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Showing posts from 2012

क्यों मारी जाती हैं अनामिकाएँ? -सुधा सिंह

इस जाते हुए साल के अंतिम दो हफ़्तों में पहली बार स्त्री के मुद्दे पर राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन भारत की जनता ने किया। दिल्ली से लेकर अन्य शहरों और गांवों तक में इसकी गूंज सुनाई पड़ी। मुद्दा 16 दिसंबर की रात दिल्ली की मुनिरका बस स्टॉप से एक प्राइवेट बस में सवार होनेवाली लड़की के साथ बर्बर सामूहिक दुष्कर्म के बाद उसे और उसके दोस्त को घायल करके नग्न अवस्था में नीचे फेंक देने का है। उस लड़की जिसे हम अनामिका कहेंगे कि मौत हो गई। लेकिन इस घटना के बाद भी जबकि जनता का सैलाब पूरी दिल्ली समेत अन्य शहरों को आंदोलित किए हुए था, ऐसी और इससे मिलती-जुलती कई घटनाएं सामने आईं।  इन्हीं धरने-प्रदर्शनों में शामिल हममें से कोई इस तरह के यौन-उत्पीड़न का शिकार हो रही थी और इन्हीं में शामिल हममें से कोई यौन-उत्पीड़न में भागीदार था। क़ानून और संस्थाओं का वही मर्दवादी रवैय्या निकल कर आ रहा था। इन सबके बीच कहीं पुलिस, कहीं परिवार, कहीं समाज, कहीं जाति, कहीं धर्म और अन्य शक्ति के संस्थाओं का वही रूप निकल कर आ रहा था जिसकी तस्दीक सदियों से हमारा पुंसवादी समाज करता आ रहा है।  अनामिका का दाह-संस्कार 29 दिसंबर 2012 को…

उत्तर आधुनिक माध्यम परिदृश्य को कैसे समझें -सुधा सिंह

यह लेख बजरिए मैतेलार्द उत्तरआधुनिक माध्यम परिदृश्य को समझने की कोशिश है। इसे सूचना समाजःएक परिचय पुस्तक की भूमिका के रूप में लिखा गया है। यहां उसका एक अंश दिया जा रहा है।      इस पुस्तक के बारे में विस्तृत जानकारी इस प्रकार है-सूचना समाजःएक परिचय, आर्मंड मैतेलार्द, अनुवाद और संपादन--सुधा सिंह, प्रकाशक ग्रंथशिल्पी, सरस्वती कॉम्प्लेक्स, सुभाष चौक, लक्ष्मीनगर, नई दिल्ली-110092, मूल्य-395 रूपए,2012   
 सूचना समाज पदबंध का संबंध सूचना के बुनियादी रूप से न होकर अत्याधुनिक रूप से है। इसके अंतर्गत एक ऐसे समाज की बात की गई है जो पूरी तरह से सूचनाओं के संजाल से घिरा हो। सूचनाएं उसके उपभोग के लिए अहर्निश उपलब्ध हों। मनुष्य के विचार, चिंतन और दर्शन के सारे रूप सूचनाओं में बदल दिए गए हों। मेतलार्द की ‘सूचना समाज’ की विश्लेषण प्रक्रिया से साफ जाहिर है कि वे मानव मस्तिष्क के निरंतर कुंद किए जाने की प्रक्रिया से परेशान हैं। मनुष्य के परिश्रम को आसान करने के नाम पर ईजाद की गई ये मशीनें मनुष्य को अपनी बुद्धि और मेधा के इस्तेमाल करने से विरत करती हैं।  सूचना युग की महत्वपूर्ण उपलब्धि है कम्प्यूटर। यह आज हर…

किसान क्या खाएं- सहजानन्द सरस्वती

हमने देखा है कि किसानों को दिन-रात इस बात की फिक्र रहती है कि मालिक (जमींदार) का हक नहीं दिया गया, दिया जाना चाहिए, साहू-महाजन का पावना पड़ा हुआ है उसे किसी प्रकार चुकाना होगा, चौकीदारी टैक्स बाकी ही है, उसे चुकता करना है, बनिये का बकिऔता अदा करना है आदि-आदि। उन्हें यह भी चिन्ता बनी रहती है कि तीर्थ-व्रत नहीं किया, गंगा स्नान न हो सका, कथा वार्ता न करवा सके, पितरों का श्राद्ध तर्पण पड़ा ही है, साधु-फकीरों को कुछ देना ही होगा, देवताओं और भगवान को पत्र-पुष्प यथाशक्ति समर्पण करना ही पड़ेगा। वे मन्दिर-मस्जिद बनाने और अनेक प्रकार के धर्म दिखाने में भी कुछ न कुछ देना जरूरी समझते हैं। यहाँ तक कि ओझा-सोखा और डीह-डाबर की पूजा में भी उनके पैसे खामख्वाह खर्च हो ही जाते हैं। चूहे, पंछी, पशु, चोर बदमाश और राह चलते लोग भी उनकी कमाई का कुछ न कुछ अंश खा जाते हैं। सो भी प्राय: अच्छी चीजें ही। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बहुत ही हिफाजत से रखने पर भी बिल्ली उनका दूध-दही उड़ा जाती है। कौवों का दाँव भी लग ही जाता है। कीड़े-मकोड़े और घुन भी नहीं चूकते वे भी कुछ लेई जाते हैं। 
सारांश यह कि संसार के सभी अच्छे-ब…