्री अनुभवों के भाषा में रूपान्तरण की प्रक्रिया पर गौर करें तो देखेंगे कि सीधे स्त्री से जुड़े अनुभव का नामकरण भी स्त्री-अर्थ में नहीं होता। स्त्रियों के लिए जीवन का सबसे कठिन समय मातृत्व का होता है। उनके लिए यह दूसरा जीवन होता है। लेकिन मातृत्व का एक ही अर्थ प्रचलन में है कि माँ बनना एक सुखद अनुभव है। यह भी एक अर्थ हो सकता है लेकिन ऐसा नहीं है कि इसके उलट अनुभव और अर्थ नहीं रहे होंगे। ज्यादातर स्त्रियों के लिए मातृत्व का एकदम दूसरा अर्थ होगा। ऐसी स्त्रियों ने मातृत्व के संबंध में वैकल्पिक और विरोधी अर्थ और नाम पैदा किए होंगे लेकिन बिना अधिकार और किसी प्रकार की वैधता  के। उन स्त्रियों जिनके लिए मातृत्व न तो खुशी और न ही सुंदर अनुभव है के संदर्भ में महत्वपूर्ण सवाल उठ खड़ा होता है। उनके अनुभवों का कोई संदर्भ नहीं मिलता, कहीं से यह बात सत्य नहीं लगती कि मातृत्व कोई दुखद अनुभव है। परिणामत: उन्हें आसानी से अनुचित ठहराया गया। यह एहसास कराते हुए कि उन्हीं में कुछ गड़बड़ी है क्योंकि उनका अर्थ मान्य अर्थ से नहीं मिलता ! यह उन पर चुप रहने का दबाव भी बनाता है।





 यदि वे स्वीकृत से भिन्न अर्थ को बयान करती हैं तो उन्हें असामान्य करार दिया जा सकता है। स्त्री स्वच्छया अपने 'स्नायु रोग ' का प्रदर्न करने और 'अस्वाभाविक' का तमगा पहनने नहीं जाती। जब तक कि स्त्री सचेतनता न हो। अत: ज्यादातर स्त्रियों के लिए बेहतर चुनाव है कि वे अपने अनुभवों और मातृत्व की अवधारणाओं को दूसरी पीढ़ी को न बाँटें।
 स्त्री अनुभव की श्रृंखला इस तरह टूटती है। बेटी बिना यह जाने बिना बड़ी हो जाती है कि सुंदर र सुखद मातृत्व का कोई वैकल्पिक अर्थ भी हो सकता हैवह कभी भी इस घटना के विरोधी वक्तव्य को जान नहीं पाती ! स्त्रियों ने मातृत्व के अपने विरोधी अनुभव लिखे हैं। अधिकां स्त्रियों को यह पता ही नहीं होता कि इसमें कितनी पीड़ा से गुजरना होता है। स्त्री भी स्त्री से यह छिपाती है। तर्क यह होता है कि वे दूसरी स्त्री को डराना नहीं चाहती। अधिकां औरतें बिना यह जाने कि माँ बनने में कितनी तकलीफ होती है, माँ बनने की प्रक्रिया में प्रवे करती हैं। कई बार उनकी मौत भी हो जाती है। जब ऐसी स्त्री को जो माँ नहीं बनी थी यह बताया गया कि यह एक पीड़ादायक अनुभव है तो वह चौंक गई। इस अर्थ में यनिश्चित है कि मातृत्व को स्त्री के अनुभव से देखा गया है। क्योंकि मातृत्व स्त्री के अनुभव का हिस्सा है लेकिन यह 'सही' अर्थ नहीं है, उन अनेक अर्थों में से एक है जिन्हें वैध अर्थं में जगह नहीं मिली है। यह बहुप्रचलित अर्थ भी नहीं है।
 स्त्रीवाद के विकास ने स्त्री के भीतर विश्वास और उसके अर्थों के स्वीकारे जाने की संभावनाएँ पैदा की कि अब वह अपने अनुभवों को पुरू अर्थ से भिन्न अर्थ दे सकी। लेकिन इसके साथ ही विरोध का स्वर भी तीव्र हो रहा है। कोई भी ऐसा अर्थ जो पितृसत्ता के लिए चुनौती पे करता है उसे खतरनाक माना जाता है और कई बार यह स्त्री और पुरू दोनों की तरफ से होता है, हम पुरूषों के विधि- विधान से बनाई हुई दुनिया में रह रहे हैं ,अपनी विश्व -दृष्टि का निर्माण भी उसी के अंतर्गत करते हैं। इसलिए मातृत्व जैसी नितांत स्त्री अनुभव का यह नया नामकरण 'पीड़ादायकभी गुम हो जाएगा जैसे कि अन्य अर्थ गुम गए हैं।


 संसार के अर्थ और नामकरण पुरूषों के किए हुए हैं इसलिए एक भी ऐसा अर्थ जो उन्हें तुच्छ बनाए नहीं मिलता। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा के इस खेल का पितृसत्तात्मक व्यवस्था से गहरा संबंध है। पुरू इस खेल में लंबे समय से लगे हुए हैं जबकि स्त्रियों ने उनके दिए हुए अर्थ को बरता है। स्त्रियाँ ज्ञान और भाषा दोनों क्षेत्रों में बाहर रखी गईं। पितृसत्ताक व्यवस्था में एन्द्रीने रीच के अनुसार ''यह चुप्पी और स्त्री का गायब होना है।'' ऐसी दुनिया में जहाँ भाषा और नामकरण क्ति का प्रतीक है।'' ''चुप्पी दमन है, हिंसा है।''

Friday, December 4, 2009

सीरियल में मातहत भाव




सीरियल, अखबार, विज्ञापन आदि संस्कार विकसित करते हैं। देखना चाहिए कि इनके द्वारा किन चीजों को वैधता प्रदान की जा रही है ? स्त्री की कुटिलता, दुष्टता या चालाकी महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है उसका मातहत भाव। उसका समर्पणकारी भाव। इन दो चीजों के अंतर्गत स्त्री की सारी दुनिया निर्मित की जा रही है। स्टार के जितने लोकप्रिय सीरियल हैं जैसे 'राजा की आएगी बारात', 'बिदाई : सपना बाबुल का', 'मितवा फूल कमल के' आदि में स्त्री के मातहत और समर्पणकारी भाव को वैध बनाया जा रहा है। 'राजा की आएगी बारात' की नायिका रानी के साथ साथ इस धारावाहिक के सभी स्त्री पात्र निष्क्रिय और अनुत्पादक चरित्र हैं। उनका कोई निजी स्पेश नहीं है। पति या मालिक के इर्द-गिर्द उनका संसार घूमता है। मानों वे पुरूष चरित्रों के आराम का सामान मात्र हों। किसी चरित्र में कोई विकास नहीं। स्टिीरियोटाईप ये स्त्री पात्र सिर्फ अनुकरण करती हैं। अनुगामी भाव इनका मुख्य भाव है। इनकी अपने बीच की दुनिया कुटिलता, क्षुद्रता, छल, प्रपंच से भरी हुई है। वह भी किसी बड़े उद्देश्य के लिए नहीं विशिष्ट पुरूष या स्वामी को प्रसन्न करने के लिए। यही हाल जी टी वी पर प्रसारित होनेवाले प्रमुख धारावाहिकों का है। 'अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो' , 'पवित्र रिश्ता' (जी टी वी), स्त्री , बैरिस्टर रॉय (डी डी नेशनल) आदि धारावाहिकों में यह स्थिति देखी जा सकती है। 'पवित्र रिश्ता' (जी टी वी) के प्रोमो में स्पष्ट रूप से एक युवक घोषणा करता है कि वह विवाह इसलिए करना चाहता है कि उसे एक अच्छी हाउसवाइफ चाहिए। यानि विवाह में मित्रता, प्यार, सम्मान, निजता कोई भी चीज महत्वपूर्ण नहीं है। व्यक्तित्व के विकास के अवसर महत्वपूर्ण नहीं हैं। क्योंकि किसी भी व्यवस्था में विवाह के अंतर्गत तुलनात्मक रूप से पुरूषों का स्वतंत्र स्पेश बना रहता है। ये चीजें यदि चाहिए तो स्त्री को। उसी के पक्ष से इन सब पर बात करनी होगी।
  दिक्कत यह है कि भारतीय समाज में विवाह को स्त्री के लिए पूरावक्ती कैरियर के रूप में देखा जाता है। जिसमें परिवार के अंतर्गत स्त्री की भूमिकाएँ महत्वपूर्ण होती हैं। स्त्री को विवाह के बाद विवाह के पहले के सभी संबंध , भूमिकाएँ, सामाजिक स्पेश आदि छोड़ने पड़ते हैं। अव्वल तो छुड़वा दिया जाता है या इस तरह की परिस्थितियाँ तैयार की जाती हैं कि वह स्वयं छोड़ देती है। 'कलर्स' पर प्रसारित धारावाहिक 'न आना इस देश लाडो' में एक जुझारू लड़की विवाह के बाद के सारे पारिवारिक नियमों को मानने पर बाध्य की जाती है। परिवार से बगावत करती बहू नियमविरूध्द लगती है। इसलिए इन चैनलों पर प्रसारित धारावाहिकों में जुझारू से जुझारू लड़की की बगावत की सीमा भी तय है। यह बगावत बदलाव के लिए न होकर सुधार के लिए है। 'अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो' (जी टी वी) की ललिया के चरित्र में बगावत है। उसके चरित्र में संभावनाएँ भी हैं। यह अकेला ऐसा सीरियल है जहाँ घरेलु स्त्रियाँ भारी साड़ियों और भारी गहनों से नहीं लदी हैं। ललिया की माँ और गाँव के लोगों का पहनावा स्वाभाविकता के करीब है। एक पात्र है छोटी बहू जो मेकअप की शौकीन है। अन्यथा जमींदार घराने की अन्य स्त्रियाँ सामान्य गहनों में और चरित्र के अनुकूल कपड़ों में स्वाभाविक लगती हैं। सुष्मिता मुखर्जी का चरित्र भी अपने पहनावे और अभिनय में सटीक लगता है। पर यह सीरियल अपवाद है। इसके अलावा प्राय: अन्य सभी सीरियलों में स्त्रियों के कपड़े गहनों के आधार पर नौकरानी और मालकिन का भेद करना मुश्किल है। ठीक इसी तरह से स्त्रियों की काम की जगह और कपड़ों का कोई मेल नहीं है। सोकर उठ रही हैं तो , रसोई में हैं तो, बाहर जा रही हैं तो एक जैसी वेशभूषा है। बाजार और सीरियल की दाँत काटी रोटी की दोस्ती है। सीरियल में कहानी के अनुकूल मेकअप, गहने और वस्त्र नहीं हैं बल्कि बाजार के अनुकूल हैं। सीरियल बाजार में क्या बिकेगा यह तय कर रहे हैं।
   सीरियल के स्त्री और पुरूष चरित्र पुंसवादी व्यवस्था के चौखटे में बात करते सोचते हैं। यह अभिनय और संवाद दोनों में अभिव्यक्त होता है। खानदान, परिवार, पुत्र, इज्जत आदि के दायरे में कहानी घूमती है। इन्ही चीजों की चिंता स्त्री और पुरूष दोनों को है। परिवार का मुखिया महत्वपूर्ण दर्जा रखता है। स्त्री यदि इस भूमिका में है जैसे कि 'बालिकावधू' (कलर्स) या 'ना आना इस देश लाडो'(कलर्स) तो यह स्त्रीवादी पुंसवाद की शक्ल में प्रस्तुत किया गया है। जहाँ मुखिया पुरूष है वहाँ सीरियल सीधे सीधे पुंसवादी वर्चस्व के नियमों से चलता है। उदाहरण के लिए देखें-
  '' जो हमरे खिलाफ जाता है वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता। काट के रख देते हैं हम। तुझे इसीलिए बकस रहे हैं कि तेरे पास हमरे खानदान का चश्मोचिराग है। कुल का दीपक। '' -'अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो' (जी टी वी)
 '' पापा मुझे लगता है शायद हमारे परिवार के लिए ये सबसे बड़ा इम्तिहान है। तो हम इसमें हार कैसे सकते हैं। बचपन से आप के मुँह से सुनती आई हूँ कि जीत हमेशा सचाई की होती आई है। तो फिर हम कैसे हार सकते हैं पापा ! हमेशा आप लोगों की तकलीफें दूर करने में लगे रहे तो फिर आपकी अपनी बेटी इतने समय तक तकलीफ में कैसे रह सकती है ? आप इतनी जल्दी उम्मीद क्यों छोड़ रहे हैं पापा, सब ठीक हो जाएगा। आप फिक्र मत कीजिए। मैं हूँ न। '' बेटा मैं तेरे हौसले और सचाई पर संदेह नहीं कर रहा हूँ। लेकिन पर बाप हूँ तेरा। बचपन में जब तू पेड़ से गिर जाया करती थी और तेरे घुटने में भी जरा सी चोट लग जाया करती थी तो मैं कितना बेचैन होता था। और आज जब तेरे साथ कितना कुछ हो रहा है तो मैं अपने आप को कैसे संभालँ।'' '' संभालना होगा पापा मेरे लिए संभालना होगा। बचपन में आपकी उंगली पकड़ कर चलना सीखा था और अगर आज आपने मेरी उंगली छोड़ दी न तो नहीं चल पाउंगी। (न आना इस देश लाडो, कलर्स, निदेशक- दिनेश महादेवन)
  '' मेरे से पूच्छे बिना इस फोन से हाथ लगाने की हिम्मत कैसे हुई तेरी ? तैने पता नहीं कि जब तक मैं न बोलूँ रोटी का एक टुकड़ा नहीं डाल सकती तू अपने मुँह में। याद रखना सै कि तू इस हवेली की नौकरानी सै। और इस घर की नौकरानियाँ ने मेरे से बिना पूच्छे सांस लेने की भी इजाजत नहीं है। घर की चीजें छूना तो बहुत दूर की बात सै। और तू तेरी हिम्मत कैसे हुई जे फोन इस तक पहुँचाने की ? सबसे साफ साफ कह दिया था कि इस छोरी की कोई मदद नहीं करेगा। जितना इसके लिए ये याद रखना जरूरी है उतना ही तम लोगां के लिए भी ये याद रखना जरूरी है कि ये इस हवेली की नौकरानी है बस नौकरानी।    ये तेरी पहली भूल सै। अरे एक बार की माफी तो इस हवेली के सारे नौकरां तै मिले है। बस एक बार ! आज तै एक टांग से दूसरे टांग पै खड़ी होगी तो म्हारे से पूछ कर खड़ी होगी। ना तो तन्ने भी वही सजा मिलेगी जो बाकी सबने मिले है। आई समझ में।     '' (वही)
  '' इसीलिए कहता था कि लुगाइयों को अपनी औकात में ही रहना चाहिए। अरे पाँव की जूती को कोई अपने सर पे रक्खे है के ? औरतों ने अपना हक दिलाने चली थी बेवकूफ छोरी। इब माँज्जी ने सही जगह दिखाई छोरी को। इब देखना। जे तो शुरूआत है।''  (वही)
  ''कै घूर रही सै। नजर नीच्ची राख । सुनाई न दे रहा कै तन्ने ? नजर झुका। अरे अपने खसम की ऑंखों में देखने की हिम्मत कहाँ से आ गई रे तुझमें ? समझ में न आ रया है कै तन्ने। '' (वही)
  उपरोक्त सभी उध्दरणों में परिवार केन्द्र में है। परिवार के पुराने ढाँचे को पकड़े रखने और उसमें कुछ बदलाव की इच्छा के बीच की जद्दोजहद है। 'न आना इस देश लाडो' की नायिका का नाम सिया है। यह भी प्रतीकात्मक है। परिवार के लिए आजीवन कष्ट सहने वाली स्त्री का। नायिका सिया का जो उध्दरण ऊपर दिया गया है उसमें एक स्वतंत्र लड़की का व्यक्तित्व नहीं बोलता। वह बचपन में मिले मायके के संस्कारों की बात कर रही है और सास के अत्याचारों से मुक्ति के लिए पति के आने तक इंतजार करने को बाध्य है।




                              

लोकप्रिय हिन्दी सीरियल कितने परिवर्तनकामी ?




टेलीविजन पर दिखाए जानेवाले कार्यक्रमों में सबसे ज्यादा समाचार देखा जाता है या फिर टेलीविजन धारावाहिक। ये दोनों टेलीविजन के सबसे लोकप्रिय विधारूप हैं। सबसे ज्यादा दर्शक संख्या को खींचने की ताकत इनमें है। धारावाहिक में एक कहानी चलती है जो अनंतरूपा होती है। इसी तरह से समाचार में भी सूचना पहले स्टोरी बनती है फिर खबर। खबर का ज्यादा से ज्यादा स्टोरी बनना सीरियल की विधागत लोकप्रियता का द्योतक है।


    ऐसी खबरें जिनके दृश्य मौजूद नहीं होते चाहे वे संगीन हत्या , बलात्कार या अन्य आपराधिक खबरें हों या कोई राजनीतिक अपराध से जुड़ी खबर हो , इनका नाटय रूपान्तर दिखाना भी खबर का धारावाहिकीकरण है जिसमें कहानी की भूख आम तौर पर पूरी करने की कोशिश की जाती है। कहानी के सभी आवश्यक तत्व भय, सनसनी, रोचकता, उत्सुकता, समाहार सब कुछ उसमें शामिल होता है। कहने का अर्थ यह है कि टेलीविजन के जितने विधारूप मौजूद हैं उसमें दो विधारूपों में जबर्दस्त प्रतिद्वन्द्विता है। जो चीज दर्शक और माध्यम अध्येता आसानी से महसूस कर सकता है कि इसमें बढ़त सीरियल की है।
  सबसे ज्यादा स्पॉन्सरशिप इन्हीं दो कार्यक्रमों को मिलते हैं। टेलीविजन के प्राइम टाईम में मनोरंजन चैनलों और समाचार चैनलों की होड़ाहोड़ी देखते बनती है। सीरियल के बरक्स मनोरंजनमूलक समाचारों की कई चैनलों पर भरमार होती है। संदेश के संप्रचारकों और कार्यक्रमों के प्रायोजकों के लिए यह समय सबसे मुफीद माना जाता है। इन दिनों टेलीविजन पर दिखाए जानेवाले लोकप्रिय धारावाहिकों में 'बालिकावधू' (कलर्स), 'राजा की आएगी बारात', 'बिदाई सपना बाबुल का', 'मितवा फूल कमल के' (स्टारप्लस), 'अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो', 'पवित्र रिश्ता' , 'घर लक्ष्मी बेटियाँ' (जी टी वी), ' पिया का आंगन' , 'स्त्री', 'सात वचन सात फेरे' (डी डी नेशनल) आदि हैं। इन धारावाहिकों के ट्रेण्ड को समझने की जरूरत है। क्योंकि सबसे ज्यादा इनकी दर्शकसंख्या है और सबसे ज्यादा ये प्रभाव छोड़ते हैं। 


समाचार में सूचना ग्रहण करने का भाव प्रमुख होता है जबकि सीरियल को फुर्सत का शगल माना जाता है। सवाल है कि फुर्सत के क्षणों में हम ग्रहण क्या कर रहे हैं ? हमारे दिमाग पर आराम के क्षणों में कौन सी चीज बैठाठ जा रही है और क्यों ? मनुष्यता ने लंबे समय के संघर्षों के बाद जिन आधुनिक मूल्यों को अर्जित किया है या अर्जित करने की दिशा में है उन सारी उपलब्धियों को दरकिनार तो नहीं किया जा रहा ?
  
     धारावाहिकों की विधा रूप में खासियत है कि जब भी कोई चैनल सीरियल शुरू करता है वह समाजसुधार के एजेण्डे के साथ शुरू करता है। भारत में कोई भी सीरियल खासकर हिन्दी का सीरियल समाजसुधार के एजेण्डे के साथ आता है।  'बालिकावधू' (कलर्स, सोमवार से गुरूवार रात 8 बजे) सीरियल के केन्द्र में पितृसत्ताक आउटफिट में एक महिला है।




 इस सीरियल में एक अच्छी बात है। यह रिफॉर्म के एजेण्डे के साथ शुरू होता है। इसका विषय क्षेत्र परिवार है। रिफार्म का एजेण्डा नवजागरण की समस्या है। आजकल विशेष तौर पर राजस्थान, हरियाणा और बिहार की पृष्ठभूमि हिन्दी के लोकप्रिय सीरियलों के केन्द्र में है। ये हिन्दी भाषी प्रदेश तथाकथित हिन्दी नवजागरण के केन्द्र हैं। कलर्स पर प्रसारित होनेवाले 'बालिकावधू' और 'लाडो' सीरियल , जी टी वी का 'अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो' , स्टार पर 'घर की लक्ष्मी बेटियाँ' आदि इसका उदाहरण हैं।
   
     हिन्दी में  सेक्सुअलिटी का मसला परिवार और समाजसुधार के एजेण्डे के साथ प्रवेश करता है। समूचे यूरोप में प्रसारित होनेवाले सीरियलों में सेक्सुअलिटी की थीम एक महत्वपूर्ण थीम रही है। ये संभव ही नहीं है कि सेक्सुअलिटी के बिना सीरियल बने। सेक्सुअलिटी का मतलब स्त्री है। स्त्री का संसार है। उसके बिना सीरियल नहीं बनता। सीरियलों के प्रचलित पैटर्न को गंभीरता से देखने और जानने की जरूरत है कि स्त्रियाँ इन सीरियलों में क्या करती हैं ? स्त्रियों का क्या काम है ? वे उत्पादक वर्ग हैं या अनुत्पादक वर्ग हैं ? यह विचार करने योग्य बात है कि 21 वीं शताब्दी में ऐसे सीरियल इफरात में दिखाए जा रहे हैं जिनमें स्त्रियाँ उत्पादक वर्ग नहीं हैं। अनुत्पादक वर्ग हैं। ये योरोप की परंपरा है। वहाँ इस तरह के सीरियल जिनमें स्त्रियाँ उत्पादक वर्ग नहीं हैं अच्छी उपभोक्ता हैं खूब प्रचलित हैं।
  ये सामान्य ढर्रा है कि स्त्री जो दिखाई जाए वह घरेलु हो , परंपरागत हो। ध्यान रहे कि सीरियल में कहानी महत्वपूर्ण नहीं होती, चरित्र महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि चरित्रों का लोग अनुकरण करते हैं। उसके हाव-भाव नजरिए आदि का अनुकरण करते हैं। चरित्रों के जरिए पूरे बाजार का , उपभोग का ढाँचा तय होता है। चरित्र महत्वपूर्ण होते हैं। चरित्र कैसे हैं इससे तय होता है कि कहानी का प्रभाव क्या होगा। हिन्दी के सीरियलों में चरित्र कैसे हैं ? गौर करें तो ये सभी अनुत्पादक चरित्र हैं। 


हिन्दी के सीरियलों की सामान्य विशेषता है कि इनमें सबसे ज्यादा स्त्री अनुत्पादक चरित्र है। दूरदर्शन से लेकर जी टी वी, स्टार प्लस और नया आरंभ हुआ कलर्स चैनल पर सबसे ज्यादा अनुत्पादक स्त्री चरित्र मिलेंगे। यानि ठेठ देशी से लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चैनलों में स्त्री का रूपायन एक जैसा है। वही औरत ग्रहण करने योग्य और स्वीकार्य है जो परंपरागत है। घरेलू है। 


    अचानक सीरियलों में गाँव महत्वपूर्ण हो गए हैं। गाँव के परिवेश में निर्भर स्त्री चरित्रों की खोज करने की जरूरत नहीं है। सारा का सारा सामंती ढाँचा ही स्त्री को निर्भर बनाने पर जोर देता है। मध्यवर्गीय परिवारों का रूपाययन करनेवाले सीरियलों में भी स्वनिर्भर और स्वतंत्र स्त्री की छवि न के बराबर है। वो स्त्रियाँ हैं जो महँगे गहनों कपड़ों में अपने पुरूषों के ओहदे के अनुसार लदी हैं। एक दूसरे के खिलाफ षडयंत्र कर रही हैं।

  
कायदे से ये चैनल ऐसी स्त्री चरित्रों को दिखा सकते थे जो आधुनिक है। स्वनिर्भर है। संघर्ष से पहचान अर्जित करती है। अपने बूते पर खड़ी है। लेकिन ऐसा नहीं है। आधुनिक वेशभूषा में सजी-धजी औरत गहनों और लाउड मेकअप में होती है। स्त्री को चिर युवा के रूप में ही दिखाया जाता है। सास और बहू के संबंधों का रूपायन है पर कम उम्र और बुजुर्ग स्त्रियों की साज सज्जा में ज्यादा अंतर नहीं है।