Monday, December 31, 2012

क्यों मारी जाती हैं अनामिकाएँ? -सुधा सिंह




   इस जाते हुए साल के अंतिम दो हफ़्तों में पहली बार स्त्री के मुद्दे पर राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन भारत की जनता ने किया। दिल्ली से लेकर अन्य शहरों और गांवों तक में इसकी गूंज सुनाई पड़ी। मुद्दा 16 दिसंबर की रात दिल्ली की मुनिरका बस स्टॉप से एक प्राइवेट बस में सवार होनेवाली लड़की के साथ बर्बर सामूहिक दुष्कर्म के बाद उसे और उसके दोस्त को घायल करके नग्न अवस्था में नीचे फेंक देने का है। उस लड़की जिसे हम अनामिका कहेंगे कि मौत हो गई। लेकिन इस घटना के बाद भी जबकि जनता का सैलाब पूरी दिल्ली समेत अन्य शहरों को आंदोलित किए हुए था, ऐसी और इससे मिलती-जुलती कई घटनाएं सामने आईं।
 इन्हीं धरने-प्रदर्शनों में शामिल हममें से कोई इस तरह के यौन-उत्पीड़न का शिकार हो रही थी और इन्हीं में शामिल हममें से कोई यौन-उत्पीड़न में भागीदार था। क़ानून और संस्थाओं का वही मर्दवादी रवैय्या निकल कर आ रहा था। इन सबके बीच कहीं पुलिस, कहीं परिवार, कहीं समाज, कहीं जाति, कहीं धर्म और अन्य शक्ति के  संस्थाओं का वही रूप निकल कर आ रहा था जिसकी तस्दीक सदियों से हमारा पुंसवादी समाज करता आ रहा है।
 अनामिका का दाह-संस्कार 29 दिसंबर 2012 को कर दिया गया। 16 दिसंबर से 30 दिसंबर तक ये घटना मीडिया में प्रमुखता से छाई रही। लोग घरों से निकले। एक बहुत बड़ा दवाब सरकार पर दिखाई दिया। आज भी लोग जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में बैठे हैं।
 मेरा सरोकार इस बात से है कि इस तरह की घटनाएं जिनकी किसी भी सभ्य समाज में जगह नहीं होनी चाहिए भारत में आम क्यों है? कहाँ है वो लोग जो भारतीय सभ्यता-संस्कृति-परंपराओं की दुहाई देते हैं, इनके नाम पर स्त्री के पांवों में बेड़ियाँ डालते हैं, उसके अरमानों का गला घोंट देते हैं, उसकी इच्छाओं को आकार नहीं लेने देते?
 आज 31 दिसंबर,2012 को कुरुक्षेत्र में एक इंजीनियरिंग की छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म की ख़बर है तो जयपुर में  एक नाबालिग इसी तरह की हिंसा की शिकार हुई है। तमाम स्रोतों से भर्त्सनाओं के बावजूद आज फिर एक एम एल ए बनवारीलाल सिंघल (बीजेपी, राजस्थान) कह रहा है कि लड़कियों पर कपड़ों की पाबंदी की लगा देनी चाहिए।
 इसमें यह चीज समझने की है कि हम जिस तरह के समाज में रहते हैं वह भिन्नताओं से भरा समाज है लेकिन उसकी मानसिकता में भिन्नताओं का नकार शामिल है। उनका मातहतीकरण शामिल है। उन्हें हजम कर जाना शामिल है। यह भिन्नताओं के साथ सह-अस्तित्व का समाज नहीं है। जिस वातावरण में घरों में लड़के-लड़कियाँ बडे होते हैं उसमें लड़की के हर स्तर पर बलात्कार के संस्कार शामिल हैं। यह सब इतना महीन है कि अलग से फ़र्क करके देखना कई दफे असंभव होता है। वर्तमान सामाजिक ताने-बाने में स्त्री के साथ किया गया व्यवहार और परंपराएं बहुत स्वाभाविक लगने लगती हैं। इनके बाहर देखना बहुत मुश्किल होता है। इन सबसे बाहर निकलती औरत अजूबा लगती है।
 हम जब पैदा होते हैं तभी विचार लेकर नहीं आते, विचार प्रदत्त नहीं अर्जित होते हैं और इस अर्जन में कई तरह के अनुभवों का कोडिफिकेशन शामिल है। ये अनुभव सामाजिक अनुभव होते हैं, इनके कोडिफकेशन के निर्माण और इसके अर्थ के समझने की प्रक्रिया में हम एक संसार में दाखिल होते हैं जहां इन कोड्स के जरिए एक प्रतिसंसार बनता है, जिसमें हम अपने अनुभव व्यक्त करते हैं, दर्ज़ करते हैं। इस प्रतिसंसार में स्त्री का अनुभव उसका अर्थ न के बराबर रजिस्टर होते हैं।
 यही कारण है कि स्त्री, एक नागरिक के अधिकार से संपन्न होने के बावजूद सामाजिक व्यवहार और रवैय्ये में भिन्न क़िस्म का बर्ताव झेलती है और वह स्वयं भी और उसके साथ, उसके लिए आज मशाल लेकर धरना-प्रदर्शन करनेवाले साथी भी इन व्यवहारों को परिवार के अंदर सहज मानकर या तो चुप रहता है, हो जाने देता है अथवा कहीं न कहीं उसमें शामिल होता है।
 बहुत दुख के साथ मैं कहूँगी कि मुझे आज अनामिका की मौत के बाद स्त्री के पक्ष में उठ खड़ा यह आंदोलन चेतना के स्तर पर केवल गहरे दुख-दर्द-पीड़ा और सहानुभूति से उपजा दिखाई देता है। मेरी नज़र में यह तथाकथित भारतीय नवजागरण का एक तरह का अधूरा रिवाइवलिज़्म है। खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि भारत में स्त्री के हूक़ूक़ की लड़ाई की कोई सुदीर्घ मजबूत परंपरा नहीं है। हम सियासी तौर पर मिले स्त्री-अधिकारों को भी सही तरीक़े से लागू करने में असफल रहे हैं। कारण एक है –स्त्री चेतना और स्त्री-संघर्षों की मज़बूत राजनीतिक उपस्थिति का अभाव। सभी सियासी पार्टियों की स्त्री-शाखा है। पर उनका काम स्त्री के पक्ष में जागरुकता पैदा करना या उसके हक़ों के लिए निरंतर संघर्ष करना न होकर अपनी पार्टियों के लिए महिला वोटों का जुगाड़ करना भर है। यह अस्मिता की राजनीति है , अस्मिता का सशक्तिकरण नहीं।
 2011 में 7 हजार से ज्यादा बलात्कार के केस दर्ज़ हुए। यह संख्या बाद के वर्षों में क्रमशः बढ़ी है। बीते साल ढाई लाख के आस-पास यौन-उत्पीड़न के मामले समाने आए। ध्यान रखा जाना चाहिए कि कोई वारदात आंकड़ों में तब तब्दील होता है जब उसको किसी सरकारी या क़ानूनी रजिस्टर में लिख दिया जाता है। ऐसे दर्ज हुए अपराधों से कहीं बड़ी संख्या उन अपराधों की है जो स्त्री के खिलाफ घटित तो हुए हैं पर कहीं दर्ज नहीं हुए। मां की विवश पीड़ा, पिता-भाई और अन्य रिश्तेदारों की झूठी इज्जत की आड़ में परे धकेल दिए गए। ये मामले पीड़ित स्त्री की, स्त्री होने की संवेदना को भी कुंद कर गए ताकि उसे एहसास न हो कि उसके साथ कुछ ग़लत हुआ है। यह सब स्त्रियों की नियति है, परिवार में ऊँच-नीच घटता रहता है, अब बताओगी तो वैवाहिक जीवन में दरार पैदा हो जाएगी; कुछ ऐसा ही समझाया जाता है। घर की बात घर में रह जाती है। घर के अंदर स्त्री , मां और अन्य भूमिकाओं में उन्हीं वर्चस्व के मूल्यों को स्वीकार कर लेती है जिसका विरोध वह बाहर सड़क पर करना चाहती है।
  मेरी एक मित्र ने पूछा कि जब लड़की इस तरह के यौन उत्पीड़न की घटनाएँ अपनी माँ को बताती है तो माँ क्यों नहीं विश्वास करती? मैं उसे क्या जवाब दूँ कि माँ क्यों नहीं विश्वास करतीवास्तव में माँ अपनी बेटी की बात पर विश्वास करना नहीं चाहती, यह अनजान बनकर या लड़की की बात पर अविश्वास करके ही संभव है। दुखद है कि भारतीय परिवारों में माँ-पिता, विशेषकर माँ की भूमिका विशेष कर्तव्यों की पूरक के रूप में ही प्रशंसनीय है। वह परिवार के अंदर स्वयं मातहत की भूमिका में होती है। उसकी राय पति की राय से बनती-बिगड़ती है। उससे अलग व्यक्तित्व की उम्मीद, स्त्री के पक्ष में खड़ा होने की उम्मीद करना अभी मुश्किल है। जब तक संबंधों की पवित्रता पर आंच ना आए या कोई क्रूर-हिंसक स्थिति न पैदा हो, आम तौर पर तब तक मां अपनी बेटी के साथ खड़ी नहीं दिखाई देती।
  मैं एक सवाल और रखना चाहती हूँ। इस उद्वेलित माहौल में जितनी घटनाएं मीडिया के द्वारा सामने लाई जा रही हैं वे सब स्त्री पर यौन-उत्पीड़न के केवल एक पक्ष को सामने ला रही हैं। सार्वजिनक स्पेश में अनजान लोगों द्वारा हिंसक यौन-उत्पीड़न की घटनाएं ही खोज-खोजकर सामने लाई जा रही हैं। पर घरों के अंदर, संबंधों के बीच जो कुत्सित घटनाएं घटती हैं , उन पर बात नहीं हो रही है। कारण कि इसके संदर्भ में पितृसत्ता का सारा सड़ा-गला ढ़ाँचा हमारे सामने नंगा हो जाएगा। उन सब पर बात करनी पड़ेगी।
 स्त्री के संदर्भ में पितृसत्ता का मोडस-ऑपरेंडी बड़ा महीन तरीक़े से काम करता है। कई बार इसका प्रदर्शन पिता –भाई-चाचा नहीं करते बल्कि मां-बहन-भाभियां-चाचियाँ करती हैं और वह समान रूप से क्रूर होता है। यह स्त्री-चेतना के अभाव और पितृसत्तात्मक मूल्यों का स्त्री द्वारा आत्मसातीकरण से संभव होता है। इस नृशंस यौनिक हिंसा की घटना के बाद भी जो बयान आ रहे हैं, वे स्त्री की सुरक्षा को लेकर हैं। पितृसत्ता भी दावा करता है कि स्त्री की सुरक्षा के सर्वाधिक सुरक्षित आजमाए हुए उपाय उसी के पास हैं। पितृसत्ता का दूसरा एजेंडा है अभिभावकत्व। इसके लिए सुरक्षा का सवाल, घर के बाहर का सवाल है। घर के अंदर उदार अभिभावकत्व विराजमान है; जिसके दिल में अपनी चिरैया, गौरैय्या, गैय्या, सुगना आदि-आदि के लिए प्यार का समंदर है। इसी प्यार के नाम पर अभिभावकीय  दायित्व बोध के तहत स्त्री के चयन और निर्णय की निजी नागरिक स्वतंत्रता का अपहरण किया जाता है। माता-पिता-भाई एक जैसे चिंतित होते हैं स्त्री के घर से बाहर रहने पर, देर से आने पर! घर से बाहर रहने की उसकी अवधि का अपहरण सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत सहज लगता है। अभिभावकीय बोध के कारण यह मान लिया जाता है कि एक बालिग लड़की को अपना हित-अहित नहीं मालूम, वह अपने फैसले नहीं ले सकती, अपने लिए सही-ग़लत का विचार नहीं कर सकती, अतः उसके पक्ष से उसके जीवन के निर्णायक फैसले लेने का हक़ अभिभावक को है। स्त्री के प्रति इन पितृसत्तात्मक विचारों का प्रसार अन्य सामाजिक संस्थानों में सहज ही देखा जा सकता है।
 यह पितृसत्तात्मक विचारों का प्रतिफल है कि स्त्री की इज़्ज़्त की बात करते हुए इस शब्द को उसकी गरिमा और अस्मिता से नहीं जोड़ा जाता बल्कि परिवार, समाज ,जाति, धर्म, नस्ल और राष्ट्र से जोड़ा जाता है। भारतीय स्त्री, यूरोपीय स्त्री, हिन्दू स्त्री, मुसलमान स्त्री, अरब औरतें जैसे संज्ञावाचक वैशेषिक शब्दों की आड़ में स्त्री की अस्मिता, स्त्री का बोध गौण हो जाता है और भारतीय, यूरोपीय, हिन्दू, मुसलमान, अरब जैसी संज्ञाएं अपने विशेष संदर्भों के साथ चमकने लगती हैं।
 महत्वपूर्ण यह देखना भी है कि आधुनिकता का प्रकल्प, जिसने मुक्तिकामी और विकासमूलक शक्तियों के साथ हाथ मिलाकर मध्यकालीन व्यवस्था, बोध और संस्थाओं को ध्वस्त कर अपनी राह बनाई स्त्री के संदर्भ में उसके सबसे बड़े उत्पीड़क-दोहनकर्ता, पितृसत्ता और पितृसत्तात्मक मूल्यों को क्यों नहीं पछाड़ पाया? सामंती व्यवस्था के ख़ात्मे के साथ पितृसत्ताक मूल्यों को भी धराशायी होना था , पर ऐसा नहीं हो पाया। मोटे तौर पर इसका एक कारण तो विभिन्न समाजों में आधुनिकता के विकास की विभिन्न विषम स्थितियाँ हैं लेकिन आधुनिक समाजों में भी स्त्री की स्वायत्ता और मुक्ति की पिछड़ी स्थितियों को देखते हुए इतना सपाट जवाब संभव नहीं है। अस्मिताओं की मुक्ति के नाम पर स्त्री का वस्तुकरण एक समस्या है।
 पूँजीवाद ने जिस जन-संस्कृति को जन-उपभोग के लिए पैदा किया उसमें पुरानी सभ्यता और संस्कृति के परंपरित रूप अत्यंत फूहड़ नजर आते हैं। इसने एक तरफ आभिजात्य रूपों को पहुँच से बाहर बनाकर और दूसरी तरफ वैश्विक के अंदर स्थानीयता का बोध पैदा करने के नाम पर लोक-परंपराओं और संस्कृतियों को भदेस ढंग से पुनरुत्पादित किया। जिसका नमूना जलेबी बाईचिकनी चमेलीहलकट जवानीशीला की जवानी’, जैसे सांस्कृतिक उत्पाद हैं। इस प्रक्रिया में सबसे आसान लक्ष्य स्त्री की छवियों का रूपायन बना।
 सांस्कृतिक उत्पादों को तेजी से पैदा करनेवाला सबसे अहम उद्योग आज के दौर में जन-माध्यम हैं। इसमें टेलीविजन मुख्य है। अपने रोजमर्रा की खपत के लिए तैयार सांस्कृतिक उत्पादों में यह पूरी तरह पितृसत्तात्मक मूल्यों को पोषित करता है। न्यूज़-व्यूज और मनोरंजन–-- इन तमाम प्रस्तुतियों में एक खास तरह का यथा-स्थितिवाद है जो एकता कपूर के धारावाहिकों से लेकर सनसनी जैसे कार्यक्रमों में दिखाई देता है।
 जन-माध्यमों की भाषा, इनका नजरिया सब कुछ सामाजिक शक्ति-संतुलन के अनुरूप है। इसमें स्त्री के संदर्भ में सेक्स के बाजारीकरण ने अपने तरीक़े से योगदान किया है बल्कि कहें कि स्त्री के एक सामाजिक इकाई के रूप में अस्तित्व के लिए, असहिष्णु-आक्रामक वातावरण का निर्माण किया है। सेक्स और नशे के कारोबार का गहरा संबंध है। समाज में सेक्स कोई ऐसी चीज नहीं कि जिस पर बात न होती रही हो या जिस पर लिखा-रचा-गढ़ा न गया हो! सेक्स और सेक्सुअलिटी हमेशा से ही आकर्षण का केन्द्र रही है, विशेषकर स्त्री-सेक्सुअलिटी। लेकिन यह हमेशा पॉवर डिस्कोर्स के अंतर्गत पुरुष के संदर्भ से व्याख्यायित की जाती रही है।   
  अब तक यह माना जाता रहा कि 'सेक्सवह है जो पुरुष करते हैं। स्त्री के 'सेक्सकी हमेशा अनदेखी हुई। स्त्री का सेक्स हमेशा अतिक्रमित करने लायक, आघात पहुँचाकर हासिल करने लायक, जबरिया पहल करने लायक माना गया। स्त्री के इस संदर्भ में प्रतिरोध को उसका स्वीकार समझा गया। यह नजरिया यौन-उत्पीड़न के कई मामलों में न्यायधीशों के फैसले तक का हिस्सा बनी। कहीं कहा गया कि जींस पहनी हुई लडकी से पुरुष कैसे बलात्कार कर सकता है, या जब बलात्कार किया जा रहा था तो स्त्री चिल्लाई क्यों नहींअर्थात् प्रतिरोध नहीं किया , चुप थी, तो यह यौन-उत्पीड़न स्वीकार था ! सामाजिक चेतना में कहीं गहरे पैठा हुआ है कि सेक्स के मामले में स्त्री का उत्पीड़न करके ही पुरुष को आनंद मिलना संभव है। यह स्थित कभी संभव ही नहीं हो पाई कि स्त्री के लिए भी पुरुष का दैहिक संसर्ग आनंद की स्थितियाँ पैदा करनेवाला हो सके, स्त्री के इस संदर्भ में अनुभवों की कोई अहमियत हो। शायद इसमें पुरुष सेक्स के खारिज किए जाने का गहरा भय शामिल है।
  स्त्री के प्रति आक्रामक सामाजिक व्यवहार का एक बड़ा उत्स है --पोर्नोग्राफी। आज इसका वीडियो-सीडी और फिल्मांकन की दुनिया में बहुत बड़ा अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार है। पोर्नोग्राफी की भाषा और दृश्यबर्बर आदिम इच्छाओं का रूपायन होते हैं। इसमें सभ्यता के विकासक्रम में अर्जित समस्त शिष्ट आचरण ध्वस्त किए जाते हैं। इसमें इस तरह के दृश्य और भाषिक संयोजन किए जाते हैं जो अलग-अलग मानसिकता वाले लोगों को संतुष्ट कर सकें।
   हमारे सुरुचि और सामाजिक संस्कार को तराशने वाले सूक्ष्म-महीन से लेकर बाजारू, जितने भी माध्यम हैं- मसलन कविता, गीत, चित्र, जन-माध्यमों की प्रस्तुतियाँ , सभी स्त्री-यौनिकता के दमन और पुरुष कामुकता के दबंग प्रदर्शन की कसीदाकारी हैं ! आर्थिक सुरक्षा से जुड़े पुरुष-प्रयासों को 'सेक्सकहा गया यह उसके पौरुष के दायरे में शामिल हुआ। किन्तु इसी के लिए किए गए स्त्री के प्रयास को 'सेक्सनहीं माना गया। अद्भुत विरोधाभास है कि एक तरफ तो स्त्री को स्त्रियोचित गुणों को धारण कर महान बनने को महिमामंडित किया गया; स्त्रीत्व को बनाए रखने की सलाह दी गई; सुंदर दिखना स्त्री के लिए आवश्यक अर्हता बना दी गई; कई काम के क्षेत्रों में सुंदर और आकर्षक और जवान होना-दिखना  केवल स्त्री के लिए आवश्यक है बल्कि उसकी आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। वहीं, दूसरी तरफ उसके कपड़ों, सौंदर्य-प्रसाधनों, यौवन तक को उसके प्रति होने वाले यौनिक अपराधों और हर पल घटित होने वाले आक्रामक व्यवहार के लिए जिम्मेदार बताया गया! छींटाकशी, यौनिक इशारे, अश्लील हरकतें, घूरती निगाहें --स्त्री के प्रति बहुत आम आक्रामक सामाजिक व्यवहार का हिस्सा हैं! जिन्हें आम तौर पर स्त्रियां नहीं बतातीं। नजरअंदाज करती हैं; पर जो उनके साथ रोज होता है।
  पुरुष के आनंद के क्षण को घर या बाहर सृजित करना कभी काम के दायरे में नहीं आता लेकिन स्त्री पर यौन-उत्पीड़न के लाइसेंस के रूप में उसे जरूर मान लिया जाता है।
 यह समय गहरे आत्म-मंथन और सामाजिक मंथन का है। अब स्त्री के लिए संस्थाओं के यथा-स्थितिवादी रवैय्ये से काम नहीं चलनेवाला। समाज, परिवार, क़ानून, शिक्षा-व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव के साथ–साथ स्त्री के प्रति पारिवारिक रवैय्ये में भी बदलाव की जरूरत है। चूँकि स्त्री बनाने के कारख़ाने का मुख्य कल हमारा परिवार ही है तो स्त्री के प्रति रवैय्या बदलने की शुरुआत भी वहीं से होनी चाहिए। परिवार के अंदर स्त्री को लेकर नजरिए में बदलाव सबसे अहम इसलिए हैं कि कई बार सरकारी सुविधाओं की मौजूदगी भी परिवार की आर्थिक-सामाजिक जरूरतों और पाबंदियों पर भारी पड़ता है। लड़की को घरेलू कामों में लगा दिया जाता है, उसके खेलने और पढ़ने के समय को काटकर उस पर घर में छोटे भाई-बहनों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी सहजता से डाल दिया जाता है, इसके अंदर लड़की को भविष्य की घरेलू जिम्मेदारियों के लिए प्रशिक्षित करने का पवित्र अभिभावकीय उद्देश्य शामिल होता है,  कहीं स्कूल-कॉलेज होने पर भी किशोरवय में उसकी शादी कर दी जाती है क्योंकि यही सामाजिक-जातिगत परंपरा है!
  इसके साथ ही स्त्री की शिक्षा और राजनीति में ज़्यादा से ज़्यादा भागीदारी को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। तैंतीस प्रतिशत क्यों पचास प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए, उसमें चाहें तो आरक्षण के भीतर आरक्षण की समाजवादी पार्टी की मांग को शामिल कर लें! अगर वास्तव में हम स्त्री उत्पीड़न की निरंतर बढ़ रही घटनाओं से पीड़ित हैं और सरोकार महसूस करते हैं तो राजनीतिक तौर पर लंबित इस क़दम को शीघ्रताशीघ्र उठाया जाना चाहिए। स्त्री-सशक्तिकरण के लिए परिवार-शिक्षा और राजनीति – ये तीन महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जिन पर निरंतर काम करने की जरूरत है। इसके साथ ही यौन-उत्पीड़न के ख़िलाफ सख़्त से सख़्त क़ानून बनाने चाहिए। यौन-उत्पीड़न से जुड़ी हत्या में दुर्लभ से दुर्लभतम मामले का प्रावधान कर फाँसी की सजा से भी परहेज नहीं किया जाना चाहिए। अन्य मामलों में भी अत्यंत सख़्त क़ानून बनाएं जाने चाहिए जो स्त्री के प्रति आक्रामक व्यवहार पर रोक लगा सकें।    


Saturday, December 8, 2012

उत्तर आधुनिक माध्यम परिदृश्य को कैसे समझें -सुधा सिंह


  यह लेख बजरिए मैतेलार्द उत्तरआधुनिक माध्यम परिदृश्य को समझने की कोशिश है। इसे सूचना समाजःएक परिचय पुस्तक की भूमिका के रूप में लिखा गया है। यहां उसका एक अंश दिया जा रहा है।    
 इस पुस्तक के बारे में विस्तृत जानकारी इस प्रकार है-सूचना समाजःएक परिचय, आर्मंड मैतेलार्द, अनुवाद और संपादन--सुधा सिंह, प्रकाशक ग्रंथशिल्पी, सरस्वती कॉम्प्लेक्स, सुभाष चौक, लक्ष्मीनगर, नई दिल्ली-110092, मूल्य-395 रूपए,2012   

 सूचना समाज पदबंध का संबंध सूचना के बुनियादी रूप से न होकर अत्याधुनिक रूप से है। इसके अंतर्गत एक ऐसे समाज की बात की गई है जो पूरी तरह से सूचनाओं के संजाल से घिरा हो। सूचनाएं उसके उपभोग के लिए अहर्निश उपलब्ध हों। मनुष्य के विचार, चिंतन और दर्शन के सारे रूप सूचनाओं में बदल दिए गए हों। मेतलार्द की ‘सूचना समाज’ की विश्लेषण प्रक्रिया से साफ जाहिर है कि वे मानव मस्तिष्क के निरंतर कुंद किए जाने की प्रक्रिया से परेशान हैं। मनुष्य के परिश्रम को आसान करने के नाम पर ईजाद की गई ये मशीनें मनुष्य को अपनी बुद्धि और मेधा के इस्तेमाल करने से विरत करती हैं।
 सूचना युग की महत्वपूर्ण उपलब्धि है कम्प्यूटर। यह आज हर तरह की गणना कर सकने में सक्षम है। इंटरनेट के कारण यह त्वरित सूचना का  भी केन्द्र है। आज कम्प्यूटर की गणना प्रणाली के आधार पर विकसित सभी उपकरणों में नेट की सुविधा हासिल की जा सकती है। छोटे से जेबी मोबाइल के अंदर भी हम दुनिया के साथ जुड़े होने का एहसास पाल सकते हैं। ऐसा लगता है जैसे इस छोटे से कम्प्यूटर मशीन के आगे बैठा आदमी किसी जादुई दुनिया के दरवाजे पर बैठा हो। लेकिन ग़ौरतलब है कि कम्प्यूटर के की बोर्ड का प्रयोग कर रहा आदमी क्या भाषा भी जानता है ? भाषा के अक्षरों से हाथ, मस्तिष्क और विचारों का जो संबंध है वह कम्प्यूटर के कीबोर्ड से नहीं है। वहां फॉरमेटेड भाषा है। अक्षरों को केवल करीने से रखना भर है। भाषा बनानी नहीं पड़ती , बनी हुई है, इन्हें व्यवस्थित करके रख देना भर है। इसलिए आब सुलेख की बात नहीं की जा सकती। ʻकम्प्यूटर-लेखʼ की बात की जा सकती है।
 हैरोल्ड इन्नीस की तरह ही मेतलार्द ने विभिन्न समाजव्यवस्थाओं के साथ मशीन के संबंध को जोड़कर देखा है। गणना की मशीनों, विशेषकर कैलकुलेटर का विकास पूंजीवाद के विकासशील दौर की जरुरत थी जबकि व्यापारियों और सटोरियों के लाभ और व्यापार के लिए आंकड़ों के संग्रह, भंडारण और बाजार थे। समय और स्थान की अवधारणा बदल रही थी। मनुष्य को उसकी परिस्थितियों से आजाद करने की कोशिशों ने मशीनों पर निर्भरता बढ़ाई। इस क्रम में सूचना को बुद्धि का पर्याय मान लिया गया। लेकिन इस ‘इनफॉर्मेनेशन’ का ‘इंटेलिजेंस’ से कोई लेना-देना नहीं, यह सूचनासंग्रह मात्र है। सांख्यिकी के बढ़ते प्रभाव ने सूचनाओं को आंकड़ों में बदलने का काम किया। विकास, ह्रास, जनसंख्या, आमदनी, नफा-नुकसान सब अब अंक, दर और प्रतिशत में व्याख्यायित होने लगे। संख्याओं के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े रूप को दर्ज करना संभव हुआ। अध्ययन की नई पद्धतियों सर्वेक्षणमूलक , तुलनात्मक और सारणिबद्ध आदि का चलन शुरू हुआ। अब एक राज्य या देश के संदर्भ में दूसरे राज्य या देश को पिछड़ा या अगड़ा बताना ज़्यादा आसान था। विकसितअविकसित की कोटियां तय करने का आधार ये आंकड़े बनते गए। मेतलार्द ने बहुत साफ-साफ समझाने की कोशिश की कि सर्वेक्षणमूलक अध्ययन का आधार राजनीतिक अंकगणित है।
अंकगणित की इस शाखा का जन्म ही राज्य द्वारा जनता की विभिन्न गतिविधियों का हिसाब-किताब रखने के लिए हुआ है। विशेषज्ञों ने प्रत्येक क्षेत्र में सरकारी इस्तेमाल की नई भाषा का विकास किया। अब हर क्षेत्र की अपनी विशिष्ट भाषा थी।
 चिकित्साशास्त्र के अंतर्गत मनुष्य के शरीर को एक बड़े मशीन के रूप में देखने की पद्धति ने उसकी आत्मा को न्यून बनाया। मेतेलार्द के अनुसार सामाजिक प्रक्रिया का यह जैविक दृष्टिकोण नए किस्म की शक्ति संरचना को दर्शाता है। यह नजरदारी और सुरक्षात्मक तकनीक के बढ़ते महत्व को दर्शाता है। विशेषकर मनुष्य को एक-एक क्षण के लिए मशीनों के जरिए बांधकर और अनुशासन में रखने की प्रक्रिया को दर्शाता है। यह मनुष्य को पालतू और गुलाम बनाए जाने की भी प्रक्रिया है। ‘नॉर्मल’, ‘स्तरीय’ , ‘बराबरी’ जैसे पदबंध मूलतः ज्यामितिशास्त्र की देन हैं। राजनीतिक समाजशास्त्र के क्षेत्र में इन्हें लागू करते वक्त हर तरह के स्थानीय पुट और विभिन्नताओं को मिटाकर एक मानक रूप पर जोर होता है।
 हर नई तकनीक मानवीय दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तनों के दावों के साथ आती है लेकिन इन पर लगाई गई लागत और श्रम के मुकाबले इनसे होनेवाले लाभों की न्यूनता पर किसी का ध्यान नहीं जाता। ज़्यादातर इनकी असफलताओं को भुला दिया जाता है। इसका सबसे घातक रूप तकनीकी नियतिवाद है।
 समाज को एक बड़े औद्योगिक इकाई के रूप में देखने के नजरिए ने प्रबंधन युग की नींव डाली। औद्योगिक प्रबंधकों की तरह ही सामाजिक प्रबंधकों की जमात शिक्षा, उद्योग, सामाजिक आपदा , सामाजिक आयोजनों आदि के क्षेत्र में कुकुरमुत्ते की तरह पैदा हुए। इनका लक्ष्य मनुष्य नहीं वस्तुएं बनीं। सांख्यिकी और प्रबंधन के इस नए विज्ञान में मनुष्य एक ‘औसत सामाजिक आदमी’ में अवमूल्यित हो जाता है। इसके लिए सत्ता की तरफ से उसके लिए जो भी दिया जाएगा वह उपलब्ध सामाजिक औसत से ज्यादा नहीं होगा। इस आदमी की सारी उपलब्धियां यहां तक कि जीवन का मूल्य भी औसत ही होता है। बीमा कंपनियों के सारे तर्क, सरकार की समस्त कल्याणकारी योजनाओं का सार यही है- आदमी का औसत के रूप में अवमूल्यन।
 मेतलार्द ने हैरॉल्ड इन्नीस, लेरोइ गोरहान, मार्शल मैकलुहान आदि की अवधारणाओं का विस्तार से मूल्यांकन किया है। सभ्यता के विकास का संबंध, विशेषकर साम्राज्यवादी वर्चस्व के विकास का संबंध मशीनों के साथ गहरे जुड़ा है। मनुष्य की स्मृति मशीनों के विकास के साथ-साथ अंतर्मुखी से बहिर्मुखी हुई। मशीन का विस्तार मनुष्य के विस्तार का पर्याय बनता गया। ये अब जगजाहिर है कि कम्प्यूटर नेटवर्क का विकास अमेरिका की सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए हुआ था। इसी तरह से ʻसूचनाʼ का सतही अर्थ ख़बर या जानकारी मात्र नहीं थी बल्कि सूचना का अर्थ विभिन्न तकनीकी माध्यमों द्वारा दुनिया के अन्य देशों की खुफिया जानकारियां एकत्रित करनी थी। वन्नेवर बुश से लेकर क्लॉड शैनन तक का संबंध अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा शोध समिति से था।  
 आमतौर पर यह मानते हैं कि तकनीक और विज्ञान का धर्म और अंधविश्वास से छत्तीस का आंकड़ा है। तकनीक की तुलना में धर्म को पिछड़ा विचार माना जाता है पर किसी भी नई तकनीक या वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ समाज की मौजूदा शक्तिशाली संस्थाओं का गहरा रिश्ता होता है। मैकलुहान के नई तकनीक के संबंध में विश्व प्रसिद्ध विचारों का उसके धार्मिक विचारों के साथ गहरा संबंध है। कम्प्यूटर के जरिए इंटरनेट की जिस रियल टाईम स्पेस की क्षमता पर हम आज मुग्ध हैं वह दरअसल ʻसेजʼ (सेमी ऑटोमेटिक ग्राउण्ड एनवावॉयरमेंट सिस्टम) की परमाणु युद्ध के ख़तरे का सामना करने के लिए तैयार की गई रणनीति थी। यह दुश्मन की खोज करना, तत्काल निर्णय लेना और उस पर जवाबी कार्रवाई करने का एक संपूर्ण परिपथ था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से तकनीकी अनुसंधान में आई तेजी और इंटरनेट के तीव्र विकास का संबंध सैन्य कार्रवाई की जरूरतों को पूरा करने के लिए किए जा रहे शोधों और परमाणु शोधों से है।
 ध्यान रखना चाहिए कि द्वीतीय विश्वयुद्ध ने यह स्थिति साफ कर दी थी कि आगे आनेवाली लड़ाइयों में वायुसेना की ताक़त ही निर्णायक ताक़त बनने जा रही है। सूचना नेटवर्क का सारा खेल इसी ताक़त को हासिल करने से जुड़ा है। साथ ही ʻसूचना युगʼ और ʻसूचना समाजʼ जैसे पदबंध को समझने के लिए जरूरी है कि हम ʻजनसमाजʼ , ʻउत्तर औद्योगिकʼ, ʻउत्तर पूंजीवादीʼ और ʻउत्तर आधुनिकʼ पदबंधों को भी समझें।
   क्यों उत्तर औद्योगिक समाज में उत्पादन से ज़्यादा महत्वपूर्ण सेवा क्षेत्र हो गए ? इस पर विचार की जरूरत है। पेशेवर और प्रशिक्षित लोगों की तादाद श्रमिकों की तादाद की तुलना में कई गुना ज़्यादा तेजी से बढ़ी है। इसी प्रकार उत्पादन की जगह प्रबंधन ने ले लिया है। सूचना समाज के अंतर्गत ʻग्लोबल विलेजʼ की अवधारणा को इस परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। डेनियल बेल द्वारा ज्ञान और विश्वविद्यालयों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया, जिनमें से विश्वविद्यालय ज्ञान के विश्वव्यापी सूचनातंत्र के उत्पादन का केन्द्र थे। ये ज्ञान को इकट्ठा करने और एक अंतर्राष्ट्रीय पेशेवरों की जमात तैयार करने की प्रयोगशाला के रूप में विकसित हो रहे थे। ये सब सन् 70 के दशक में ज्ञान के विकास की अमेरिकी नीति के तहत हो रहा था। ग़ौरतलब है कि यही हाल आज के समय में भारतीय विश्वविद्यालयों का भी है।
 मेतलार्द ने इस पुस्तक में विस्तार से तकनीक और नेटवर्क के प्रसार के साथ बदलती हुई सामाजिक अवधारणाओं को प्रस्तुत किया है। खासकर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की सैन्य जरुरतों के अनुसार तकनीक के विकास की ब्रिटिश-अमेरिकी नीति और इसके अनुरूप ही जनसमाज की जगह ज्ञानसमाज और सूचना समाज की अवधारणाओं के विकास का विस्तार से विश्लेषण किया है। इसमें उत्तर औद्योगिक युग के प्रवक्ता डेनियल बेल से लेकर भविष्यवादी विश्लेषक एलविन टॉफलर तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय में साम्यवादी देशों के विशेषज्ञ ज़्बिग्नेव ब्रेजेंस्की के ʻटेक्नोट्रॉनिक युगʼ का विस्तार से आकलन है।
   मनुष्य के साझे ज्ञान को पहुंच के अंदर रखने के लिए और मांग पर तत्काल उपलब्ध होने के लिए जरूरी था कि विश्व सूचना संजाल का निर्माण किया जाता। पुराने आदर्श सार्वजनीनतावाद को अपदस्थ करके केवल नेटवर्क की सार्वजनीनता का अभियान चला। इसकी अगुवाई अमेरिका ने की और अन्य तथाकथित पिछड़े देशों ने तकनीक, पद्धतियां और सांस्थानिक आदतों को अमेरिका से उधार लेकर अपने ʻपिछड़ेपनʼ को कम करने की कोशिश की।
   भारत में भी नब्बे के दशक में ʻज्ञान समाजʼ की अवधारणा फल-फूल रही थी और उसी दौर में सैम पित्रोदा इसके ʻआईकॉनʼ बने। ध्यान रहे कि अमेरिका में नेटवर्क समाज के सभी प्रवक्ताओं का संबंध किसी न किसी रूप में अमेरिका की सैन्य और रक्षा विभागों से रहा है। ʻग्लोबल गवर्नेंसʼ या ʻपैन अमेरिकी प्रशासनʼ की तुलना में वैश्विक नियमन ज़्यादा कारग़र नीति है और इस नियमन का वाहक आधुनिक समय में नेटवर्कों का संजाल ही हो सकता है।    
 सन् 1970 में जोर-शोर से उछाली गई ʻसूचना-समाजʼ की अवधारणा ने राष्ट्र-राज्य के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगाया। यह सवाल उठा कि सूचना के वैश्विक तंत्र के सामने राष्ट्र राज्य का क्या अस्तित्व रह जाता है? कुछ देशों ने इसका प्रत्युत्तर सूचना उद्योग के क्षेत्र में देशी कंपनियों को बढ़ावा देकर करने की कोशिश की।
   सन् सत्तर तक सूचना के नियमन और डिरेगुलेशन की बातें आम नहीं हुई थीं। इसी क्रम में जापानी माध्यम सिद्धांतकार योनेजी मसूदा का नाम उल्लेखनीय है। तकनीक के क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों पर निर्भरता कम करने और देशी तकनीक विकसित करने के क्रम में दुनिया के देशों को आई बी एम कंपनी का भारत के साथ किया गया व्यवहार उत्प्रेरक बना। आई बी एम ने अचानक भारत से निकल जाने का निर्णय लिया और अपनी पूंजी में से कुछ भी देने से इंकार किया। इस घटना ने तकनीकी स्वनिर्भरता के लिए न केवल भारत को बल्कि अन्य निर्भर देशों को भी उत्प्रेरित किया। अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों पर तकनीक के हस्तांतरण के लिए दबाव बनाने के लिए इसे समझौते का हिस्सा बनाया गया। जापान, भारत, ब्राजील आदि देशों का जोर तकनीकी क्षेत्रों में देशीकरण की तरफ बढ़ता गया।
   80-90 के दशक में कंप्यूटर के बढ़ते प्रयोग को बेरोजगारी का बड़ा कारण बताया गया साथ ही सार्वभौमिकता की रक्षा के लिए अपने डाटा बैंक के निर्माण पर जोर दिया गया। कल्याणकारी राज्य के मॉडल में विश्वास करनेवाले देशों के लिए नोरा और मिन्क की रिपोर्ट खासा मायने रखती है जिसमें कहा गया कि सार्वजनिक सेवा की भावना सामने होनी चाहिए और सार्वजनिक अधिकारियों की देख रेख में नेटवर्क के स्तरीकरण से लेकर सैटेलाइटों के लॉन्च करने से लेकर डाटा बैंक के निर्माण तक की कार्रवाइयों को अंजाम देना चाहिए। केवल ये ही समाज के मौलिक ढांचे को आधार प्रदान कर विकास का नया मॉडल दे सकती है। सन् 80 के दशक में फ्रांस ने ʻसूचना के मुक्त प्रवाहʼ की अमेरिकी एकाधिकारवादी नीति का पुरजोर विरोध किया।
 आठवें दशक में विकसित देशों के विशेषकर अमेरिका की अंतरिक्ष पर अधिकार करने के उद्देश्य से सैटेलाइटों के जरिए की जा रही नज़रदारी के लिए ʻसामाजिक जरूरतʼ का नारा विकसित किया गया। बहुत-सी मानवीय जरूरतों का हल संचार के जरिए निकालने की बात की गई। विशेषकर शिक्षा, जनस्वास्थ्य, क़ानूनी सूचनाएं और डाकसेवाओं आदि के क्षेत्र में। दूरस्थ सेवाओं का महत्व बहुत तेजी से बढ़ा। दूरस्थ शिक्षा व्यवस्था का उद्धेश्य बहुत साफ था कि नागरिकों की एक लचीली जमात पैदा की जाए जिसकी जरूरत 21वीं सदी की पूंजीवादी व्यवस्था को पड़ेगी। मनोरंजन से लेकर तकनीक तक की खपत के लिए एक बड़े बाजार की जरूरत भी इससे पूरी होती दिख रही थी। शिक्षा के क्षेत्र में जिस ʻडिस्टेंस एजुकेशनʼ और ʻ ई लर्निंगʼ की बात भारत में जोरों पर हैं उसका उद्देश्य विश्वविद्यालयी शिक्षा व्यवस्था की कमियों को उजागर कर उसे दुरुस्त करना नहीं था बल्कि इस संस्था तक पहुंच के अधिकार को सीमित करना था। कारण था बढ़ती बेरोजगारी। रोजगार के उत्पादक क्षेत्रों में कमी। रोजगार केवल सेवा क्षेत्रों में दिखाई दे रहे थे। उसी अनुसार शिक्षा का नया ढ़ांचा तैयार किया जा रहा था। इस क्रम में किसी भी किस्म की गंभीर गवेषणा का निषेध भी शामिल था।