Wednesday, July 13, 2011

कौन सी चीज इतिहास बनाती है और किस पर शर्म करें!

 भारतीय मीडिया खासकर हिन्दी मीडिया में शर्म, अपमान, पराजय, हार, असफलता और रोष की भाषा कब बोली जाती है कभी सोचा है आपने ? केवल खेल की खबरों की रिपोर्टिंग करते समय। जनता के मुद्दे पर नहीं। सरकार की नीतियों की आलोचना करते समय नहीं। विपक्ष की भूमिका और दायित्वों की बात करते समय नहीं। या किसी बड़े सार्वजनिक नुकसान पर नहीं। वहां एक गहरी तटस्थता दिखाई जाती है। मैं आपको आज (11जुलाई2011)प्रसारित होनेवाले टी वी ख़बरों से एक उदाहरण दूं। ये ख़बरें एक ही चैनल की हैं, दो अलग चैनलों की नहीं। ताकि चैनल की नीति, समाचार चयन और भाषा की एक मामूली झलक आपको मिल सके। कल की दो बड़ी ख़बरों में से एक खेल जगत की थी और एक कालका मेल के दुर्घटनाग्रस्त होने की।

स्टार न्यूज पर वेस्टइंडीज और भारत के बीच चल रहे टेस्ट मैच सीरिज पर ख़बर थी। ख़बर का सार था कि धोनी की विश्व रैंकिंग में नम्बर वन टीम ने ये सीरिज जीत ली है और कल का टेस्ट ड्रा रहा है। प्रस्तुति की भाषा थी कि धोनी की नम्बर वन टीम ने सातवें रैंक की वेस्टइंडीज की टीम से मैच ड्रा कर लिया। इसकी प्रस्तुति इस प्रकार थी कि भारत में उन लाखों दर्शकों को कितनी शर्म आई होगी जिन्होंने कल ऑफिस लेट पहुंचने की क़ीमत पर रातभर जागकर ये मैच देखा है। ब्ला....ब्ला...। और दूसरी ख़बर 5 मिनट बाद ही उसी चैनल पर कालका मेल के कल रविवार को दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर थी। इसमें रोती बिलखती एक किशोरी सुहाना की तस्वीर थी जो इस दुर्घटना में मां को खो चुकी थी, पिता गंभीर रूप से घायल थे और जिस भाई को वह कल रात भर खोजती रही वो आज मरा दिखाई दिया। टी वी रिपोर्ट में कहा जा रहा था कि ‘सुहाना कि ये तस्वीरें भावुक कर देनेवाली हैं!’ घटना की एकदम तमाशे की तरह प्रस्तुति, वैसी ही भाषा! न किसी को शर्म करने के लिए कहा जा रहा था, न किसी की शर्मिंदगी के बारे में सोचा जा रहा था! रेलवे की लापरवाही, सिग्नल की ग़लती, ड्राइवर की ग़लती के अलावा न किसी की असफलता का बयान था, न कोई रोष या क्रोध की भाषा थी।

एक ऐसी भाषा का इस्तेमाल जो तमाशों में इस्तेमाल होती है। जिसमें दर्शक की तमाशा देखने में रुचि पैदा होती है, असंभव और दहला देनेवाली घटनाओं पर वो अचंभित होता है, सहमता है जब लाल कपड़े के नीचे लेटी हुई बच्ची के मुंह से खून निकलने लगता है, सूखे मुंहवाली सूखी सी बच्ची बड़ा सा डंडा लेकर दम साधे जब रस्सी पर चलती है तो डर और भय से आंखें फाड़े उसके सकुशल दूसरी छोर पर पहुंचने की कामना करता है, पर नट इसी चरम पर खेल रोक कर पैसे इकट्ठे करने लगता है। इस तमाशे में शामिल दर्शक की सारी भावनाएं किसी क्रियात्मकता में नहीं बदलतीं। ये तमाशबीन की भावनाएं हैं।

आज एनडीटीवी.कॉम से लेकर इंडिया टुडे ग्रुप के आजतक और हेडलाइन्स टुडे सभी में प्रकाशित और प्रसारित रिपोर्टों पर ग़ौर करें तो साफ होगा कि इन दोनों खबरों को लेकर एकदम भिन्न क़िस्म की प्रस्तुति और भाषा का इस्तेमाल किया गया है। खेल की ख़बर की प्रस्तुति में जहां अत्यधिक उत्तेजना, गौरव बोध, इतिहास रचने की बात, जूझारूपन, संघर्ष, बेशक़ीमती, बहुमूल्य, जश्न, विजयश्री, खिताब, सम्मान जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। (ये वही भाषा है जिससे प्रभावित होकर दर्शक मैच हारकर आए खिलाड़ियों पर अंडे-टमाटर फेंकते हैं। उनके घरों को नुकसान पहुंचाते हैं।) जबकि एक ही दिन में कालका मेल और गुवाहाटी-पुरी एक्सप्रेस रेल दुर्घटनाओं से जुड़ी ख़बरों में आंकड़ों की प्रस्तुतियां हैं। जब हम इंसान की जगह जीवित और मृत आंकड़ों की बातें करते हैं; मृत, गंभीर रूप से घायल और मामूली घायलों के लिए घोषित मुआवजों की रक़मों की बातें करते हैं तो घटना और प्रतिघटना दोनों ही आंकडे बनकर निकलते हैं। इसमें आदमी की जिंदगी की क़ीमत, मानव मूल्य और मानावाधिकार जैसी कोई चीज नहीं दिखाई देती। घायल लोगों में जीने के लिए संघर्ष, लोगों का बहूमूल्य जीवन, इतिहास की दर्दनाक घटना की बातें ध्यान नहीं आती। इतने बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए इसमें शर्म की बात नज़र नहीं आती कि रेल राज्य मंत्री अपने बयान में जिम्मेदारी की बात करने के बजाए कह रहा हो कि वो रेल मंत्री नहीं है बल्कि अन्य कई मंत्रियों में से एक एमओएस स्तर का मंत्री है! यानि आप उससे जवाबदेही की उम्मीद कैसे कर सकते हैं! रेल मंत्रालय तो प्रधानमंत्री के पास है! ग़ौरतलब है कि कल मंत्रीमंडल का पुनर्गठन होनेवाला है। उदाहरण के लिए इन दो ख़बरों के कुछ कैप्शन देखिए-

हावड़ा मेल दुर्घटना में मृतकों की संख्या 68 पहुंची.

गुवाहाटी-पुरी पटरी से उतरी 50 घायल.

चेन्नईः रेल पटरी पर धमाका बच गए मुसाफिर.

कालका हादसाः दुर्घटनास्थल पर मची चीख-पुकार.

India Today-

Under the PM Rlys log freak accident. Kalka mail Death toll reaches 66 (Headlines Today,T.V. Report –Tragedy on Tracks,11july2011)

PM mourns loss of life in accident.

Assam another train derails.

और खेल की ख़बर की रिपोर्ट देखिए-

तीसरा टेस्ट ड्रा लेकिन सीरिज में मिली विजयश्री.

कैसे किया धोनी की सेना ने खिताब पर क़ब्जा.

जीते तो जश्न हारे तो भी जश्न. जीत का जश्न और सम्मान.

तीसरा टेस्ट ड्रा लेकिन भारत ने रचा इतिहास.

(http://headlinestoday.intoday.in 11 july2011)

P.M asks to Mukul Roy to visit Guwahati train accident site.

कालका मेल हादसाः69 लोगों के मरने की पुष्टि हुई.

डोमीनिका टेस्ट ड्रा पर भारत ने रचा इतिहास.

(http://Khabar.ndtv.com11 july 2011)

जाहिर है ये दो अलग तरह की ख़बरों की दो अलग शैलियों की भाषा है। पर ख़बर का जो सरोकार है वह किसी भी ख़बर से ग़ायब नहीं होना चाहिए और ख़बर का सरोकार है आदमी और उसकी जिंदगी। अगर ख़बर से उसके सरोकार ग़ायब होंगे तो इसी तरह की खबर बनेगी कि ‘प्रशंसक रात भर ऑफिस लेट होने की क़ीमत पर जागे और धोनी सोचें कि उनके ड्रॉ के फैसले से इन प्रशंसकों को कितनी शर्म महसूस हुई होगी!’ एक तरफ तो यह कि खेल के खेल को खेलनेवाला खुद निर्णय कैसे ले रहा है; उसे प्रशंसकों की सोचनी चाहिए और दूसरी तरफ सियासी खेल को खेलनेवालों की कोई जवाबदेही कहीं बनती नहीं। प्रधानमंत्री जिसे अपना प्रतिनिधि बनाकर भेज रहे हैं वो मंत्री कह रहा है कि मैं तो रेलमंत्री नहीं हूं जी! भारत के प्रिंट मीडिया का लंबा इतिहास है और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने भी इलैक्ट्रॉनिक गति से ही तरक्की की है। इस कारण परिपक्वता की बात करना उचित नहीं लेकिन मीडिया को इतना ज्ञान तो होना ही चाहिए कि एक दिन में घटी इन दो क़िस्म की घटना और दुर्घटना में कौन सी चीज इतिहास में जाने लायक है, किससे ज़ायादा बेशक़ीमती जिंदगियां जुड़ी हैं, संघर्ष की असल बानगी कहां है और किस घटना पर देशवासियों को शर्मसार होने की जरूरत है!

Sunday, May 29, 2011

सलाम ममता

  लाखों की संख्या में आम जनता और और आगे आगे चलती ममता बनर्जी। बंगाल की असल नायिका। जी नहीं ये कोई फिल्मी दृश्य नहीं है।  जैसा कि आपने इधर की कई फिल्मों में देखा है। ये असल दृश्य है। ये ममता के बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथग्रहण के बाद बंगाल के प्रसिद्ध राइटर्स बिल्डिंग तक पैदल चल कर जाने का दृश्य है।


ये जनज्वार जनता की इच्छाओं और दबी हुई आत्मशक्ति का परिचायक है। ममता बनर्जी ने राजभवन से महाकरण तक की यात्रा पैदल तय कर इसी भाव को अभिव्यक्ति दी है। साथ ही ममता क्या घोषणाएं करेंगी मुख्यमंत्री होने के बाद ऐसी किसी ख़बर के आने के पहले ये ख़बर आई है कि ममता मुख्यमंत्री होने के बाद सबसे पहले एक बलात्कृत स्त्री से मिलेंगी। आप इसे लोकप्रिय स्टंट कह सकते हैं पर ये जन भावों की

अभिव्यक्ति है। एक महिला मुख्यमंत्री का सबसे पहले एक पीड़ित महिला से मिलने का कार्यक्रम स्त्री संवेदना और सह-अनुभूति का सुंदर नमूना है। ये उम्मीद हम ममता से ही कर सकते थे।

ममता की उपलब्धियां जन संघर्ष के साथ-साथ स्त्री संघर्ष का भी प्रेरणादायी उदाहरण है। ममता को किसी की विरासत नहीं मिली। किसी का वरद्हस्त भी नहीं मिला। राजनीतिक पायदान पर आगे बढ़ने के लिए ये अनिवार्य अर्हता है पर ममता ने इन सबको झुठलाते हुए न केवल अपने लक्ष्य को हासिल किया है बल्कि जन-जन के भावों को अभिव्यक्ति दी है। यहां तक कि इस बार के सहयोगी गठबंधन कांग्रेस की भी यह

स्थिति थी कि उसने ममता के साथ कई जगह चुनावी मंच साझा नहीं किया। पर ममता सारे प्रतिरोधों को पार कर गई।

ममता ने अपने अब तक के रवैय्ये के अनुसार ही पैदल चलकर महाकरण जाना तय किया। आखिरी समय तक पत्रकार और मीडियाकर्मी क़यास लगाते रहे कि वो पैदल जाएंगी या सरकारी कन्वॉय में गाड़ी से। बंगाल के इतिहास में यह अभूतपूर्व घटना है। असंख्य लोग उन्हें देखने के लिए धक्का-मुक्की कर रहे हैं और मीडिया कर्मी ये नहीं तय कर पा रहे कि वो वी आई पी लिफ्ट द्वारा अपने दफ्तर जाएंगी या सीढ़ियों से।

कैमरे को पता नहीं ऑब्जेक्ट कहां है। सीधा प्रसारण दिखा रहे चैनलों को भी ये नहीं पता था कि वे गाड़ी से नहीं, पैदल जाएंगी। अतः ʻसीधा प्रसारणʼ भी सीधे नहीं दिखा पाया कि ममता किस तरह चलकर जा रही हैं। क्योंकि कैमरे उस अनुसार नियोजित नहीं थे। यह अनियोजन ही जनता की और ममता की ताक़त है। कई जगह बैरिकेड टूट गए। राज भवन जहां हर समय 144 धारा रहती है वहां आज साधारण जनों की भीड़ देखी जा रही

है।

ये वही ममता हैं जिनको स्त्री नेत्री होने के कारण कई तरह से अपमानित किया गया। कई तरह के अपशब्द और दुष्प्रचार किए गए। राजनीति; ताक़त, वर्चस्व और जोर आजमाइश की जगह है। उसमें एक स्त्री का इस मुकाम पर पहुंचना बहुत बड़ी बात है। ममता का प्रतिपक्ष साधारण पार्टी नहीं है। एक संगठित, नियंत्रित और सुचालित पार्टी है। जिसका तीन दशक से ज्यादा बंगाल पर शासन रहा है। हारने के बाद भी जिसके

पास 42 प्रतिशत वोट है। ऐसे में ममता का न तो रास्ता आसान था और न ही चुनौतियां आसान हैं। पर इसमें कोई संदेह नहीं ममता की उपलब्धि बहुत बड़ी है! बंगाल जो सबसे जागरुक राज्य होने का दावा करता है, को पहली महिला मुख्यमंत्री चुनने में 54 वर्ष लग गए! कह सकते हैं पार्टियों ने विकल्प नहीं दिया था । पर जनता को जैसे ही विकल्प मिला जनता ने अपनी राय जाहिर कर दी। ममता ने प्रतिरोध का ही केवल

विकल्प नहीं तैयार किया बल्कि जेंडर का भी विकल्प तैयार किया है। राजनीति की दुनिया में स्त्री मुहावरों और प्रतिरोध की शक़्लें तभी तैयार हो सकती हैं जब महिला नेत्रियां अपने महिला होने की जिम्मेदारियों और दायित्वों को भी याद रखें। ममता की कैबिनेट बैठक की बाद की घोषणाओं की अभी अपेक्षा है। नेत्री के साथ-साथ घोषणाओं और कार्यों को भी खराद पर चढ़ना है। सलाम ममता! सलाम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री!

(20मई 2011 को बांग्ला चैनलों पर प्रसारण देखते हुए)



क्या कहती है सलमान की बॉडी लैंग्वेज

 आजकल सलमान अपनी फिल्म रेडीʼ के प्रमोशन में लगे हुए हैं। इसी क्रम में 26 मई को सलमान स्टार न्यूज के स्टुडियो में आए और स्टार न्यूज के स्टार एंकर-पत्रकार दीपक चौरसिया ने उनका ʻस्टुडियो-साक्षात्कारʼ लिया। इसका 27,28 और 29 मई को रिपीट प्रसारण भी हुआ। इस साक्षात्कार को लेकर ही मेरी ये टिप्पणी है। पहले मैं साक्षात्कार की अंतर्वस्तु पर बात करूं ताकि जिन्होंने न देखा हो वो भी समझ सकें। अमूमन सलमान खान की मीडिया छवि एक गुस्सैल, सस्ती हरकतें करनेवाला, लड़कियों का दिल तोड़ने और उन पर अत्याचार करनेवाला आदि की बनाई जाती है। पर सलमान सीधी बातचीत में लड़कियों से बात करते हुए काफी सावधान, असहज और शर्मीले नज़र आए। यहां तक कि स्टार की कर्मचारी शगुन ने सलमान के 8 पैक ऐब्स देखने चाहे और सलमान ने बड़ी सादगी से कहा कि अभी नहीं फिल्म में देख लें। कैटरीना को लेकर सवाल का जिस तरह से सस्पेंस दीपक चौरसिया बनाना चाहते थे सलमान ने एक मिनट में धो दिया। उन्होंने कहा कि पूछिए आपको जो भी पूछना है। जब आप बात आगे बढ़ा ही चुके हैं तो पूछ ही डालिए ताकि हम ऑर्डर में आगे बढ़ सकें। राखी सावंत सलमान से शादी करना चाहती हैं, सलमान का क्या क्या जवाब है? इस पर सवालकर्ता विनोद कांबली से ʻकहा तू कर लेʼ । बीना मल्लिक सलमान के साथ डेट पर जाना चाहती हैं विषय पर कांबली की टिप्पणी पर कि तुम कितने लकी हो ! सलमान ने जवाब दिया कि तू मेरा सारा लक ले ले और उसे डेट पर ले जा। सलमान एक प्रोफेशनल की तरह जवाब दे रहे थे और अपने काम के प्रति गंभीर दिख रहे थे। और सबसे बड़ी बात कि सरलता से बिना किसी हैंगओवर के जवाब दे रहे थे। वे इस साक्षात्कार में दबंग के गाने पर नाचे भी।

सलमान इस साक्षात्कार के दौरान अपनी मां को कई बार आदर से याद करते दिखे। कहा, मेरी दो माएं हैं-एक सुशीला जी और एक हेलेनजी।

सलमान अपनी शर्ट क्यों उतारते हैं। इस प्रश्न पर सलमान का जवाब था-ताकि लोग मुझे देख कर सीखें ,फिट रहें, जिमों में जाएं, जब अपने आपको आईने में नहीं देख सकते तो लोग क्या देखेंगे। इस देश में युवाओं में ड्रग्स की समस्या है, विशेषकर 6.30 से 8 बजे तक के समय को नशे के जरिए सामाजीकरण में बिताने के बजाए यदि लोग जिम में जाएं तो स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा और सोशलाइजेशन भी होगा। शरीर देखकर लोग प्रभावित होते हैं। फिल्मों और मॉडलिंग के कैरियर के लिए शरीर जरूरी है। यह लव एट फर्स्ट साइट है। अपने को, अपने शरीर को प्यार करना अच्छी बात है। अपनी फिल्मों के दृश्य को सलमान निर्विकार भाव से देख रहे थे। कभी थोड़ी मुस्कान और कभी ʻकैरेक्टर ढ़ीलाʼ पर लिप मूवमेंट करते हुए। सलमान के प्यार के बारे में जानने की बड़ी कोशिश दीपक चौरसिया ने की, पर सलमान ने अपने निजी जीवन को अलग रखा। सलमान के अंदर अपनी उम्र को लेकर कोई दुविधा या असहजता नहीं दिखी। अपनी हीरोइनों और अपने बीच उम्र के अंतर को सहजता से बताया। कहा कि सबसे एंबैरेसिंग कमेंट मेरे लिए यह होता है कि जब मेरी हीरोइन कहती है कि जब वह 3 साल की थी तो आपकी फिल्म देखी।

सलमान आम आदमी के कपडे पहने कर ही स्टुडियो में आए और यह भी कहा कि हीरो आजकल महंगे कपड़ों में आते हैं। युवा उनका अनुकरण करते हैं। मां-बाप की कमाई इतनी नहीं होती कि बच्चे के इस तरह के शौक़ पूरे करें। मैं निजी जीवन में भी सामान्य कपड़े पहनता हूं। महंगे कपड़ों पर खर्च करना पैसे बर्बाद करना है। वास्तव में सलमान ऐसा करते हैं या नहीं पर मीडिया में ऐसा कहना निश्चित ही उपभोक्तावाद के पक्ष में नहीं है।

सलमान ने कहाकि मीडिया ने ही मेरी ईमेज गंभीर और गुस्सैल की बनाई है। इस साक्षात्कार के दौरान सलमान की बॉडी लैंग्वेज एक एक्टर की नहीं, व्यक्ति सलमान की थी। जिसकी अपनी पसंद-नापसंद है और जो हर तरह की स्थितियों में केवल आनंददायी मुद्राएं नहीं बना सकता। स्टार न्यूज के एंकर दीपक चौरसिया के प्रश्नों पर सलमान न तो इंवॉल्व हो पा रहे थे न ही इंज्वॉय कर पा रहे थे। दीपक को भी ये स्थति समझ में आ गई उन्होंने कहा कि मैं इतनी देर से आपको हंसाने की कोशिश कर रहा हूं आप हंस ही नहीं रहे। सलमान का जवाब था, मैं दोस्तों के साथ हंसी-मजाक कर लेता हूं।

सलमान ने व्यंग्य पर भी व्यंग्य किया। इरफान के कार्टून पर व्यंग्य किया जिसमें सलमान के पीछे हाथ में गुलाब का फूल लेकर भागती लड़कियों के लिए सलमान का सेक्रेटरी कहता है कि ʻइन्हें पता है कि सलमान रेडी हैं।ʼ इस कार्टून को देखकर सलमान की टिप्पणी थी कि अभी तक तो मैंने नोटिस नहीं किया कि लड़कियां मुझे गुलाब देती हैं। सलमान ने कहा कि मैं जिंदगी को कार्टून नहीं समझता।

दीपक की मुश्किल ये थी कि वे सलमान की बॉडी लैंग्वेज और जवाबों से भी कुछ समझ नहीं पाए। अपने सवालों की वही घिसी-पिटी लिस्ट दोहराते रहे। सलमान स्टार न्यूज के ऑफिस में हीरो सलमान के भाव में नहीं दिख रहे थे पर एंकर की पूरी कोशिश थी कि पोस्टर फटे और हीरो निकले ताकि उसका स्टुडियो नायक की चरणधूलि से पवित्र हो। चैनल एक घंटे अपने दर्शकों का मनोरंजन कर सके। यहीं पर साक्षात्कार लेनेवाले और देनेवाले का ʻवेब लेंथʼ नहीं मिल पा रहा था और दीपक चौरसिया के सारे बाउंसर पर क्रिकेट के अनाड़ी सलमान छक्के लगा रहे थे।

चैनल बताना चाहता था अपने दर्शकों को कि वो अभी इस क्षण जो कुछ कर रहा है वो ऐतिहासिक है और अनूठा है, एक्सक्लुसिव है। वह अपने स्टुडियो में आए सलमान के हीरोइज़्म को बनाए रखना चाहता था। दीपक चौरसिया से लेकर स्टार न्यूज की अन्य महिला कर्मचारी कोशिश कर रहे थे कि सलमान वो सब करें और वो प्रभाव छोड़ें जो वो पर्दे पर करते और छोड़ते हैं। वो सलमान को भविष्यवक्ता, मीडिया इमेज में निर्मित हीरो की ऐसी छवि कि वो चाहे तो सब कुछ हो सकता है, बनाना चाहते थे पर शादी के सवाल पर सलमान ने इस भाव को समझा और थोड़ी विरक्ति से जवाब दिया कि आप मुझसे ऐसे सवाल पूछ रहे हैं जैसेकि मैं भगवान हूं। ऊपरवाले की मर्जी के बिना कुछ नहीं होता। शादी जब तक नहीं होती तब तक आप नहीं जानते कब होगी, शादी हो गई तो कब तक चलेगी ये भी पता नहीं होता।

सर-सर कह कर बातें करते हुए सलमान ने बताया कि पेंटिंग का शौक मां से मिला। मां अच्छी पेंटर हैं। उन्होंने स्टुडियो में एक पूरे बुजुर्ग चेहरे की पेंटिंग बनाई । पूछने पर तस्वीर के मायने भी बताए। एक पूरा चेहरा, यदि उसमें से सर निकाल दें तो ,हर धर्म में माथे के बिना किसी भी बुजुर्ग का चेहरा एक ही है। धर्म केवल दिमाग़ में होता है।

दोस्ती के बारे में सलमान की राय है कि दोस्ती लाईफ है। सलमान के दो पसंदीदा संवाद हैं- ʻदोस्ती की है निभानी तो पड़ेगी।ʼ और ʻइतना करोकि कभी कम न पड़े पर साला कम पड़ ही जाता है !ʼ इस पूंजीवादी समाज में दोस्ती पर जोर देना महत्वपूर्ण है। यह पूंजीवादी ʻएलियनेशनʼ की काट है पर दोस्ती के मायने दोस्ती का नाटक नहीं। समझना चाहिए कि दोस्ती का भाव कोई सामाजिक मुखौटा नहीं जिसे लगाकर प्रदर्शित किया जाए। यह एक आंतरिक भाव है। दोस्ती का प्रदर्शन और दोस्ती में फर्क़ होता है। शाहरूख से संबंध के सवाल पर साफ कहा कि मेरा झगड़ा नहीं, बनती नहीं मेरी उससे , सोच अलग-अलग है। आवन-जावन में घर को 4-5 बार पास करते हैं टी वी पर माफी मांगने से क्या।

सलमान को देखते हुए कई सवाल बार-बार मेरे मन में आए। सलमान की जगह दो और बड़े नामी खान होते तो इंटरव्यू कैसा होता। शाहरुख़ आंखों से और अपनी भंगिमाओं से बोलते हैं। माहौल को हल्का-फुल्का रखते हैं और पर्दे के शाहरुख़ यानि हीरो शाहरूख़ तथा व्यक्ति शाहरूख़ में फ़र्क नज़र नहीं आता। वही चार्म , वही आकर्षण बना रहता है। पोशाक और अदाएं भी शाहरूख़ की अपनी हैं जो पर्दे पर और बाहर भी बनी रहती हैं। आमीर की स्थिति यह है कि वो एक मीनिंगफुल हीरो और अर्थवान फिल्मों के एक्टर हैं। कम फिल्में करते हैं पर एक संदेश होगा उनकी फिल्म में , एक मायने होगा उनके द्वारा प्रमोटेड किसी भी फिल्म या वस्तु में , यह धारणा उन्होंने स्थिर कर दी है। आमीर -मतलब कुछ मायनेखेज। कह सकते हैं कि आमीर वस्तु के साथ मूल्यबोध जोड़ने में सक्षम हुए हैं। यहां तक कि अपना एक खास दर्शकवर्ग भी आमीर ने तैयार किया है। टी वी पर जब आमीर आते हैं या अपनी फिल्मों का प्रमोशन करते हैं तो उनका अंदाज अलग होता है, पर उनकी बॉडी लैंग्वेज से यह बात साफ जाहिर होती रहती है कि उन्हें पता है उनके काम का महत्व। उन्होंने कुछ कंट्रीब्यूट किया है समाज को।

सलमान की बातचीत, हरकतें और जवाब में एक विनम्रता थी। सर- सर कह कर बहुत विनम्र भाव से वो बातों का जवाब दे रहे थे पर एक आम आदमी की तरह अपनी धारणाओं पर दृढ़ता से क़ायम भी थे। जैसे भारत का आम आदमी है, सुनता वो सब नेताओं की है पर वोट किसको देगा ये राजनीति के तीसमार खांओं को भी नहीं पता होता। उन्माद के खेल का पर्याय बन चुके क्रिकेट को लेकर पूछे गए सवालों पर सीधे जवाब दिया कि क्रिकेट पसंद नहीं है , देखता नहीं हूं। इसी तरह से दीपक चौरसिया के कई आत्मकेंद्रित सवालों पर जैसे कि ʻमेरी शर्ट नहीं उतारिएगाʼ, कैटरिना और अन्य प्रेम संबंधों को लेकर पूछे गए सवालों पर सलमान ने कई बार उपेक्षा दिखाई।

इस ʻस्टुडियो-साक्षात्कारʼ (साक्षात्कार की एक उप-विधा कह सकते हैं) को देख कर यही लगता रहा कि टी वी मीडिया जो विकासशील देशों में सबसे ताक़तवर माध्यम है, अपने द्वारा निर्मित छद्म का ही शिकार होती जा रही है। भगवान या आइकॉन बनाने के उसके टोटके कई बार न केवल भ्रामक बल्कि झूठ दिखाई देते हैं। सलमान ने कुछ नहीं किया बस अपनी सहजता और सहज जवाबों और सच्ची देहभाषा से टी वी मीडिया के अहंकार को आईना दिखा दिया। सलमान अपनी फिल्म ʻरेडीʼ के और भी प्रमोशनल शो करेंगे, अन्य चैनलों पर इस फिल्म के प्रमोशन से जुड़े अन्य कार्यक्रमों के विज्ञापन भी आ रहे हैं पर ये ʻस्टुडियो-साक्षात्कारʼ तो मीडिया पाठ्यक्रम में शामिल करने लायक है !



Tuesday, May 17, 2011

अम्मा का मंगलसूत्र



                                                                

अन्नाद्रमुक पार्टी की नेत्री और तमिलनाडु में चौथी बार चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनी जयललिता ने शपथग्रहण के तुरंत बाद ही अपने कई चुनावी वादे पूरे किए। जयललिता ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा था कि वे चुनाव जीतीं तो शादी करनेवाली लड़कियों को चार ग्राम का मंगलसूत्र देंगी। अब जयललिता चुनाव जीत चुकी हैं और उन्होंने अपना यह वायदा भी पूरा कर दिया है। शादी करनेवाली लड़कियों को चार ग्राम सोने का मंगलसूत्र सरकार की ओर से दिया जाएगा।

वायदे उन्होंने और भी किए थे पर पहले पूरा होनेवाले वायदों में से एक वायदा यह भी है। इससे समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री अपने इस वायदे को लेकर गंभीर थीं। जिन सात वायदों को तुरंत पूरा किया गया है उनमें स्त्रयों से जुड़े दो वायदे हैं – एक तो यह कि शादी करनेवाली लड़कियों को जयललिता सरकार चार ग्राम सोना देगी और महिला सरकारी कर्मचारियों का मातृत्व अवकाश तीन महिने के बजाए छः महीने मिला करेगा। दोनों वायदों में दो तरह के तबके की महिलाओं की जरूरतों का ध्यान रखा गया है- घरेलू और कामकाजी। महिलाओं को मातृत्व अवकाश ज़्यादा समय का मिले- ये तमाम भारतीय और विश्व महिला संगठनों की पुरानी मांग है। निश्चित ही इस दिशा में सुधारमूलक क़दम उठाकर जयललिता सरकार ने प्रशंसनीय कार्य किया है। लेकिन इस दिशा में अभी और बहुत कुछ किया जाना बाकि है। मातृत्व के दौरान स्त्री तमाम भावनात्मक और शारीरिक बदलावों से गुजरती है। मातृत्व तो एक पूरा प्रकल्प है पर गर्भधारण की अवधि भी काफी लंबी होती है। इस लिहाज से छः महीने का अवकाश बहुत नहीं है। शिशु के थोड़ा बड़े होने और स्त्री को अपना स्वास्थ्य पुनः प्राप्त करने के लिए यह समय कम शहरों के एकल परिवार की नौकरीपेशा स्त्री के पास अबोध शिशु को ‘क्रेच’ जैसी जगहों पर जो आज भी हिंदुस्तान में ज़्यादातर अकुशल और गैर-पेशेवराना लोगों द्वारा चलाया जा रहा है , छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। है। साथ ही अपने पेशे में कुशलता को बनाए रखने के लिए स्त्री को अतिरिक्त परिश्रम करना होता है। इस समय की भरपाई भी किसी न किसी रूप में ‘इंसेंटिव’ देकर किया जाना चाहिए। यह अपनेआप में शोध का दिलचस्प विषय हो सकता है कि भारत के विभिन्न राज्यों में मातृत्व अवकाश का प्रावधान क्या है ?

जयललिता की दूसरी घोषणा है कि उनकी सरकार विवाह करनेवाली लड़कियों को चार ग्राम सोने का मंगलसूत्र देगी। यह बड़ी लुभावनी घोषणा है। हिंदुस्तान में गहने और उसमें भी सोने के गहने के प्रति स्त्री ही नहीं पुरुषों की भी आसक्ति है। गहना एक अच्छा निवेश भी है इससे इंकार नहीं। पर किसी सरकार द्वारा विवाह करनेवाली कन्याओं के लिए चार ग्राम के मंगलसूत्र की घोषणा अत्यंत लुभावनी है। सरकारें कई तरह के जनकल्याण और सामाजिक कार्य करती रहीं हैं। कई राजनीतिक पार्टियां और सामाजिक संस्थाएं सामूहिक विवाह का आयोजन करती हैं और उनमें वर-वधू को कुछ उपहार भी देती हैं। एक समय में अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए कुछ धन या वस्तु देने की घोषणा कुछ सरकारों ने की थी। पर जयललिता की यह घोषणा उन घोषणाओं से भिन्न है। इसके साथ कोई सुधारवादी या प्रगतिशील नजरिया नहीं दिखता बल्कि विवाह संस्था की पुरानी तस्वीर को ही वैधता मिलती है। चार ग्राम के मंगलसूत्र की जरूरत उन लड़कियों को होगी जो ग़रीब परिवारों से हैं। ये लड़कियां मंगलसूत्र का क्या करेंगी- परंपरित चलन के अनुसार गले में पहनेंगी और यदि आर्थिक मदद का नुक़्ता शामिल कर लें तो यह भी सोच सकते हैं कि वक्त-जरूरत यह एक संपत्ति के रूप में उनकी मदद करेगा। लेकिन हिंदू परंपरा के अनुसार यह सुहाग की निशानी है और सुहागिन स्त्री इसे अपने से अलग नहीं करती। ऐसे में जयललिता सरकार ने संपत्ति के रूप में मंगलसूत्र दी होगी, यह बात औचित्यपूर्ण नहीं लगती। यह निर्विवाद रूप से एक गहना है और सुहाग की निशानी होने का सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य भी इससे जुड़ा है।

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जयललिता सरकार गहने का यह तोहफा सन् 2011 में भारत की स्त्रियों को दे रही है।

हमारे देश में एक जननायक गांधीजी हुए थे। उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान विभिन्न कामों के लिए धन इकट्ठा करने का अद्भुत तरीका निकाला था। वे जहां भी भाषण या सभा-सम्मेलन के लिए जाते, चंदा मांगते थे। स्त्रियों से वे विशेष तौर पर उनके गहनों का दान मांगा करते थे। यहां तक कि उन्होंने अपने हस्ताक्षर का मूल्य संपन्न परिवार की स्त्रियों के लिए एक हाथ की सोने की चूड़ी रखी थी। गांधीजी जानते थे कि स्त्रियों को अपने गहनों से बहुत मोह होता है। यह आम स्त्री मनोविज्ञान है। ध्यान रखना चाहिए कि इसी आम स्त्री मनोविज्ञान को ही भुनाते हुए जयललिता ने मंगलसूत्र देने की घोषणा की है और इसी आम स्त्री मनोविज्ञान का संज्ञान लेते हुए गांधीजी ने स्त्रियों के गहना प्रेम को लक्ष्य बनाया था और चाहा था कि स्त्रियां अपने गहनों का मोह त्याग दें। एक कुशल जननेता की तरह गांधीजी ने एक समयसीमा रखी थी कि जब तक भारत परतंत्र है भारत की स्त्रियां गहना न पहनें। पर ये प्रतीकात्मक था। इस गहना दान को ग्रहण करने की गांधीजी ने जो शर्त रखी थी वो ध्यान देने लायक और सीखने लायक है। गांधीजी स्त्रियों को विशेषकर बालिकाओं और किशोरियों को उकसाते थे कि वे अपने गहनों का दान करें। भावी पीढ़ी पर उनकी नज़र थी। लेकिन इस दान को स्वीकार करने के पहले कुछ नियम थे उनमें से पहला नियम यह था कि जो स्त्री अविवाहित है वो अपने पिता और विशेषकर माता से गहना दान करने की अनुमति लेगी, वो दोबारा उसी तरह का गहना बनवा देने का आग्रह नहीं करेगी, संभव हो तो आजीवन गहना न पहनने का व्रत लेगी। गांधीजी जानते थे हिंदुस्तानी समाज में गहना एक रोग है और यह न केवल स्त्री को बल्कि पुरुष को भी ग्रसे हुए है। इस कारण गहना दान करनेवाली और आजीवन गहना न पहनने का व्रत लेने वाली लड़की के लिए लड़का मिलना कठिन होगा। इसलिए लड़की को यह भी वचन देना पड़ता था कि वो ऐसे ही लड़के से विवाह करेगी जो उसे फिर से गहना पहनने के लिए बाध्य नहीं करेगा। स्वयं गांधीजी ऐसी व्रती लड़कियों के लिए लड़का ढूंढ़ने का आश्वासन माता-पिता को देते थे। गाधीजी के द्वारा इस काम में सहयोग के कई उदाहरण हैं।

गाधीजी ने स्त्रियों में आभूषण विमुखता की प्रक्रिया को एक नाम दिया था-‘आभूषण-सन्यास’। इस आभूषण–सन्यास के लिए स्त्रियों को उत्प्रेरित करने के पीछे गांधीजी के तर्क बहुत ठोस थे। उनका मानना था कि गहना मनुष्य की स्वाभाविकता को नष्ट करता है। उसके व्यक्तित्व को कृत्रिम बनाता है। गांधीजी का कहना था- ‘मैं जानता हूं कि लड़कियों के लिए यह त्याग कितना कठिन है। हमारे समाज में आज अनेक प्रकार के फैशन देखने में आते हैं, पर मैं तो उसी को सुंदर कहता हूं, जो सुंदर काम करते हैं।’ गांधीजी स्त्री का गहना उसके संस्कार और कर्म को मानते थे। गांधीजी की विचारधारा से प्रभावित होकर प्रसिद्ध उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद ने ‘गबन’ नाम का एक महत्वपूर्ण उपन्यास ही लिख डाला था। इस उपन्यास में नायिका जालपा का आभूषण प्रेम और नायक रमानाथ का गहनों के लिए गबन और अंत में नायिका का कर्ममय व्यक्तित्वान्तरण होता है। इस उपन्यास की उपलब्ध आलोचनाओं में स्त्री के आभूषण प्रेम का समस्यावादी पाठ बनाया गया है पर मेरी जानकारी में अब तक इसकी आलोचना गांधीवादी विचारधारा के इस पक्ष से नहीं की गई है।

ऐसे में सन् 2011 की भारतीय स्त्रियां चाहे वे गांव की हों या शहर की , के लिए अगर ‘अम्मा’ के नाम से मशहूर महिला नेत्री जयललिता उनके व्यक्तित्व के विकास और आर्थिक मदद के लिए कोई और लुभावना तोहफा देती तो क्या ज़्यादा मुफीद नहीं होता ! पर तोहफा तो तोहफा होता है, लेनेवाले से ज़्यादा इसमें देनेवाले की मरजी होती है। लेकिन भारत की स्त्रियों जिसका एक हिस्सा तमिलनाडु की स्त्रियां हैं को ये तोहफा क़बूल करते हुए इसके अन्य पक्षों का भी ध्यान रखना चाहिए। यह जनता के पैसे का ही जनता को तोहफा है जिसमें घरेलू से लेकर काम-काजी स्त्री का भी श्रम लगा हुआ है। क्या जनता को हक़ नहीं कि पूछे कि इससे बेहतर भी कुछ हो सकता था या नहीं ! क्यों स्त्री के मामले में लुभावनी लेकिन ख़तरनाक परंपराओं को ही पोषणा चाहते हैं, शायद स्त्रियां नहीं बोलतीं, उनके प्रतिनिधि संगठन नक्कू बनने का ख़तरा नहीं उठाते इसीलिए न!
                                                                                                                              

Monday, March 7, 2011

तुर्कमेन समाज में महिला दिवस के अनुभव


    8 मार्च 2011 को विश्व महिला दिवस सारी दुनिया में मनाया जाता है। मैं यहां तुर्कमेनिस्तान की राजधानी अस्काबाद में विश्वभाषा संस्थान में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हूँ, नया विभाग खुला है, मेरी यह दूसरी विदेश यात्रा है,पांच महिने गुजर चुके हैं यहां पर। महिला दिवस पर इस देश का माहौल देखकर आश्चर्य हो रहा है और उसी अनुभव को मैं साझा करना चाहती हूँ। यह देश पहले समाजवादी सोवियत संघ का हिस्सा था। इन दिनों संप्रभु राष्ट्र है। बेहद सम्पन्न हैं यहां के लोग।
करीब पांच छः रोज पहले मेरी तुर्कमेन दोस्त शमशाद ने वायदा किया है कि वो इस दिन मुझसे मिलने आएगी और मुझे एक सरप्राइज गिफ़्ट( मेरी एक पेंटिंग) देगी। मुझे हठात् 8 मार्च का प्रसंग ध्यान नहीं आया तो उसने याद दिलाया कि मंगलवार को 8 मार्च है। तब तक मुझे उम्मीद नहीं थी कि 8 मार्च का दिन तुर्कमेनिस्तान में इस तरह बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। 6 मार्च से ही राष्ट्रीय चैनलों पर बार-बार बधाई संदेश दिखाया जा रहा है। महिला दिवस मुबारक हो। राष्ट्रपति ने सभी महिलाओं और देशवासियों को इस दिन की बधाई दी है। कल 8 मार्च को राष्ट्रीय अवकाश है।
आज 7 मार्च से ही सारे दिन 'यास्लिक' नाम के राष्ट्रीय चैनल पर महिलाओं के लिए तरह तरह के कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। इसमें सक्रिय सरकारी भागीदारी है। मैंने महिला दिवस पर ऐसा कोई दृश्य अन्य किसी चैनल पर नहीं देखा , इस कारण सुखद आश्चर्य हुआ।
     वैसे भी तुर्कमेनिस्तान उत्सवप्रिय देश है। उत्सवधर्मिता यहां के लोगों की रग़-रग़ में है, थोड़ा शर्माकर सुंदर तरीके से कहते भी हैं कि हमारे देश में उत्सव बहुत हैं। पर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर इस तरह का उत्सवपूर्ण आयोजन देखना बहुत ही प्रीतिकर है। आम तौर पर अन्य अंतर्राष्ट्रीय चैनल बहस और रिपोर्टें दिखाते हैं, महिलाओं की स्थिति का वैश्विक आकलन प्रस्तुत करते हैं उनमें उत्सवधर्मिता और उल्लास कहीं ग़ायब हो जाता है। मैं ये नहीं कह रही कि बहसों और आंकड़ों की जरुरत नहीं। इनकी जरूरत है, कांगो में बलात्कार का युद्ध के अस्त्र के रुप में इस्तेमाल, मध्य पूर्व के देशों में महिलाओं द्वारा हाल के जनांदोलनों में भागीदारी पर और इस तरह के अन्य मसलों पर बहस की जरूरत है।
      लेकिन उत्सव की तरह इस दिन को मनाए जाने का अपना रचनात्मक और प्रतीकात्मक महत्व है। आज के कार्यक्रम की विशेषता है कि पूरा कार्यक्रम पुरुषों द्वारा पेश किया जा रहा है। इनमें किशोर हैं , युवा हैं और वृद्ध भी। वे ही काव्य-पाठ कर रहे हैं, नाच रहे हैं, वाद्य बजा रहे हैं। जबकि अमूमन किसी भी अन्य कार्यक्रमों में महिलाओं की बराबर भागीदारी होती है। वे गाती हैं, वाद्य भी बजाती हैं, नृत्य और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश करती हैं। पर आज हर उम्र की महिला को कार्यक्रम का केवल आनंद लेते देखा जा सकता है। उनके सम्मान में कार्यक्रम पेश किया जा रहा है मेल जेंडर के द्वारा। पुरुष मंडली नाच-गा कर महिला समाज की मेहरबानियों का बखान कर अपना आभार प्रकट कर रही है। स्त्री के अवदानों के प्रति यह एक कृतज्ञ समाज की सही भंगिमा है। बहस और रिपोर्टें भी हैं, चर्चाएं भी,महिलाओं की प्रतिक्रिया भी। सब समानुपातिक।
  समाजवादी समाज के ढ़ांचे के अंदर विकसित स्त्रीवादी सरोकारों को यहां देखा जा सकता है। यहां औरतों को सरकारी स्तर पर कई तरह की सुविधाएं हासिल हैं। कामकाजी महिलाओं के लिए विशेष रूप से प्रावधान है कि पूरी नौकरी के दौरान दो बार वे गर्भधारण के दौरान मिलने वाली सरकारी सहूलियतें ले सकती हैं। जच्चा बच्चा दोनों के लिए ही नौकरीपेशा और गैर नौकरीपेशा महिलाओं के लिए सरकारी सुविधाएं दी जाती हैं। मां और शिशु को मासिक तौर पर दो वर्षों तक धन दिया जाता है साथ ही बच्चे की पढ़ाई लिखाई का खर्चा भी मिलता है। पूरी नौकरी के दौरान यदि महिला ने दो बार गर्भ धारण किया है तो वह समय उसकी नौकरी में तरक्की में बाधा नहीं होता। यही नहीं वह चाहे तो गर्भधारण के समय को नौकरी की पूरी अवधि में से घटाकर पूरे पेंशन के साथ रिटायरमेंट ले सकती है।
  यह एक उदार मुस्लिम बहुल समाज है। धर्म को लेकर कहीं से भी कट्टरता का प्रदर्शन दिखाई नहीं देता। खान-पान, पहनावा, आचार-व्यवहार सबमें उदारता दिखाई देती है। मैंने यहां लगभग 6 महीनों में लोगों को जोर-जोर से बोलते या झगड़ा करते नहीं सुना। मेरे पड़ोस में रहनेवाली महिलाओं में भी मैंने कभी कोई कटु प्रसंग नहीं देखा। लड़की पैदा होने पर मां-बाप निश्चिंत होते हैं। लड़की स्वयं लड़का पसंद करती है। लड़की वाले शादी से पहले एक बार भी लड़के का घर देखने नहीं जाते। लड़के के घरवाले ही आते हैं और प्रस्ताव देते हैं।
     वैवाहिक संबंधों के न चल पाने की स्थिति में तलाक यहां स्टीग्मा नहीं है। तलाक की स्थिति में घर पर स्त्री का ही अधिकार होता है, उसे घर नहीं छोड़ना पड़ता। सबसे महत्वपूर्ण यह कि यहां स्त्रियां जितने भी सर्विस सेक्टर हैं उनमें बड़ी संख्या में काम करती हैं। केयरटेकर, बाज़ार में दुकानदारी, विदेशों से सामान आयात करके व्यापार, मिलों-कारखानों और दस्तकारी के कामों विशेषकर कालीन बनाने और यहां के राष्ट्रीय पोशाक 'कोईनेक' (कशीदाकारी)की कढ़ाई, सिलाई सभी कामों में स्त्रियों की ही भागीदारी है। अपवाद रूप में भी पुरुष दिखाई नहीं देते।
    यहां 'मॉल' हैं उनमें पूरे दुकान की जिम्मेदारी स्त्रियों पर ही है। सेल्सगर्ल से लेकर कैश काउंटर तक वे ही हैं। 'बिज़नेस वूमन' की अवधारणा यहां आम है। पुरुष भवनों के निर्माण कार्य में या ऑफिसों में काम करते हैं। बाज़ार का पूरा अर्थतंत्र स्त्री के हवाले है। इस श्रम के अलावा इन स्त्रियों का घरेलू श्रम भी जुड़ा हुआ है। सदियों से चले आ रहे पितृसत्ताक विचारों के घुन ने इस समाज को भी खाया है। इतनी बड़ी संख्या में हर तरह के कामों में भागीदारी के बावजूद राजनीति और व्यापारिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण जगहों पर महिलाओं की भागीदारी समुचित नहीं है।
भारत में इतनी बड़ी संख्या में बाज़ार की संचालक शक्ति के रूप में स्त्री को देखना मुश्किल है। वे दिखाई देती हैं उपभोक्ता के रूप में। विशेषकर शहरों में तो यही दृश्य है। घर और बाहर के कामों का पितृसत्ता के नियमों के अनुसार सख़्त बंटवारा स्त्री को व्यक्तित्व के विकास के बहुत सारे अवसरों से तो बाधित करता ही है बहुत सी रुढ़ियों की समाप्ति की प्रक्रिया को भी विलंबित करता है।
मैं अभी तक तय नहीं कर पाई हूं कि अपनी उस छात्रा-मित्र द्वारा दी गई शिवरात्रि की बधाई का क्या प्रत्युत्तर दूं , उसी दिन शमशाद ने याद दिलाया था कि क्यों वह 8 मार्च को ही सरप्राइज देना चाहती है। पार्वती की कठिन 12 बरसों की तपस्या के बाद शिव प्रसन्न हुए थे और पार्वती से विवाह किया था। 'शिवरात्रि' के दिन कन्याएं इच्छित वर पाने के लिए और सुहागिनें सात जन्मों तक वर्तमान पति को पाने के लिए व्रत करती हैं।
   भारतीय स्त्रीवाद की विडंबना है कि यहां शिवरात्रि और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस एक ही पैराडाइम में मौजूद हैं। भारत में महिला आंदोलन अभी तक इस दिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित नहीं करा पाया है लेकिन पूर्व समाजवादी समाज के मुस्लिम बहुल देश तुर्मेनिस्तान में राष्ट्रीय अवकाश है।शरीयत की जगह आधुनिक संविधान है,कानून है। यहां औरत के लिए जिस तरह के अधिकार,सामाजिक सम्मान और सामाजिक सुरक्षाएं उपलब्ध हैं ,उन्हें देखकर यही इच्छा होती है कि काश !भारत की औरतों के पास इस तरह के अधिकार होते ।



Friday, February 4, 2011

जिसे जानते हैं क्या पहचानते भी हैं

यह बहुत सुखद हुआ कि मेरा कम्प्यूटर अंग्रेजी में हो गया। अब मैं कम से कम कमाण्ड तो समझ सकती हूँ। आज 5 नवम्बर है और दीवाली है। अश्गाबात में सुबह के सात बज रहे हैं। मन तो नहीं लगता लेकिन लगाने की कोशिश कर रही हूँ। यहाँ आकर मुझे अपने को जानने का भी अवसर मिला है। नए सिरे से मैंने अपने को पहचाना है। कई बार रोजमर्रा की भागदौड़ में अपने आप को हम भूले हुए ही होते हैं, कबीर ने जिस आपे और माया की बात की थी वह कितना अबूझ है इस पर तो भक्त कवि ही बहुत लिख गए हैं।


पहचान क्या है। या जिसे हम आत्म पहचान कहते हैं वह क्या है। हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं –हमें कोई नहीं पहचानता, हमारे मन को कोई नहीं जानता, कभी धमकी के स्वर में कि मैं क्या चीज हूँ वो मुझे जानता नहीं है तो कभी दुख के स्वर में कि लोग मुझे पहचान नहीं पाए कि मैं क्या हीरा हूँ। या किसी ने मुझे समझने की कोशिश ही नहीं की। लेकिन समझना – अपने को या दूसरे को इतना आसान है क्या। दूसरे की छोड़िए अपने को भी तो समझने की प्रक्रिया से हम भागते ही रहते हैं। हम कितने दावे करते हैं अपने बारे में कि मैं ऐसा हूँ या वैसी हूँ। लेकिन तमाम दावों के बावजूद हम अपने बारे में भी नहीं जानते। केवल कुछ चीजों को ही वह भी मोटे तौर पर ही अपने बारे में दावे के साथ कह सकते हैं, वह भी पूरा सच नहीं होता। गुलजार की पंक्तियाँ हैं न- दिल सा कोई कमीना नहीं है। पहलू में दिल क्यों शोर करे, बेवजह बातों पर यूँ ही गौर करे। तो ये दिल जनाब कुछ –कुछ ऐसे ही हैं। हम इस भ्रम में रहते हैं कि हम इसे जानते हैं। कम से कम अपने को हम तो जानते हैं दूसरा कोई जाने न जाने। पर अपना ही मन हमें कई बार चौंका देता है।

ज्ञानी जन पहले ही कह गए हैं कि सुख-दुख की कोई भी अवस्था अस्थायी है। दुनिया आनी-जानी है। फिर भी हमारा मन दुनिया में ही लगता है , सुख –दुख की छोटी सी छोटी अवस्था से हम प्रभावित होते हैं। किसी का एक हल्का सा व्यंग्य हमें भीतर तक बेध देता है और किसी का सामान्य ममत्व भरा व्यवहार हमें बांध लेता है। दुनिया में जिस रफ्तार से अजनबियत बढ़ी है उसी रफ्तार से घृणा और प्रेम का दायरा भी सिकुड़ा है। हम आज हर चीज से घृणा करते हैं और हर चीज से प्यार, दुनिया मुठ्ठी में है। यह बिना जाने का रिश्ता है। मुश्किल क्या है कि न तो हम जानकर घृणा करते हैं न ही जानकर प्यार। दुनिया के बारे में जो हमारी हाइपोथिसिस है उसके आधार पर हम अनजाने ही घृणा और प्यार के संबंधों को विकसित करते हैं। जैसे प्यार के बारे में कहा जाता है कि वह अनजाने होता है। कई बार घृणा भी अनजाने ही होती है। अर्थात व्यक्तिगत अनुभवों से बाहर के अनुभवों के आधार पर हम घृणा का संबंध विकसित करते हैं। इसमें हमारे अपने अनुभव का कोई साझा नहीं होता। रामचन्द्र शुक्ल की हाइपोथिसिस है कि बिना जाने प्यार नहीं हो सकता । लेकिन जानने का दावा कितना जोखिम भरा है। इस पर शुक्ल जी का ध्यान एकदम नहीं गया। शुक्ल जी के जानने में केवल आधार या अवलंब भर की गुंजाइश है इससे ज्यादा नहीं। इतना जान समझ कर लोग प्यार करते तो प्रेम संबंधों के भीतर इतनी असंतुष्टियाँ न होतीं। इन असंतुष्ट और असहमत स्थितियों को केवल किसी एक जेण्डर पर घटा कर देखना मुश्किल है। यह कह कर संतुष्ट होना मुश्किल है कि यह केवल मेल जेण्डर की बहुगामी प्रवृत्ति के कारण होता है , यह बहुत मोटी व्याख्या है। स्त्री-पुरुष के साथ में सबसे ज्यादा असंतोष स्त्रियों को होता है। इसका ठोस सामाजिक कारण है जेण्डर सप्रेसन और जेण्डर असमानता। लेकिन मसला यह है कि प्यार और संबंधों के ठोस आधार की मौजूदगी भी प्यार के बचे रहने की एकमात्र गारंटी नहीं है। उसके ‘स्थायित्व’ या एकरूप होने की गारंटी नहीं है। प्रेम एकरूप हो ही नहीं सकता। उसे विकसित होना होगा, आगे गति रखनी होगी। अज्ञेय के शब्दों में कहें तो वह बांधता नहीं मुक्त करता है। ये ठीक है कि रामचंन्द्र शुक्ल ने खास साहित्यिक वातावरण में ‘परिचय के प्रेम की’ ये हाइपोथिसिस दी थी। रहस्वादियों की आवरणप्रियता से उन्हें चिढ़ थी। वे चाहते थे कि प्रेम प्रत्यक्ष हो, वे बतला सकें कि फलां कवि या कवयित्री किसे प्यार करता या करती है। पर रामचन्द्र शुक्ल को पता भी चल जाता या पता भी हो तो वे करते क्या। मोरल जजमेंट ही तो देते। खासकर यदि कवयित्रियों के अंतर्मन का पता चल जाता तो क्या करते। सूरदास और मीरा के प्रेम के आधारों का तो पता था। सूरदास को तो दीवाना नहीं कहा , मीरा को कृष्ण के प्रेम में दीवानी कह दिया। मीरा के संदर्भ में तो उनकी खोजी घ्राणशक्ति अलौकिक से लौकिक तक टोह आई लेकिन अन्य भक्त कवियों को उन्होंने तुलनात्मक तौर पर छूट देकर बात की। यही रवैय्या महादेवी के साथ भी है। लेकिन महादेवी भी अपनी टेर नहीं छोड़तीं। आलोचक की आलोचना से डरकर प्रसाद की तरह ‘आंसू’ के अंतिम बंद में धरती के दुखों की बात नहीं करतीं। अरे दुनिया ने तब तक उनके दुखों को ही दुख नहीं माना था, कभी सुना नहीं था, पहले वो तो सुना लें। जिसे अपनी बात न कहनी आती हो वह दूसरों की बात क्या कहेगा। और दुख की कथा के सुनने-सुनाने का एक माहौल भी तो तैयार करना था। क्या प्रगतिशील कविता की यथार्थप्रधान दुखात्मक पृष्ठभूमि के निर्माण में इन स्त्रियों के करुण रोदन का कोई योगदान नहीं है। तुलसी ने भी तो अपनी पीड़ा अपने आराध्य तक पहुँचाने के लिए देवी से उचित अवसर और माहौल देख कर ही बात करने का अनुरोध किया था। तो माहौल का असर तो बाबा तुलसी भी जानते थे। जिसे हम वातावरण बनाना कहते हैं उस अर्थ में निश्चित तौर पर महादेवी का योगदान प्रगतिशील आंदोलन के लिए एजेण्डा सेटिंग का है। आलोचकों का ध्यान इस ओर भी जाना चाहिए।

महादेवी ने लिखा –

हे नभ की दीपावलियों तुम पल भर को बुझ जाना

मेरे प्रियतम को भाता है तम के परदे में आना।

तो प्यार के लिए परदा केवल महादेवी को ही नहीं चाहिए, जैसा कि उन पर आरोप है, बल्कि वे तो अपने प्रियतम की पसंद का ख़याल रख रही हैं। जैसे हर स्त्री अपने प्रिय की पसंद-नापसंद का ख़याल रखती है।