Sunday, May 29, 2011

सलाम ममता

  लाखों की संख्या में आम जनता और और आगे आगे चलती ममता बनर्जी। बंगाल की असल नायिका। जी नहीं ये कोई फिल्मी दृश्य नहीं है।  जैसा कि आपने इधर की कई फिल्मों में देखा है। ये असल दृश्य है। ये ममता के बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथग्रहण के बाद बंगाल के प्रसिद्ध राइटर्स बिल्डिंग तक पैदल चल कर जाने का दृश्य है।


ये जनज्वार जनता की इच्छाओं और दबी हुई आत्मशक्ति का परिचायक है। ममता बनर्जी ने राजभवन से महाकरण तक की यात्रा पैदल तय कर इसी भाव को अभिव्यक्ति दी है। साथ ही ममता क्या घोषणाएं करेंगी मुख्यमंत्री होने के बाद ऐसी किसी ख़बर के आने के पहले ये ख़बर आई है कि ममता मुख्यमंत्री होने के बाद सबसे पहले एक बलात्कृत स्त्री से मिलेंगी। आप इसे लोकप्रिय स्टंट कह सकते हैं पर ये जन भावों की

अभिव्यक्ति है। एक महिला मुख्यमंत्री का सबसे पहले एक पीड़ित महिला से मिलने का कार्यक्रम स्त्री संवेदना और सह-अनुभूति का सुंदर नमूना है। ये उम्मीद हम ममता से ही कर सकते थे।

ममता की उपलब्धियां जन संघर्ष के साथ-साथ स्त्री संघर्ष का भी प्रेरणादायी उदाहरण है। ममता को किसी की विरासत नहीं मिली। किसी का वरद्हस्त भी नहीं मिला। राजनीतिक पायदान पर आगे बढ़ने के लिए ये अनिवार्य अर्हता है पर ममता ने इन सबको झुठलाते हुए न केवल अपने लक्ष्य को हासिल किया है बल्कि जन-जन के भावों को अभिव्यक्ति दी है। यहां तक कि इस बार के सहयोगी गठबंधन कांग्रेस की भी यह

स्थिति थी कि उसने ममता के साथ कई जगह चुनावी मंच साझा नहीं किया। पर ममता सारे प्रतिरोधों को पार कर गई।

ममता ने अपने अब तक के रवैय्ये के अनुसार ही पैदल चलकर महाकरण जाना तय किया। आखिरी समय तक पत्रकार और मीडियाकर्मी क़यास लगाते रहे कि वो पैदल जाएंगी या सरकारी कन्वॉय में गाड़ी से। बंगाल के इतिहास में यह अभूतपूर्व घटना है। असंख्य लोग उन्हें देखने के लिए धक्का-मुक्की कर रहे हैं और मीडिया कर्मी ये नहीं तय कर पा रहे कि वो वी आई पी लिफ्ट द्वारा अपने दफ्तर जाएंगी या सीढ़ियों से।

कैमरे को पता नहीं ऑब्जेक्ट कहां है। सीधा प्रसारण दिखा रहे चैनलों को भी ये नहीं पता था कि वे गाड़ी से नहीं, पैदल जाएंगी। अतः ʻसीधा प्रसारणʼ भी सीधे नहीं दिखा पाया कि ममता किस तरह चलकर जा रही हैं। क्योंकि कैमरे उस अनुसार नियोजित नहीं थे। यह अनियोजन ही जनता की और ममता की ताक़त है। कई जगह बैरिकेड टूट गए। राज भवन जहां हर समय 144 धारा रहती है वहां आज साधारण जनों की भीड़ देखी जा रही

है।

ये वही ममता हैं जिनको स्त्री नेत्री होने के कारण कई तरह से अपमानित किया गया। कई तरह के अपशब्द और दुष्प्रचार किए गए। राजनीति; ताक़त, वर्चस्व और जोर आजमाइश की जगह है। उसमें एक स्त्री का इस मुकाम पर पहुंचना बहुत बड़ी बात है। ममता का प्रतिपक्ष साधारण पार्टी नहीं है। एक संगठित, नियंत्रित और सुचालित पार्टी है। जिसका तीन दशक से ज्यादा बंगाल पर शासन रहा है। हारने के बाद भी जिसके

पास 42 प्रतिशत वोट है। ऐसे में ममता का न तो रास्ता आसान था और न ही चुनौतियां आसान हैं। पर इसमें कोई संदेह नहीं ममता की उपलब्धि बहुत बड़ी है! बंगाल जो सबसे जागरुक राज्य होने का दावा करता है, को पहली महिला मुख्यमंत्री चुनने में 54 वर्ष लग गए! कह सकते हैं पार्टियों ने विकल्प नहीं दिया था । पर जनता को जैसे ही विकल्प मिला जनता ने अपनी राय जाहिर कर दी। ममता ने प्रतिरोध का ही केवल

विकल्प नहीं तैयार किया बल्कि जेंडर का भी विकल्प तैयार किया है। राजनीति की दुनिया में स्त्री मुहावरों और प्रतिरोध की शक़्लें तभी तैयार हो सकती हैं जब महिला नेत्रियां अपने महिला होने की जिम्मेदारियों और दायित्वों को भी याद रखें। ममता की कैबिनेट बैठक की बाद की घोषणाओं की अभी अपेक्षा है। नेत्री के साथ-साथ घोषणाओं और कार्यों को भी खराद पर चढ़ना है। सलाम ममता! सलाम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री!

(20मई 2011 को बांग्ला चैनलों पर प्रसारण देखते हुए)



क्या कहती है सलमान की बॉडी लैंग्वेज

 आजकल सलमान अपनी फिल्म रेडीʼ के प्रमोशन में लगे हुए हैं। इसी क्रम में 26 मई को सलमान स्टार न्यूज के स्टुडियो में आए और स्टार न्यूज के स्टार एंकर-पत्रकार दीपक चौरसिया ने उनका ʻस्टुडियो-साक्षात्कारʼ लिया। इसका 27,28 और 29 मई को रिपीट प्रसारण भी हुआ। इस साक्षात्कार को लेकर ही मेरी ये टिप्पणी है। पहले मैं साक्षात्कार की अंतर्वस्तु पर बात करूं ताकि जिन्होंने न देखा हो वो भी समझ सकें। अमूमन सलमान खान की मीडिया छवि एक गुस्सैल, सस्ती हरकतें करनेवाला, लड़कियों का दिल तोड़ने और उन पर अत्याचार करनेवाला आदि की बनाई जाती है। पर सलमान सीधी बातचीत में लड़कियों से बात करते हुए काफी सावधान, असहज और शर्मीले नज़र आए। यहां तक कि स्टार की कर्मचारी शगुन ने सलमान के 8 पैक ऐब्स देखने चाहे और सलमान ने बड़ी सादगी से कहा कि अभी नहीं फिल्म में देख लें। कैटरीना को लेकर सवाल का जिस तरह से सस्पेंस दीपक चौरसिया बनाना चाहते थे सलमान ने एक मिनट में धो दिया। उन्होंने कहा कि पूछिए आपको जो भी पूछना है। जब आप बात आगे बढ़ा ही चुके हैं तो पूछ ही डालिए ताकि हम ऑर्डर में आगे बढ़ सकें। राखी सावंत सलमान से शादी करना चाहती हैं, सलमान का क्या क्या जवाब है? इस पर सवालकर्ता विनोद कांबली से ʻकहा तू कर लेʼ । बीना मल्लिक सलमान के साथ डेट पर जाना चाहती हैं विषय पर कांबली की टिप्पणी पर कि तुम कितने लकी हो ! सलमान ने जवाब दिया कि तू मेरा सारा लक ले ले और उसे डेट पर ले जा। सलमान एक प्रोफेशनल की तरह जवाब दे रहे थे और अपने काम के प्रति गंभीर दिख रहे थे। और सबसे बड़ी बात कि सरलता से बिना किसी हैंगओवर के जवाब दे रहे थे। वे इस साक्षात्कार में दबंग के गाने पर नाचे भी।

सलमान इस साक्षात्कार के दौरान अपनी मां को कई बार आदर से याद करते दिखे। कहा, मेरी दो माएं हैं-एक सुशीला जी और एक हेलेनजी।

सलमान अपनी शर्ट क्यों उतारते हैं। इस प्रश्न पर सलमान का जवाब था-ताकि लोग मुझे देख कर सीखें ,फिट रहें, जिमों में जाएं, जब अपने आपको आईने में नहीं देख सकते तो लोग क्या देखेंगे। इस देश में युवाओं में ड्रग्स की समस्या है, विशेषकर 6.30 से 8 बजे तक के समय को नशे के जरिए सामाजीकरण में बिताने के बजाए यदि लोग जिम में जाएं तो स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा और सोशलाइजेशन भी होगा। शरीर देखकर लोग प्रभावित होते हैं। फिल्मों और मॉडलिंग के कैरियर के लिए शरीर जरूरी है। यह लव एट फर्स्ट साइट है। अपने को, अपने शरीर को प्यार करना अच्छी बात है। अपनी फिल्मों के दृश्य को सलमान निर्विकार भाव से देख रहे थे। कभी थोड़ी मुस्कान और कभी ʻकैरेक्टर ढ़ीलाʼ पर लिप मूवमेंट करते हुए। सलमान के प्यार के बारे में जानने की बड़ी कोशिश दीपक चौरसिया ने की, पर सलमान ने अपने निजी जीवन को अलग रखा। सलमान के अंदर अपनी उम्र को लेकर कोई दुविधा या असहजता नहीं दिखी। अपनी हीरोइनों और अपने बीच उम्र के अंतर को सहजता से बताया। कहा कि सबसे एंबैरेसिंग कमेंट मेरे लिए यह होता है कि जब मेरी हीरोइन कहती है कि जब वह 3 साल की थी तो आपकी फिल्म देखी।

सलमान आम आदमी के कपडे पहने कर ही स्टुडियो में आए और यह भी कहा कि हीरो आजकल महंगे कपड़ों में आते हैं। युवा उनका अनुकरण करते हैं। मां-बाप की कमाई इतनी नहीं होती कि बच्चे के इस तरह के शौक़ पूरे करें। मैं निजी जीवन में भी सामान्य कपड़े पहनता हूं। महंगे कपड़ों पर खर्च करना पैसे बर्बाद करना है। वास्तव में सलमान ऐसा करते हैं या नहीं पर मीडिया में ऐसा कहना निश्चित ही उपभोक्तावाद के पक्ष में नहीं है।

सलमान ने कहाकि मीडिया ने ही मेरी ईमेज गंभीर और गुस्सैल की बनाई है। इस साक्षात्कार के दौरान सलमान की बॉडी लैंग्वेज एक एक्टर की नहीं, व्यक्ति सलमान की थी। जिसकी अपनी पसंद-नापसंद है और जो हर तरह की स्थितियों में केवल आनंददायी मुद्राएं नहीं बना सकता। स्टार न्यूज के एंकर दीपक चौरसिया के प्रश्नों पर सलमान न तो इंवॉल्व हो पा रहे थे न ही इंज्वॉय कर पा रहे थे। दीपक को भी ये स्थति समझ में आ गई उन्होंने कहा कि मैं इतनी देर से आपको हंसाने की कोशिश कर रहा हूं आप हंस ही नहीं रहे। सलमान का जवाब था, मैं दोस्तों के साथ हंसी-मजाक कर लेता हूं।

सलमान ने व्यंग्य पर भी व्यंग्य किया। इरफान के कार्टून पर व्यंग्य किया जिसमें सलमान के पीछे हाथ में गुलाब का फूल लेकर भागती लड़कियों के लिए सलमान का सेक्रेटरी कहता है कि ʻइन्हें पता है कि सलमान रेडी हैं।ʼ इस कार्टून को देखकर सलमान की टिप्पणी थी कि अभी तक तो मैंने नोटिस नहीं किया कि लड़कियां मुझे गुलाब देती हैं। सलमान ने कहा कि मैं जिंदगी को कार्टून नहीं समझता।

दीपक की मुश्किल ये थी कि वे सलमान की बॉडी लैंग्वेज और जवाबों से भी कुछ समझ नहीं पाए। अपने सवालों की वही घिसी-पिटी लिस्ट दोहराते रहे। सलमान स्टार न्यूज के ऑफिस में हीरो सलमान के भाव में नहीं दिख रहे थे पर एंकर की पूरी कोशिश थी कि पोस्टर फटे और हीरो निकले ताकि उसका स्टुडियो नायक की चरणधूलि से पवित्र हो। चैनल एक घंटे अपने दर्शकों का मनोरंजन कर सके। यहीं पर साक्षात्कार लेनेवाले और देनेवाले का ʻवेब लेंथʼ नहीं मिल पा रहा था और दीपक चौरसिया के सारे बाउंसर पर क्रिकेट के अनाड़ी सलमान छक्के लगा रहे थे।

चैनल बताना चाहता था अपने दर्शकों को कि वो अभी इस क्षण जो कुछ कर रहा है वो ऐतिहासिक है और अनूठा है, एक्सक्लुसिव है। वह अपने स्टुडियो में आए सलमान के हीरोइज़्म को बनाए रखना चाहता था। दीपक चौरसिया से लेकर स्टार न्यूज की अन्य महिला कर्मचारी कोशिश कर रहे थे कि सलमान वो सब करें और वो प्रभाव छोड़ें जो वो पर्दे पर करते और छोड़ते हैं। वो सलमान को भविष्यवक्ता, मीडिया इमेज में निर्मित हीरो की ऐसी छवि कि वो चाहे तो सब कुछ हो सकता है, बनाना चाहते थे पर शादी के सवाल पर सलमान ने इस भाव को समझा और थोड़ी विरक्ति से जवाब दिया कि आप मुझसे ऐसे सवाल पूछ रहे हैं जैसेकि मैं भगवान हूं। ऊपरवाले की मर्जी के बिना कुछ नहीं होता। शादी जब तक नहीं होती तब तक आप नहीं जानते कब होगी, शादी हो गई तो कब तक चलेगी ये भी पता नहीं होता।

सर-सर कह कर बातें करते हुए सलमान ने बताया कि पेंटिंग का शौक मां से मिला। मां अच्छी पेंटर हैं। उन्होंने स्टुडियो में एक पूरे बुजुर्ग चेहरे की पेंटिंग बनाई । पूछने पर तस्वीर के मायने भी बताए। एक पूरा चेहरा, यदि उसमें से सर निकाल दें तो ,हर धर्म में माथे के बिना किसी भी बुजुर्ग का चेहरा एक ही है। धर्म केवल दिमाग़ में होता है।

दोस्ती के बारे में सलमान की राय है कि दोस्ती लाईफ है। सलमान के दो पसंदीदा संवाद हैं- ʻदोस्ती की है निभानी तो पड़ेगी।ʼ और ʻइतना करोकि कभी कम न पड़े पर साला कम पड़ ही जाता है !ʼ इस पूंजीवादी समाज में दोस्ती पर जोर देना महत्वपूर्ण है। यह पूंजीवादी ʻएलियनेशनʼ की काट है पर दोस्ती के मायने दोस्ती का नाटक नहीं। समझना चाहिए कि दोस्ती का भाव कोई सामाजिक मुखौटा नहीं जिसे लगाकर प्रदर्शित किया जाए। यह एक आंतरिक भाव है। दोस्ती का प्रदर्शन और दोस्ती में फर्क़ होता है। शाहरूख से संबंध के सवाल पर साफ कहा कि मेरा झगड़ा नहीं, बनती नहीं मेरी उससे , सोच अलग-अलग है। आवन-जावन में घर को 4-5 बार पास करते हैं टी वी पर माफी मांगने से क्या।

सलमान को देखते हुए कई सवाल बार-बार मेरे मन में आए। सलमान की जगह दो और बड़े नामी खान होते तो इंटरव्यू कैसा होता। शाहरुख़ आंखों से और अपनी भंगिमाओं से बोलते हैं। माहौल को हल्का-फुल्का रखते हैं और पर्दे के शाहरुख़ यानि हीरो शाहरूख़ तथा व्यक्ति शाहरूख़ में फ़र्क नज़र नहीं आता। वही चार्म , वही आकर्षण बना रहता है। पोशाक और अदाएं भी शाहरूख़ की अपनी हैं जो पर्दे पर और बाहर भी बनी रहती हैं। आमीर की स्थिति यह है कि वो एक मीनिंगफुल हीरो और अर्थवान फिल्मों के एक्टर हैं। कम फिल्में करते हैं पर एक संदेश होगा उनकी फिल्म में , एक मायने होगा उनके द्वारा प्रमोटेड किसी भी फिल्म या वस्तु में , यह धारणा उन्होंने स्थिर कर दी है। आमीर -मतलब कुछ मायनेखेज। कह सकते हैं कि आमीर वस्तु के साथ मूल्यबोध जोड़ने में सक्षम हुए हैं। यहां तक कि अपना एक खास दर्शकवर्ग भी आमीर ने तैयार किया है। टी वी पर जब आमीर आते हैं या अपनी फिल्मों का प्रमोशन करते हैं तो उनका अंदाज अलग होता है, पर उनकी बॉडी लैंग्वेज से यह बात साफ जाहिर होती रहती है कि उन्हें पता है उनके काम का महत्व। उन्होंने कुछ कंट्रीब्यूट किया है समाज को।

सलमान की बातचीत, हरकतें और जवाब में एक विनम्रता थी। सर- सर कह कर बहुत विनम्र भाव से वो बातों का जवाब दे रहे थे पर एक आम आदमी की तरह अपनी धारणाओं पर दृढ़ता से क़ायम भी थे। जैसे भारत का आम आदमी है, सुनता वो सब नेताओं की है पर वोट किसको देगा ये राजनीति के तीसमार खांओं को भी नहीं पता होता। उन्माद के खेल का पर्याय बन चुके क्रिकेट को लेकर पूछे गए सवालों पर सीधे जवाब दिया कि क्रिकेट पसंद नहीं है , देखता नहीं हूं। इसी तरह से दीपक चौरसिया के कई आत्मकेंद्रित सवालों पर जैसे कि ʻमेरी शर्ट नहीं उतारिएगाʼ, कैटरिना और अन्य प्रेम संबंधों को लेकर पूछे गए सवालों पर सलमान ने कई बार उपेक्षा दिखाई।

इस ʻस्टुडियो-साक्षात्कारʼ (साक्षात्कार की एक उप-विधा कह सकते हैं) को देख कर यही लगता रहा कि टी वी मीडिया जो विकासशील देशों में सबसे ताक़तवर माध्यम है, अपने द्वारा निर्मित छद्म का ही शिकार होती जा रही है। भगवान या आइकॉन बनाने के उसके टोटके कई बार न केवल भ्रामक बल्कि झूठ दिखाई देते हैं। सलमान ने कुछ नहीं किया बस अपनी सहजता और सहज जवाबों और सच्ची देहभाषा से टी वी मीडिया के अहंकार को आईना दिखा दिया। सलमान अपनी फिल्म ʻरेडीʼ के और भी प्रमोशनल शो करेंगे, अन्य चैनलों पर इस फिल्म के प्रमोशन से जुड़े अन्य कार्यक्रमों के विज्ञापन भी आ रहे हैं पर ये ʻस्टुडियो-साक्षात्कारʼ तो मीडिया पाठ्यक्रम में शामिल करने लायक है !



Tuesday, May 17, 2011

अम्मा का मंगलसूत्र



                                                                

अन्नाद्रमुक पार्टी की नेत्री और तमिलनाडु में चौथी बार चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनी जयललिता ने शपथग्रहण के तुरंत बाद ही अपने कई चुनावी वादे पूरे किए। जयललिता ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा था कि वे चुनाव जीतीं तो शादी करनेवाली लड़कियों को चार ग्राम का मंगलसूत्र देंगी। अब जयललिता चुनाव जीत चुकी हैं और उन्होंने अपना यह वायदा भी पूरा कर दिया है। शादी करनेवाली लड़कियों को चार ग्राम सोने का मंगलसूत्र सरकार की ओर से दिया जाएगा।

वायदे उन्होंने और भी किए थे पर पहले पूरा होनेवाले वायदों में से एक वायदा यह भी है। इससे समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री अपने इस वायदे को लेकर गंभीर थीं। जिन सात वायदों को तुरंत पूरा किया गया है उनमें स्त्रयों से जुड़े दो वायदे हैं – एक तो यह कि शादी करनेवाली लड़कियों को जयललिता सरकार चार ग्राम सोना देगी और महिला सरकारी कर्मचारियों का मातृत्व अवकाश तीन महिने के बजाए छः महीने मिला करेगा। दोनों वायदों में दो तरह के तबके की महिलाओं की जरूरतों का ध्यान रखा गया है- घरेलू और कामकाजी। महिलाओं को मातृत्व अवकाश ज़्यादा समय का मिले- ये तमाम भारतीय और विश्व महिला संगठनों की पुरानी मांग है। निश्चित ही इस दिशा में सुधारमूलक क़दम उठाकर जयललिता सरकार ने प्रशंसनीय कार्य किया है। लेकिन इस दिशा में अभी और बहुत कुछ किया जाना बाकि है। मातृत्व के दौरान स्त्री तमाम भावनात्मक और शारीरिक बदलावों से गुजरती है। मातृत्व तो एक पूरा प्रकल्प है पर गर्भधारण की अवधि भी काफी लंबी होती है। इस लिहाज से छः महीने का अवकाश बहुत नहीं है। शिशु के थोड़ा बड़े होने और स्त्री को अपना स्वास्थ्य पुनः प्राप्त करने के लिए यह समय कम शहरों के एकल परिवार की नौकरीपेशा स्त्री के पास अबोध शिशु को ‘क्रेच’ जैसी जगहों पर जो आज भी हिंदुस्तान में ज़्यादातर अकुशल और गैर-पेशेवराना लोगों द्वारा चलाया जा रहा है , छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। है। साथ ही अपने पेशे में कुशलता को बनाए रखने के लिए स्त्री को अतिरिक्त परिश्रम करना होता है। इस समय की भरपाई भी किसी न किसी रूप में ‘इंसेंटिव’ देकर किया जाना चाहिए। यह अपनेआप में शोध का दिलचस्प विषय हो सकता है कि भारत के विभिन्न राज्यों में मातृत्व अवकाश का प्रावधान क्या है ?

जयललिता की दूसरी घोषणा है कि उनकी सरकार विवाह करनेवाली लड़कियों को चार ग्राम सोने का मंगलसूत्र देगी। यह बड़ी लुभावनी घोषणा है। हिंदुस्तान में गहने और उसमें भी सोने के गहने के प्रति स्त्री ही नहीं पुरुषों की भी आसक्ति है। गहना एक अच्छा निवेश भी है इससे इंकार नहीं। पर किसी सरकार द्वारा विवाह करनेवाली कन्याओं के लिए चार ग्राम के मंगलसूत्र की घोषणा अत्यंत लुभावनी है। सरकारें कई तरह के जनकल्याण और सामाजिक कार्य करती रहीं हैं। कई राजनीतिक पार्टियां और सामाजिक संस्थाएं सामूहिक विवाह का आयोजन करती हैं और उनमें वर-वधू को कुछ उपहार भी देती हैं। एक समय में अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए कुछ धन या वस्तु देने की घोषणा कुछ सरकारों ने की थी। पर जयललिता की यह घोषणा उन घोषणाओं से भिन्न है। इसके साथ कोई सुधारवादी या प्रगतिशील नजरिया नहीं दिखता बल्कि विवाह संस्था की पुरानी तस्वीर को ही वैधता मिलती है। चार ग्राम के मंगलसूत्र की जरूरत उन लड़कियों को होगी जो ग़रीब परिवारों से हैं। ये लड़कियां मंगलसूत्र का क्या करेंगी- परंपरित चलन के अनुसार गले में पहनेंगी और यदि आर्थिक मदद का नुक़्ता शामिल कर लें तो यह भी सोच सकते हैं कि वक्त-जरूरत यह एक संपत्ति के रूप में उनकी मदद करेगा। लेकिन हिंदू परंपरा के अनुसार यह सुहाग की निशानी है और सुहागिन स्त्री इसे अपने से अलग नहीं करती। ऐसे में जयललिता सरकार ने संपत्ति के रूप में मंगलसूत्र दी होगी, यह बात औचित्यपूर्ण नहीं लगती। यह निर्विवाद रूप से एक गहना है और सुहाग की निशानी होने का सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य भी इससे जुड़ा है।

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जयललिता सरकार गहने का यह तोहफा सन् 2011 में भारत की स्त्रियों को दे रही है।

हमारे देश में एक जननायक गांधीजी हुए थे। उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान विभिन्न कामों के लिए धन इकट्ठा करने का अद्भुत तरीका निकाला था। वे जहां भी भाषण या सभा-सम्मेलन के लिए जाते, चंदा मांगते थे। स्त्रियों से वे विशेष तौर पर उनके गहनों का दान मांगा करते थे। यहां तक कि उन्होंने अपने हस्ताक्षर का मूल्य संपन्न परिवार की स्त्रियों के लिए एक हाथ की सोने की चूड़ी रखी थी। गांधीजी जानते थे कि स्त्रियों को अपने गहनों से बहुत मोह होता है। यह आम स्त्री मनोविज्ञान है। ध्यान रखना चाहिए कि इसी आम स्त्री मनोविज्ञान को ही भुनाते हुए जयललिता ने मंगलसूत्र देने की घोषणा की है और इसी आम स्त्री मनोविज्ञान का संज्ञान लेते हुए गांधीजी ने स्त्रियों के गहना प्रेम को लक्ष्य बनाया था और चाहा था कि स्त्रियां अपने गहनों का मोह त्याग दें। एक कुशल जननेता की तरह गांधीजी ने एक समयसीमा रखी थी कि जब तक भारत परतंत्र है भारत की स्त्रियां गहना न पहनें। पर ये प्रतीकात्मक था। इस गहना दान को ग्रहण करने की गांधीजी ने जो शर्त रखी थी वो ध्यान देने लायक और सीखने लायक है। गांधीजी स्त्रियों को विशेषकर बालिकाओं और किशोरियों को उकसाते थे कि वे अपने गहनों का दान करें। भावी पीढ़ी पर उनकी नज़र थी। लेकिन इस दान को स्वीकार करने के पहले कुछ नियम थे उनमें से पहला नियम यह था कि जो स्त्री अविवाहित है वो अपने पिता और विशेषकर माता से गहना दान करने की अनुमति लेगी, वो दोबारा उसी तरह का गहना बनवा देने का आग्रह नहीं करेगी, संभव हो तो आजीवन गहना न पहनने का व्रत लेगी। गांधीजी जानते थे हिंदुस्तानी समाज में गहना एक रोग है और यह न केवल स्त्री को बल्कि पुरुष को भी ग्रसे हुए है। इस कारण गहना दान करनेवाली और आजीवन गहना न पहनने का व्रत लेने वाली लड़की के लिए लड़का मिलना कठिन होगा। इसलिए लड़की को यह भी वचन देना पड़ता था कि वो ऐसे ही लड़के से विवाह करेगी जो उसे फिर से गहना पहनने के लिए बाध्य नहीं करेगा। स्वयं गांधीजी ऐसी व्रती लड़कियों के लिए लड़का ढूंढ़ने का आश्वासन माता-पिता को देते थे। गाधीजी के द्वारा इस काम में सहयोग के कई उदाहरण हैं।

गाधीजी ने स्त्रियों में आभूषण विमुखता की प्रक्रिया को एक नाम दिया था-‘आभूषण-सन्यास’। इस आभूषण–सन्यास के लिए स्त्रियों को उत्प्रेरित करने के पीछे गांधीजी के तर्क बहुत ठोस थे। उनका मानना था कि गहना मनुष्य की स्वाभाविकता को नष्ट करता है। उसके व्यक्तित्व को कृत्रिम बनाता है। गांधीजी का कहना था- ‘मैं जानता हूं कि लड़कियों के लिए यह त्याग कितना कठिन है। हमारे समाज में आज अनेक प्रकार के फैशन देखने में आते हैं, पर मैं तो उसी को सुंदर कहता हूं, जो सुंदर काम करते हैं।’ गांधीजी स्त्री का गहना उसके संस्कार और कर्म को मानते थे। गांधीजी की विचारधारा से प्रभावित होकर प्रसिद्ध उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद ने ‘गबन’ नाम का एक महत्वपूर्ण उपन्यास ही लिख डाला था। इस उपन्यास में नायिका जालपा का आभूषण प्रेम और नायक रमानाथ का गहनों के लिए गबन और अंत में नायिका का कर्ममय व्यक्तित्वान्तरण होता है। इस उपन्यास की उपलब्ध आलोचनाओं में स्त्री के आभूषण प्रेम का समस्यावादी पाठ बनाया गया है पर मेरी जानकारी में अब तक इसकी आलोचना गांधीवादी विचारधारा के इस पक्ष से नहीं की गई है।

ऐसे में सन् 2011 की भारतीय स्त्रियां चाहे वे गांव की हों या शहर की , के लिए अगर ‘अम्मा’ के नाम से मशहूर महिला नेत्री जयललिता उनके व्यक्तित्व के विकास और आर्थिक मदद के लिए कोई और लुभावना तोहफा देती तो क्या ज़्यादा मुफीद नहीं होता ! पर तोहफा तो तोहफा होता है, लेनेवाले से ज़्यादा इसमें देनेवाले की मरजी होती है। लेकिन भारत की स्त्रियों जिसका एक हिस्सा तमिलनाडु की स्त्रियां हैं को ये तोहफा क़बूल करते हुए इसके अन्य पक्षों का भी ध्यान रखना चाहिए। यह जनता के पैसे का ही जनता को तोहफा है जिसमें घरेलू से लेकर काम-काजी स्त्री का भी श्रम लगा हुआ है। क्या जनता को हक़ नहीं कि पूछे कि इससे बेहतर भी कुछ हो सकता था या नहीं ! क्यों स्त्री के मामले में लुभावनी लेकिन ख़तरनाक परंपराओं को ही पोषणा चाहते हैं, शायद स्त्रियां नहीं बोलतीं, उनके प्रतिनिधि संगठन नक्कू बनने का ख़तरा नहीं उठाते इसीलिए न!