Thursday, October 21, 2010

क्या औरत को माँ बनने के लिए प्रोत्साहन की ज़रूरत है ?

      यूरोपीय समुदाय स्त्रियों के लिए मातृत्व के अवकाश को बढ़ाने पर विचार कर रहा है। यूरोप में अभी चौदह हफ्ते का मातृत्व अवकाश स्त्रियों को मिला हुआ है। इसे बढ़ाकर इक्कीस हफ्ते करने पर यूरोपीय संसद विचार कर रही है। क्या इसे स्त्री आंदोलनों की सफलता माना जाए ? या फिर स्त्री आंदोलनों के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि ? अभी इस प्रस्ताव पर विचार चल रहा है , इसके पक्ष विपक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं। इस विषय में कुछ भी कहने के पहले मैं कह दूँ कि व्यक्तिगत तौर पर मैं इस प्रस्ताव के पक्ष में हूँ और कोई भी स्त्री जिसके अंदर स्त्री की चेतना है वह इसके पक्ष में होगी।
इस प्रस्ताव के लाने के पक्ष विपक्ष दोनों में तर्क दिए जा रहे हैं। जो पक्ष में हैं और जो इसका समर्थन कर रहे हैं उनका तर्क है कि स्त्रियों के लिए मातृत्व अवकाश बढ़ाने पर स्त्रियाँ गर्भाधान के लिए आकर्षित होंगी। उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा। आज स्त्रियाँ बाहर काम कर रही हैं और उन्हें बाहर के काम से गर्भाधान के समय अगर अवकाश मिलेगा तो वे प्रोत्साहित होंगी। यह समाज के लिए अच्छा होगा, देश के लिए अच्छा होगा, देश की जनसंख्या संतुलन के लिए अच्छा होगा। सभी स्त्रीवादी विचारों वाली महिलाएं इसके पक्ष में होंगी।
जाहिर है कि इस प्रस्ताव का यह पक्ष बड़ा मज़बूत है कि स्त्रियों को मातृत्व अवकाश के अंदर ज्यादा से ज्यादा समय मिले। बच्चा जनने के क्रम में स्त्री के स्वास्थ्य और शरीर की जो हानि होती है, उसकी रिकवरी के लिए उसे पर्याप्त समय मिलना ही चाहिए। बल्कि न केवल बच्चा जनने , उसके पालन-पोषण में भी औरत की केन्द्रीय भूमिका होती है। यह कहना सच के ज्यादा क़रीब होगा कि बच्चा पालना औरत की केन्द्रीय जिम्मेदारी समझी जाती है।
सवाल है कि यह स्थिति क्यों आई कि स्त्री को आज बच्चा पैदा करने के लिए किसी प्रोत्साहन की जरुरत आन पड़ी ? और यह डर समाज में घर करने लगा कि भौगोलिक संतुलन गड़बड़ हो सकता है! जबकि हालत यह रही है कि सभी समाजों में स्त्री को बच्चा पैदा करने की मशीन समझा गया है। औरत की सार्थकता ही इस बात में मानी गई है कि वह संतान को जन्म दे। उसकी उर्वरता की तुलना धरती से की गई है। जो या तो फसल पैदा करती है या बांझ होती है। बीच की कोई स्थिति नहीं होती। धरती की तरह ही औरत की भी स्वतंत्र रूप से कोई सामाजिक भूमिका नहीं देखी गई। उसकी कोख , उसकी प्रजनन क्षमता , मासिक धर्म ये सब पुरुष के लिए रहस्यमय संसार थे। इससे भी ज्यादा रहस्यमय था औरत की कोख की अनिश्चतता। मर्द के लिए आज भी यह जानना आसान नहीं है कि औरत की कोख में उसी का बच्चा है या नहीं। हालांकि आज विज्ञान के पास इसका उत्तर है। विज्ञान के पुंसवादी ओरिएन्टेशन की तरक्की से अब ये तो जाना जा सकता है कि औरत की कोख का बीज किस मर्द का है। पर ये सब इतना सहज सुलभ और वैध नहीं है। दूसरी चीज कि ऐसी कोई भी स्थिति औरत मर्द के बीच अविश्वास, असामान्य स्थितियों और असभ्यता का ही पता देती है। (यह दीगर बात है कि इस तरह के कई सामाजिक असभ्यताओं की शिकार औरत सदियों से रही है और समाज ने इसे सामान्य स्थिति  के तौर पर ही लिया है!)
ज्यादातर मर्दों के लिए आज भी औरत की कोख रहस्य भरी है। यह किसी तिलिस्म से कम नहीं! चूँकि हमारे समाज का ढ़ाँचा पुंसवादी है अत: मर्दों के लिए यह एक जनाना कार्यव्यापार ही रहा है। वह इसमें शामिल नहीं होता , दूर से देखता है। उसकी भूमिका तमाशबीन की होती है। चूँकि सारे परिवर्तन स्त्री के शरीर में घट रहे होते हैं, ये सब उसकी दिनचर्या , शरीर और मन की संरचनाओं में भी भारी परिवर्तन पैदा करते हैं। वह , वह नहीं होती जो गर्भाधान के पहले थी। ये सारे बदलाव स्त्री को बांधते हैं , वह अपनी स्वतंत्रता खोती है , स्त्री को सिखाया जाता है कि मर्द को बांधे रखने के लिए उसमें आवश्यक लावण्य होना चाहिए , मर्द भी स्त्री से ऐसी अपेक्षा रखते हैं; स्त्री वह भी ‘खोती’ है। इस प्रक्रिया में किसी भी महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका से वंचित स्त्री अपना आत्मविश्वास खोती है जिसके कारण वह आगे चलकर कई तरह की हीन ग्रंथियों का शिकार भी होती है। हालांकि यह भी उतना ही बड़ा सच है कि हममें से ज्यादातर स्त्रियों के मन में बचपन से ही मातृत्व को भविष्य की एक सुखमय इच्छा और स्त्री-जीवन की सार्थकता के रूप में पोषा जाता है। खाद-पानी दिया जाता है। हममें से अधिकांश स्त्रयों की मांए हमें यह नहीं बतातीं कि मातृत्व एक कष्टकर अनुभव भी है। कि इसमें हमारी जान का ख़तरा भी शामिल है। हमें विज्ञान की उपलब्धियों के बारे में बताया जाता है, डॉक्टरों की दक्षता के बारे में बताया जाता है , इसमें शामिल सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, भावात्मक जोखिम के बारे में प्राय: बात नहीं की जाती। माँ तो माँ , एक सहेली भी दूसरी सहेली को यह नहीं बताती कि बच्चा पैदा करना स्त्री के लिए केवल एक सुखद अनुभव नहीं है। इसका एक नकारात्मक अर्थ भी है। बल्कि कोशिश यह होती है कि स्त्री के किसी भी कारण से बच्चा न होने को एक अभावमूलक संदर्भ दिया जाए।
इन सब के बावजूद यदि आज यह स्थिति यूरोपीय समाजों में आ गई है कि औरत को बच्चा पैदा करने के लिए प्रोत्साहन दिए जाने की बात की जा रही है तो यह विचारणीय मसला है। इसे सामान्य सरकारी नीति कहकर टालना ग़लत होगा। इसमें मोटे तौर पर जनसंख्या वृध्दि की वर्चस्वशाली सामाजिक मानसिकता की अभिव्यिक्ति तो है ही लेकिन उससे गंभीर बात है स्त्रियों में ,तमाम स्वीकृतिमूलक और महिमामंडन करनेवाली सामाजिक संरचनाओं की मौजूदगी के बावजूद, इस भूमिका के प्रति उपेक्षा। ध्यान रखनेवाली बात है कि पितृसत्तात्मक सेटअप केवल विवाह व्यवस्था के भीतर मातृत्व का महिमामंडन करता है। अविवाहित मातृत्व उसके लिए कुफ्र है।
स्त्रियों का माँ बनकर सामाजिक भूमिका के प्रति उपेक्षा भाव का एक बड़ा कारण अपनी तमाम आलोचनामूलक भूमिकाओं के बावजूद पूंजीवाद ने पैदा किया है। स्त्री की आर्थिक स्व निर्भरता ने उसके लिए नई ज़मीन तैयार की है। वह अपनी पहचान के अन्य आधारों को बच्चे पैदा करने के अलावा भी पैदा कर सकती है। यह बड़ा फ़र्क है जो आज की औरत के लिए आम है। दूसरी चीज कि यह सच है कि बच्चे आज भी केवल औरत ही पैदा कर सकती है ( आगे कौन जाने कि मजबूरी में सही इस मामले में औरतों के विकल्प पर न सोचा जाएगा !) लेकिन ऐसा करने की प्रक्रिया में वह अकेली और असुरक्षित हो जाए तो वह यह नहीं चाहेगी। आज की समाजव्यवस्था में बच्चा स्त्री के लिए पूरा प्रोजेक्ट है। न्यूक्लियर समाजों में इसका निर्वाह वह अकेले करने में असमर्थ है। इसमें पति-पत्नी और समाज तीनों की जवाबदेहियाँ सुनिश्चत की जानी चाहिए। माँ बनने वाली स्त्री के लिए समाज में और काम की जगहों पर विशेष इन्सेंटिव दिया जाना चाहिए ताकि इसमें लगनेवाले समय के कारण वह अपने को दक्षता या कौशल में पिछड़ा हुआ न महसूस करे।     
बात एक अच्छे प्रस्ताव और सदिच्छा भर की है तो इस पर किसी भी तरह की बहस से कोई फर्क नहीं पड़नेवाला। प्रसंगवश जिक्र कर दूँ कि भारत में नौकरियों में स्त्री को मातृत्व अवकाश मिला हुआ है। उच्च शिक्षा संस्थानों में नौकरी के नियमों के नए निर्देशों के अनुसार स्त्री को दो वर्ष के मातृत्व अवकाश का प्रावधान है साथ ही पैतृक अवकाश की भी बात की गई है। यह नियम सन् 2006 से अमल में आया है। पर इसके व्यवहारिक पक्ष पर गौर करें तो चौंकानेवाले तथ्य सामने आएंगे। कई कॉलेजों में यह देखा गया है कि छुट्टी मांगी गई है, मातृत्व की अपेक्षा करनेवाली महिलाएं घर बैठ गईं हैं पर बाद में उन्हें छुट्टी एडजस्ट कराने में दिक्कतें पेश आईं हैं।
मेरा मानना है कि सदिच्छा, प्रस्ताव या किसी भी संवैधानिक स्थिति को अमली जामा पहनाने के लिए, उसके लागू किए जाने और मनवाने पर जोर दिया जाना चाहिए। इसके लिए एक मज़बूत तंत्र की जरुरत है। चाहे किसी भी देश या समाज की बात क्यों न हो स्त्री का मसला ऐसा नहीं है कि इसे केवल संवैधानिक जामा पहनाकर अमल के जनता और संस्थानों की इच्छा के हवाले कर दिया जाए। इच्छा से तो लोग ‘लेडीज़’ लिखे रहने बावजूद बसों में घन्टे-आध घन्टे के सफर में सीट तक नहीं छोड़ते फिर स्त्री के अधिकारों का सम्मान करना तो दीगर बात है।    

Sunday, August 8, 2010

औरत को नंगा करके किसे सुख मिलता है ?

अभी उत्तरप्रदेश के सोनभद्र जिले के करहिया गाँव में जागेश्वरी नाम की महिला को डायन बता कर जीभ काट लेने की घटना पर ठीक से चर्चा भी नहीं हुई थी कि पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में एक सोलह साल की नाबालिग लड़की को नंगा करके पूरे गाँव में 'सजा' के तौर पर घुमाने की घटना सामने आई है (इंडिया टी वी 8 अगस्त 2010)। लड़की का कसूर प्यार करना बताया जाता है। पूरे दृश्य में प्रेमी कहीं नहीं फ्रेम में आता। बेबस भागती नंगी लड़की, ढोल -नगाड़े बजाते गाँववाले जिनमें महिलाएँ, पुरूष और बच्चे सभी हैं दिखाई दे रहे हैं , ये सब जंगल में हांका करती शिकारियों की टोल और निरीह पशु का दृश्य तैयार करते हैं। भागती हुई नंगी लड़की को एक पुरूष पकड़कर बदतमीजी कर रहा है तब भी दृश्य में कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दे दे रही। इंडिया टी वी दावा कर रहा है कि उसकी ख़बर का असर हुआ है और कुछ लोगों, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्त्ताओं को वीडियो फुटेज दिखाकर बाइट लेने की कोशिश कर रहा है। वे नेता जो वामपंथी रूझान के हैं सिर्फ ख़बर सुनकर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहते और वे नेता जिनका वामपंथ से बैर है , जो वाम को कोसने का कोई भी मौका नहीं खोते वे भी ख़बर देखकर ही बोलना चाहते हैं। दोनों धड़ों के नेताओं और समाजकर्मियों की यह अतिरिक्त सावधानी , यह संयमी मुद्रा प्रशंसनीय है लेकिन अन्य मुद्वों पर भी उनसे संयम और सावधानी की अपेक्षा पैदा करती है, सिर्फ स्त्री के मुद्वे पर तोलने की जरूरत नहीं है।
यह लगने लगता है कि यदि यह वीडियो फुटेज न होते तो ये लोग शायद इस तरह की किसी घटना से ही इंकार करते या फिर इसे अनदेखा करते। सच है दृश्य फर्क़ पैदा करता है। इंडिया टी वी ने साहस दिखाया है।
लेकिन स्त्री पर किए गए इस तरह के अत्याचार तो सदियों से समाज में होते आ रहे हैं। ऑंखों के सामने ! बिल्कुल अगल-बगल। शारीरिक , मानसिक और वाचिक हिंसा का तो अंत नहीं। कितनी घटनाएँ प्रकाश में आ पाती हैं ? घटना का विरोध करते हुए कब इस घटना के पक्ष में तर्क तलाश लिए जाते हैं, नहीं कहा जा सकता। विरोध के लिए खड़ा न्याय का पहरूआ कैमरा, टी वी के छोटे पर्दे पर जिस कहानी को बना रहा था उसके साथ चल रही पट्टियाँ उसका मुँह चिढ़ा रही थीं। यह जाहिर कर रही थीं कि हमारी कोशिश कैसे पितृसत्ताक विचारधारा की चालाकियों और जटिलताओं को न समझ पाने के कारण उन्हीं का शिकार हो जाती है। 'चीरहरण' शीर्षक से जो पट्टी इंडिया टीवी ने इस ख़बर के लिए चलाई वह पौराणिक संदर्भों से जुड़कर पितृसत्ता की ताक़त का ही बयान कर रही थी। विरोध और प्रतिकार के सारे प्रयत्न, 'पितृसत्तात्मकता अजेय है। इसके खिलाफ लड़ने की कोशिशें बेकार हैं। यह शाश्वत है। यही होता आया है यही होता रहेगा ' की धमक भरी चेतावनी के साथ संप्रेषित हो रहे थे।
यह घटना चार महीने पहले की है। 7 अगस्त 2010 को राष्ट्रीय महिला आयोग ने घटना के बारे में जानकारी मांगते हुए एक चिट्ठी भेजी है। इसकी अध्यक्षा गिरिजा व्यास ने सुओ मोटो कार्रवाई करते हुए दोषियों को सजा दिलाने और पीड़िता को तलाश कर सुरक्षा देने की बात की है। भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी ने इसे दुर्भाग्यजनक घटना करार दिया है।
बात यहाँ पर सामाजिक संवेदना की है। स्त्री के प्रति कौन सा समाज संवेदनशील रहा है ? आज इक्कीसवीं सदी का? महाभारत काल का ? या आदिम-बर्बर युग का? आज 2010 में भी हिन्दुस्तान में कई भारत हैं ? किस भारत की संवेदना की बात करें? कहाँ से शुरू करें ? पढ़े-लिखे भारत की बात करें? वहाँ एक वी एन राय बसते हैं। जो हिन्दी लेखिकाओं के देह से जुड़े अनुभवों के बयान को छिनालवृत्ति कहते हैं , किशोरी लड़कियाँ जो उनके विश्वविद्यालय की छात्राएँ हैं को अपना भला-बुरा न समझनेवाली बताकर लड़कों के होस्टल में न जाने के अपने फरमान की वकालत करते हैं। यह मोरल पुलिसिंग का ही नमूना है। इसी तरह समाज के भले के लिए सोनभद्र की जागेश्वरी की जीभ डायन घोषित कर काट ली जाती है। बीरभूम की इस लड़की को प्रेम करने की सजा गाँव में नग्न परेड कराकर दी जाती है। वह 'अपराधिन ' है इसलिए दूसरों को उसके साथ अपराध करने की छूट मिल सकती है। टी वी के विजुअल्स में एक तीसेक साल का पुरूष दरिंदगी से हंसते हुए उस सहमी भागती हुई नग्न लड़की का रास्ता रोककर उसका बलात्कार करने की कोशिश कर रहा है ! किस समाज की संवेदना की बात करें हम ? वी एन राय के पक्ष में कुछ भी दलील दी जा सकती है- यह शब्द प्रतिबंधित नहीं है, प्रेमचंद ने भी इसका प्रयोग किया है, इसका अर्थ छिन्न-नाल है, टी वी और सिनेमा में खुले आम प्रयुक्त होता है, वी एन राय का अब तक का लिखा उनके इस कथन की तस्दीक नहीं करता, वी एन राय ने यह शब्द कहा ही नहीं, साक्षात्कार्रकत्ता या संपादक का दोष है, आदि आदि। लेकिन गौर करें कि यहाँ भी एक निर्णायक मण्डल है, एक पंचायत यहाँ भी बैठी है जो संपादक रवीन्द्र कालिया, साक्षात्कार लेनेवाला वाला राकेश मिश्र और साक्षात्कार देने वाले लेखक-वाइस चांसलर वी एन राय की है। एक से गलती हुई कि तीनों से गलती हुई -यह जरूर पूछा जाना चाहिए। वी एन राय ने क्षमा मांग ली है बाकि के दो का क्या ? क्या उन्हें अपनी गलती पर जरा भी शर्म नहीं?
हरियाणा की खाप पंचायतों की तरह हर गांव की अपनी पंचायतें हैं। देश का कानून क्या कर रहा है? सजा औरतों और बेबसों को ही क्यों दी जाती है। औरत को दी जानेवाली सजाओं में उसकी देह को ही निशाना क्यों बनाया जाता है। यह कैसा बर्बर समाज है ? असभ्यता की हद तक गर्त में जाने को तैयार ? धिक्कार है।
आश्चर्य है कि अधिकतर प्रिन्ट मीडिया और टी वी चैनलों में बीरभूम की यह खबर आज नहीं है। जनसत्ता के कलकत्ता संस्करण में भी यह ख़बर नहीं है। वह अख़बार जो स्त्री लेखिकाओं से जुड़े मुद्दे को इतनी शिद्दत के साथ उठा रहा है , इस मसले पर एक कॉलम की ख़बर नहीं देता। यह अच्छी बात है कि हमारी लेखकीय संवेदना इतनी प्रखर है कि 'छिनाल' शब्द के प्रयोग पर लेखक -लेखिकाएँ और अनेक समूह एकजुट हुए। मैं स्वंय मानव संसाधन विकास मंत्री से वृन्दा करात की अगुवाई में मिलने गईं लेखिकाओं के डेलीगेशन का हिस्सा थी। लेकिन यह सवाल है कि क्या इस तरह की फुटेज के आने के बाद लेखक -लेखिकाएँ ऐसे ही एकजुट होंगे ? क्या मंत्री, मुख्यमंत्री, पुलिस और अपराधियों के चेहरे सामने आने के बाद उनके इस्तीफे की मांग करेंगे ?
लेखकीय संवेदना खांचों में बंटी हुई नहीं होनी चाहिए। न ही इसकी अभिव्यक्ति चुनिंदा होनी चाहिए। मैं एक और उदाहरण सामाजिक संवेदनहीनता का दूँ। पिछले सात महीने से जी टी वी पर अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो धारावाहिक दिखाया जा रहा है। प्रसंगवश बता दूं कि यह नाम भी एक साहित्यिक कृति के नाम की पैरोडी है। इस धारावाहिक में प्रमुख पात्र को (अब उसकी प्रसंग से अनुपस्थिति में उसकी बहन को) लगातार 'रखैल' और हीनतामूलक शब्दों से संबोधित किया जा रहा है। कहानी में इस शब्द का वैधीकरण है। ताज्जुब है कि इस मुद्दे को लेकर प्रबुद्ध लेखक -लेखिकाएँ एक बार भी अंबिका सोनी से मिलने नहीं गए । हम इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं ? हमारी जागरूकता लेखिकाओं के प्रति हो पर स्त्रियों के प्रति न हो यह कैसे हो सकता है ? लेखक -लेखिकाओं और मीडिया का यह एकांगी रूख विचलित करनेवाला है।

Saturday, July 3, 2010

शिष्ट भाषा के चालू मुहावरे

 

  स्त्री के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक भेद-भाव का बड़ा क्षेत्र भाषा है। आम तौर पर स्त्री के साथ किए गए और किए जा रहे अन्याय और चालाकियों को उजागर करते हुए विद्वानों ने लोकोक्तियाँ, मुहावरों और गालियों का उदाहरण दिया है। यानि स्त्री के साथ किए जा रहे या हुए सामाजिक-सांस्कृतिक भेद-भाव का सबसे मूर्त उदाहरण लोकभाषा को बतलाया है। यह बहुत बड़ी चालाकी है। लोकभाषा की तरफ उंगली उठाने के पहले यह नहीं भूलना चाहिए कि लोक में प्रचलित विश्वास और मान्यताओं की पुष्टि प्रदान करनेवाला और वैध ठहरानेवाला शिष्ट समाज ही होता है। सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया में शिष्ट समाज के थोथे नियमों को इस प्रक्रिया में शामिल जाति और समुदाय अपना लेते हैं।
  स्त्रियों के लिए भाषिक अपमान के सारे मुहावरे लोक में खोजकर निर्णय सुनाना ग़लत है। हिन्दी के शिष्ट बुद्धिजीवियों ने लोक से जुडने का बड़ा दम भरा है। उन्हीं से पूछा जाना चाहिए कि लोक की यह बीमारी भी उनके यहाँ है क्या ?क्या शिष्ट साहित्य में बिना सीधे-सीधे गाली दिए स्त्रियों के लिए हीनतामूलक संदर्भों का निर्माण नहीं किया गया ?जब रामचन्द्र शुक्ल रीतिकाल की नायिकाभेद वाली कविता की आलोचना करते हुए कहते हैं कि अब तो काव्य के क्षेत्र में बहुत सी स्त्रियाँ आ गईं हैं इसलिए उन्हें आकाश में उमड़ती-घुमड़ती काली घटाओं की उपमा पुरुषों की दाढ़ी-मूँछ से देना चाहिए , या जब बालकृष्ण भट्ट ब्रजभाषा बनाम खड़ी बोली विवाद के संदर्भ में ब्रजभाषा को जनानी बोली कहकर निरस्त करते हैं या आज के दौर के सबसे बड़े आलोचक नामवर सिंह अपने लेखों में स्त्री साहित्य जैसी किसी कोटि को नकारते हुए स्त्री विमर्श को बौद्धिक शगल मानते हुए लिखते हैं -"इस लिहाज से देखा जाए तो मुझे स्त्रियों के अधिकारों को लेकर चल रहे आंदोलनों का उद्देश्य ठीक से समझ नहीं आता। कहा जा रहा है कि स्त्रियाँ चूँकि अब कामकाजी हो गईं हैं इसलिए वे अधिक उग्रता से अपने अधिकारों की मांग कर रही हैं। पर मुझे कोई यह तो बताए कि स्त्रियाँ कब कामकाजी नहीं थीं यह अलग बात है कि पहले वे घरों में काम करती थीं, अब दफ्तरों में करने लगी हैं। पर घरों का काम क्या दफ्तरों के काम से कम था। इससे भी बड़ी बात यह कि क्या घरों में काम करते हुए उनके अधिकार कम थे ?" (जमाने से दो-दो हाथ, राजकमल प्रकाशन, 2010, पृ123) तो ये शिष्ट भाषा में गाली से इतर किस कोटि में आएगा ?
  मैं समझती हूँ कि स्त्री के हीनतामूलक संदर्भ से जुड़े विविध उद्धरणों की केवल एक पुस्तक शिष्ट साहित्य की स्त्रियों के प्रति अशिष्टता की पोल खोल सकती है।


Thursday, April 29, 2010

सांप्रदायिकता फासीवाद का स्त्री प्रत्युत्तर -1-

       आधुनिककाल के औपनिवेशिक भारत में सबसे ज्यादा राजनीतिक तौर पर संवेदनशील मुद्दा फासीवाद और सांप्रदायिकता ही रहा है। आज भी इसका राजनीतिक तौर पर विकृत रूप अलग-अलग शक्लों में दिखाई दे रहा है। फासीवादी ताकतों ने सारे विश्व में मानवता के लिए घृणा की फाँस को तैयार किया है। समूचे विश्व को युद्ध के खेमों में बदल दिया है। इसी की पिछलग्गू सांप्रदायिक चेतना का जहर फैलानेवाली शक्तियाँ हैं। सामाजिक विभाजन और घृणा इनका केन्द्रीय एजेण्डा है। विशेषत: औपनिवेशिक देशों में साम्राज्यवादी शक्तियों ने नस्लवाद, जातीय घृणा , लैंगिक भेद-भाव आदि को सचेत रूप से बढ़ावा दिया। 
    आज सांप्रदायिकता का दायरा व्यक्तिगत संबंधों से लेकर स्थानीय, संस्थागत और राश्ट्रीय राजनीति तक फैला हुआ है जिसका विस्फोट सांप्रदायिक दंगों में दिखाई देता है। सांप्रदायिकता के लिए आज सामाजिक और राजनीतिक संबंधों का पूरा ताना-बाना मौजूद है जिनके ऊपर सांप्रदायिक और फासीवादी शक्तियों की राजनीति चल रही है। यह न केवल सामाजिक चेतना के स्तर को प्रदर्शित करता है बल्कि पॉवर पॉलिटिक्स में वर्चस्व का औजार भी है , केवल राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए नहीं ,राजनीति में बने रहने के लिए भी। यह ध्यान रखना चाहिए कि सांप्रदायिक-फासीवादी ताकतें इसे एक सतत प्रक्रिया के तहत जारी रखती हैं। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं में इनकी निरंतर घुसपैठ जारी रहती है।
     भारतीय समाज का जो ढाँचा है उसमें सामाजिक चेतना के बड़े स्तर को धर्म प्रभावित करता है। यह व्यक्ति को एक बृहत्तर सामाजिक पहचान मुहैया कराता है। धर्म मध्यकाल में व्यक्ति की पहचान से एकमेक था। लेकिन भारतीय समाज में आधुनिकता के अधूरे प्रकल्पों ने व्यक्ति की धार्मिक पहचान को बनाए रखा है। इस धार्मिक पहचान का दुरुपयोग राजनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए किया जाता है। सामान्य विश्वासों के आधार पर निर्मित विशेष धार्मिक -सामुदायिक पहचान का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। फिर भी यह लोगों की भावनाओं से जुड़ा होता है और अपने-अपने धर्म की श्रेष्ठता की चेतना के आधार पर चालित होता है। कोई भी धर्म मनुष्यता की हत्या या संहार का पाठ नहीं पढ़ाता । मानवीय व्यवहार के उन्नयन की शिक्षा सभी धर्म देते हैं। धार्मिक विश्वासों में अवधारणात्मक तौर पर अनेक समरूपताओं के बावजूद क्या कारण है कि धर्मों के बीच और धार्मिक पहचानवाले समूहों के बीच सौहार्द्र या एका नहीं है। इसका कारण है धर्म की वर्चस्वमूलक भूमिका। इसमें हम और अन्य की पहचान की कोटियाँ बहुत साफ-साफ रूप से तय हैं। हम के लिए सामान्य पहचान , सामान्य आचार संहिता और अन्य के लिए हेय और घृणा-भाव ! धार्मिक पहचान की ये कोटियाँ इतनी ठोस हैं कि नई पहचान की कोटियाँ मसलन वर्ग, राश्ट्र आदि कमज़ोर दिखाई देती हैं। जाति को भी धार्मिक पहचान की कोटि के रूप में ही देखा जाना चाहिए। उससे अलग नहीं। यही कारण है कि बरसों बरस साथ रहते हुए भी भारत में सामाजिक सौहार्द्रपूर्ण वातावरण निर्मित नहीं हुआ है। एक राष्ट्र की पहचान के सभी तत्व-भाषा, भौगोलिक सीमा, एक राजनीतिक व्यवस्था और संस्कृति के होते हुए भी साझी संस्कृति का जन्म नहीं हो सका है। इसके अभाव के चिह्न विभिन्न धार्मिक समुदायों मे ही नहीं बल्कि विभिन्न जातिगत पहचान, विभिन्न राश्ट्रीय पहचान, नस्ल भेद आदि में देखे जा सकते हैं। सबसे बड़ी चीज कि लैंगिक विभेद का भी बड़ा आधार धार्मिक कोटियों पर निर्भर होता है।
     वर्चस्व की जितनी भी शक्तियाँ हैं वे अनिवार्य रूप से स्त्री के खिलाफ हैं । उसकी स्वतंत्रता और मुक्ति के खिलाफ हैं। यही कारण है कि स्त्री का स्वाभाविक रुझान सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतों के खिलाफ रहा है। विडम्बना भी यही है कि साम्प्रदायिक और फासीवादी ताकतों ने बहाना कोई भी हो स्त्री के खिलाफ ही मोर्चा खोला है। उनका हर युद्ध , हर दंगा अंतत: स्त्री की देह , मन और परिवेश पर हमला बन जाता है। स्त्री के संघर्ष की लड़ाई को पीछे ठेलनेवाला बन जाता है। यही कारण है कि स्त्री ने फासीवाद और सांप्रदायिकता के घिनौने चेहरे को अपने लेखन के जरिए जब-तब उजागर किया है।
      फासीवाद और सांप्रदायिकता से लड़ने का सर्वोत्तम तरीका है कि मानवीय व्यवहार और साझा संस्कृति के रूपायन पर जोर दिया जाए। इससे अपरिचय के तन्तु टूटते हैं और परिचय और प्यार का संबंध बनता है। एक हमलावर माहौल में सबसे पहले अपरिचय की स्थिति निर्मित की जाती है। आपसी प्रेम और मानवीय व्यवहार पर हमला बोला जाता है। इसका प्रतिरोध निर्मित करने का तरीका कठिन स्थितियों में उन्हीं विषयों पर लिखना हो सकता है जिन पर हमला बोला जा रहा है। स्त्री का इन विषयों पर लिखना कोई आसान काम नहीं होता । स्त्री स्वयं भी इन हमलों का प्रमुख लक्ष्य होती है। स्त्री जब लिखती है तो उसका अनुभव बोलता है। स्त्री लेखन की यह विशेषता है कि वह अनुभवपरक होता है। दूसरी विशेषता है कि वह आत्मीय शैली में होता । इसी अर्थ में स्त्री विमर्श की प्रकृति एक सहिष्णु विमर्ष की है। इसे बार-बार बताए जाने की जरुरत है। स्त्री विमर्श खूंखार औरतों का विमर्श है , जिसमें कुछ बिगड़ी हुई बदमिजाज़ औरतें शामिल हैं, जैसे दुष्प्रचारों को रोकने के लिए यह बताया जाना जरूरी है कि स्त्री विमर्श एक सहिष्णु विमर्श है। लेकिन यह सहिष्णुता सहने के लिए नहीं है जैसाकि स्त्री की परंपरित भूमिका की मांग है। यह सहिष्णुता 'अपने साथ-साथ सबके लिए विमर्श में जगह' के अर्थ में है। सभी वादों का , सभी मुद्दों का, सभी अनुशासनों का स्त्री विमर्श में स्वागत है। लेकिन स्त्री विमर्श का हिस्सा बनते ही वाद, मुद्दे और अनुशासन वे नहीं रह जाते जो पहले थे। इसी अर्थ में स्त्री विमर्श एक 'सबवर्सिव' विमर्श है।
     स्त्री लेखन में सांप्रदायिकता, फासीवाद, राजनीति और धर्म के सवालों को एकांगी बहस के रूप में ट्रीट नहीं किया गया है। तीनों के अंतर्संबंधों पर स्त्री रचनाकारों की पैनी नजर है। इन तीनों में धर्म मध्यकालीन कोटि है। धर्म को आधार बनाकर की जा रही सांप्रदायिक राजनीति को स्त्री रचनाकार समग्रता में विश्लेषित करने की कोशिश कर रहीं हैं। इस प्रक्रिया में उनकी नजर वर्तमान पर ही नहीं अतीत का हिस्सा बने इतिहास पर भी है। इस चीज को कमलेश बख्शी की कहानी ' आओ दंगा-दंगा खेलें ' के अतिरिक्त भी कई कहानियों में देखा जा सकता है। सांप्रदायिक शक्तियों के द्वारा व्याख्यायित धर्म का अर्थ समझने का प्रयास करती हुई लेखिका टिप्पणी करती है ' धर्म का अर्थ क्या है ? एक-दूसरे को मारना ?' इस कहानी में दंगों की साक्षी तीन पीढ़ियाँ हैं - माँ जिसने दंगा देखा , माँ के पिता जो विभाजन की त्रासदी के बाद विक्षिप्त होकर आत्महत्या कर लेते हैं और भाई-बहन जिसमें भाई दंगाइयों से चाल को बचाने के लिए अन्य लड़कों के साथ मिलकर बारी-बारी से पहरा देता है।
   जो चीज हिन्दी की साम्प्रयिकता विरोधी कहानियों में देखने लायक है वह यह कि ये कहानियाँ अत्यंत प्रभावमूलक पक्षधरता के साथ नैरेट की गई हैं जो एक नितांत बर्बर स्थिति के खिलाफ मानवीय संवेदनाओं को जगाने , जिलाए रखने का काम करती हैं। मानवीय भावनाओं के बीच सियासती फैसले बड़ा फ़र्क पैदा कर देते हैं इस त्रासदी को ये कहानियाँ उभारती हैं।

मुसलमान इस देश का हिस्सा हैं। यह धरती उनकी भी उतनी ही है जितनी अन्य किसीकी। वे हमारे साझे इतिहास का हिस्सा हैं। भारत की संस्कृति साझा संस्कृति है और इसका संबंध किसी खास धर्म से नहीं है। यह सभी जातियों की साझा विरासत है। इंदुमति की कहानी 'पाषाण' में धर्मान्धता की कटु आलोचना है। यह कहानी विभाजन के समय की लिखी गई कहानी है। इसमें विभाजन की दिल दहला देनेवाली त्रासदी के चित्रण के साथ-साथ ही एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया है। वह है शारीरिक हिंसा की शिकार स्त्री की कोख का फैसला।
     सांप्रदायिक उन्माद का सबसे पहला शिकार स्त्री होती है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उसका शरीर और उसकी अस्मिता हमले के केन्द्र में रहती है। सबसे बड़ी बात कि इस विभाजन ने कैसी संतति पैदा की जो '' शेष आयु भर मानवता के प्रति विषवमन करेगी। '' (पाषाण)
      सांप्रदायिक दंगों की शिकार स्त्रियों के प्रति समाज का क्या रूख है और क्या होना चाहिए इसे सामने लानेवाली कहानी है ' पाषाण '। स्त्री न जाने कितने किए अनकिए अपराधों की सजा पाती है। प्रेम को अपराध माना जाता है , स्त्री के स्वतंत्र निर्णय को अपराध माना जाता है, व्यक्तित्व का विकास और बराबरी अपराध है, जन्म लेना अपराध है, गरीब की बेटी होना अपराध है और भी न जाने किन-किन अनकिए अपराधों की फ़ेहरिष्त स्त्री के नाम है। समस्त अपराधों की धुरी स्त्री की देह है। देह जब बलात्कृत हो जाता है तो सजा बलात्कारी को नहीं बलात्कृता को मिलती है। स्त्री की देह को यदि सामाजिक प्रतिष्ठा का केन्द्र न बनाया गया होता, उसके व्यक्तित्व और आत्मा के दमन को यदि वैधता न दी गई होती तो जीते जी औरतों को इतनी वर्जनाओं में नहीं जीना पड़ता।

    

Friday, April 23, 2010

भारत के बाल रंगमंच की महान रंगकर्मी रेखा जैन नहीं रहीं

(प्रसिद्ध रंगकर्मी स्व.रेखा जैनः 18सितम्बर 1923-22 अप्रैल 2010)
            हिन्दी रंगमंच की प्रसिद्ध हस्ती रेखा जैन का कल निधन हो गया। वे 84 साल की थीं। रेखा जैन के निधन से भारत के बाल रंगमंच के एक युग का अंत हो गया है।  रेखाजी का 28सितम्बर 1923 को जन्म हुआ था। रेखा जैन के रंगकर्मी व्यक्तित्व के निर्माण में ‘इप्टा’ की केन्द्रीय भूमिका थी। रेखाजी की 12 साल की आयु में नेमिचंद जैन के साथ शादी हुई। नेमिचंद जैन हिन्दी के बड़े रचनाकार और रंगकर्मी थे। उनकी पुत्री कीर्ति जैन भी रंगमंच से जुड़ी हैं और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में निदेशक रह चुकी हैं। नेमीजी ने रेखा जी को पढ़ाया,लिखाया,नृत्य और रंगकर्म की शिक्षा दिलवायी। वे लंबे समय तक ‘इप्टा’ के केन्द्रीय ग्रुप की सदस्य रहीं। नेमीजी के अलावा शंभु मित्र और शांतिवर्धन से भी उन्होंने रंगकर्म,संगीत आदि की शिक्षा प्राप्त की।
    रेखाजी का जन्म रुढ़िवादी वातावरण में हुआ था। इस रुढ़िवादी वातावरण से निकलकर उन्होंने जगह-जगह नाटक किए और स्वाधीनता संग्राम और प्रगतिशील आंदोलन में हिस्सा लिया। उनका भारत के बाल रंगमंच के साथ 50 साल से गहरा संबंध था।  उन्होंने शंभुमित्र,हबीब तनवीर,वी.वी.कारंत आदि के साथ काम किया था। सन् 1979 में उन्होंने ‘उमंग’ नामक संस्था की स्थापना की। यह संस्था बच्चों के रंगकर्म प्रशिक्षण की आदर्श पाठशाला रही है। इस संस्था में अमीरों ,गरीबों और झोंपड़पट्टियों के बच्चे एक साथ नाटक तैयार करते और खेलते थे। यह संस्था प्रतिवर्ष 2-3 नाटकों का रेखा जैन के निर्देशन में मंचन करती रही है।
    रेखा जैन के द्वारा निर्देशित चर्चित नाटक हैं- खिलौनों का संसार,दिवाली के पटाखे, अनोखे वरदान, कौन बड़ा कौन छोटा,रेल ले चली हमें चूं-चूं, चंड़लिका, बाल्मीकि प्रतिभा,ताश के पत्ते आदि। इसके अलावा उन्हें हिंदी अकादमी, साहित्य कला परिषद,उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी,संगीत नाटक अकादमी ,राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आदि के द्वारा पुरस्कृत किया गया था। उनके नाटकों का दिल्ली,कोलकाता, मुंबई, इलाहाबाद,शुजालपुर आदि में मंचन हुआ है।                       








Sunday, April 4, 2010

भाषा में वर्चस्व निर्माण की प्रक्रिया

अमूमन भाषा का वर्ग या भाषा का स्त्रीबोध या स्त्री-भाषा जैसे पद-बंध सुनते ही ऐसा मालूम पड़ता है कि भाषा के प्रचलित विमर्श के स्थिर जल में कंकड़ फेंक दिया हो। भाषा में वर्ग और स्त्री बोध या स्त्री-भाषा जैसे विभाजन क्यों। भाषा तो बहता नीर है ,अनंत है, बह्मतुल्य है उसमें विभेद- वर्गीकरण कैसा ? पर यह वर्गीकरण भाषा के भीतर ही मौजूद था , है। भाषा को वैयाकरणिक प्रणाली से नियमित करने और विज्ञान के पद तक पहुँचाने में वर्चस्वशाली पुरुतबके का हाथ रहा है। इन्होंने भाषा के नियम ,विधान सबकुछ अपने को केन्द्र में रखकर तैयार किए। भाषा का वर्ग या मजदूरों या स्त्रियों की भाषा का अर्थ समाज में बोली जानेवाली भाषा (जो कि पुरु भाषा है) से एकदम भिन्न कोई भाषा है, ऐसा नहीं है। भाषा वही है जो समाज में प्रचलित है लेकिन उसके ब्द, रूप आदि में स्त्री का संसार शामिल होगा जो समस्त स्त्री जाति के अनुभव और चिंतन का संसार होगा।
 भाषा के विकास में वर्गों की भूमिका होती है लेकिन अलग-अलग वर्गों की अलग-अलग भाषा नहीं होती। रामविलास र्मा के अनुसार '' भाषा समूचे समाज की संपत्ति है। स्तालिन ने भाषा का वर्ग-आधार माननेवालों का सही खंडन किया था। इसका यह अर्थ है कि भाषा के विकास में वर्गों की महत्वपूर्ण भूमिका नहीं होती सामन्तों व्यापारियों, विद्वानों की सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकताओं के कारण ही संस्कृत और लैटिन का परिनिष्ठित रूप संभव हुआ और इन भाषाओं का अखिल भारतीय और अखिल यूरोपीय व्यवहार होता था। सामंती व्यवस्था के ह्नास और व्यापारियों द्वारा नए पूँजीवादी संबंधों के प्रसार के साथ मास्को ,लंदन, पैरिस और दिल्ली की बोलियों के आधार पर रूसी, अंग्रेजी, फ्रांसीसी और हिन्दी भाषाओं का जातीय भाषाओं के रूप में गठन और प्रसार हुआ था। इस प्रक्रिया में पूँजीपतिवर्ग की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। साथ ही मज़दूर वर्ग, मध्य वर्ग और हरों के संपर्क में आनेवाले किसान भी इस जातीय भाषा को अपनी बोलियों के साथ काम में लाकर उसके प्रसार में सहायता करते हैं और बहुधा अपनी बोलियों के तत्व मिलाकर उसे समृध्द करते हैं।''
भाषा में लिंग कब आया ,यह देखना दिलचस्प होगा। हिन्दी में पहले लिंग की जगह 'व्यक्ति' का प्रयोग हुआ करता था। पाणिनि के व्याकरण में लिंग के लिए 'व्यक्ति' ब्द आया है। '' पुरु या बालक के समान जिनकी बनावट है, वे 'जल' ,'वन','पर्वत' आदि ब्द पुरु जातीय, पुंवर्गीय, या 'पुल्लिंग' कहलाते हैं। स्त्री के समान जिनका कलेवर है, वे 'नदी', 'लकड़ी', 'मकड़ी' आदि ब्द स्त्रीजातीय, स्त्रीवर्गीय या स्त्रीलिंग' कहे जाते हैं।'' हिन्दी में पुंविभक्ति '' है और स्त्रीविभक्ति '',''। संस्कृत में उभयलिंग भी है जिनमें स्त्री या पुरु से इतर वस्तुओं के नामों को रखा गया है।
लेकिन भाषाओं के विकास के नाम पर विश्व की अन्य भाषाओं की तरह ही हिन्दी में भी वस्तु या जीव के स्त्री या पुरु होने और बताने को ज्यादा महत्व दिया गया। उभयलिंग को हटाकर संस्कृत के अकारान्त नपुंसक लिंग ब्द हिन्दी में पुल्लिंग बन जाते हैं। संस्कृत के नकारान्त नपुंसक ब्द, भाववाचक नपुंसक लिंग संज्ञाएं सब हिन्दी में पुल्लिंग हो जाती हैं। प्रथमा एकवचन में 'आत्मा' जैसा ब्द अपवाद है जो स्त्रीलिंग है अन्यथा जो पुल्लिंग थे वे तो रहे ही और उभयलिंग को भी पुल्लिंग बना लिया गया। किशोरीदास वाजपेयी ने इस पर लिखा है ''न जाने क्यों हमारी आत्मा ने स्वीकार न किया' ! मेरा आत्मा अच्छा नहीं लगता ; यद्यपि 'परमात्मा' पुंवर्ग में ही है! इसी तरह 'देह' हिन्दी में स्त्रीवर्ग में चलता है; यद्यपि रीर आदि पुंवर्ग में। परंतु पुस्तक, देह ,आत्मा जैसे अपवाद अंगुलियों पर ही गिने जा सकते हैं। व्यापकता पुंवर्ग की ही है।  --------ब्दों की अपनी गति होती है। संभव है, अधीनता और स्वतंत्रता के कारण स्त्री-पुरु का वर्ग भेद जनता ने कर दिया हो। परमात्मा के अधीन आत्मा और आत्मा के अधीन देह। सो 'परमात्मा' पुंवर्ग में रहा और उसके अधीन 'आत्मा' स्त्रीवर्ग में ! 'देह' भी स्त्रीवर्ग में इसीलिए कि 'आत्मा' से संचालित है। 'रण' भी स्त्रीरूप में चलता है।''
 हिन्दी के ई' प्रत्यय जिससे स्त्रीलिंग बनाया जाता है , के बारे में राय देखिए-'' पुंविभक्ति-युक्त 'घंटा' आदि से लघुता प्रकट करने के लिए '' प्रत्यय होता है--'घंटी''' निष्कर्ष यह कि भाषा के नियम स्वाभाविक नहीं हैं ,वे बनाए गए हैं। भाषा के नियमों की मूल संकल्पना पुरुकेन्द्रिक है। पुल्लिंग क्रिया को स्त्रीलिंग बनाने के लिए '' प्रत्यय अनिवार्य रूप से लगता है। पांडित्य, महत्ता प्रकट करनेवाले ब्द पुंवर्गीय हैं। इसके पीछे पुरु-श्रेष्ठत्व ही प्रमाण है। क्ति स्त्रीलिंग है इसलिए क्ति के प्रतीक स्त्रीलिंग हो गए।
 किसी संवेदनशील वैयाकरण की नजर से यह बात छिपी नहीं रह सकती ''प्रधानता और अप्रधानता में मानव भावना कारण है और भावना में स्वार्थ कारण है। सृष्टि में पुंवर्ग अधिक क्तिशाली दिखाई देता है और इसलिए सवारी या लादने के काम में पुंवर्गीय पशुओं को ही अधिक पसंद किया जाता है। इसीलिए घोड़े ,ऊँट तथा हाथी की ओर ध्यान जाता है और झट कह दिया जाता है- 'घोड़े यहाँ हल भी जोतते हैं।' चाहे घोड़ियों से भी हल खिंचवाया जाता हो; परन्तु बोलने में 'घोड़े' ही आएगा। '' यह भी गौरतलब है कि हिन्दी में अन्य अधिकतर भाषाओं की तरह सामान्य प्रयोग पुंप्रयोग ही होता है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

Saturday, April 3, 2010

भाषा में वर्गहीनता और लिंगविहीनता का छद्म


भाषा का प्रयोग और भाषिक संकल्पनाएं वर्गाधारित रही हैं। भाषा को लेकर जितनी भी धारणाएं है उन सबमें एक आम राय है कि भाषा निरपेक्ष नहीं होती। बोलना कभी भी निरपेक्ष नहीं रहा है। भाषिक व्यवहार उदासीनता का व्यवहार नहीं हुआ करता न ही भाषा केवल सम्प्रेण का माध्यम है। भाषा की भूमिका इससे कहीं बड़ी है। भाषा वर्चस्व के संबंधों के सम्प्रेण का भी माध्यम है। ये वर्चस्व के संबंध वर्ग,लिंग, नस्ल, राष्ट्र आदि कई स्तरों पर अभिव्यक्त होते हैं। इसी कारण विश्व की प्रत्येक भाषा में साहित्य के आरंभिक झगड़े भाषा के झगड़े हैं। और ऐसा भी नहीं है कि ये झगड़े अंतिम निष्कर्ष पर पहुँच चुके हों बल्कि किसी भी नए विचार के संदर्भ में भाषा का विवाद उठ खड़ा होता है। वह विचार साहित्यिक हो, सांस्कृतिक या राजनीतिक सभी का निपटारा भाषा के अंतर्गत होता है।
    भाषा को लेकर मार्क्स की धारणा है कि भाषा अधिरचना का हिस्सा होती है। उसमें परिवर्तन तब होता है जब आधार में परिवर्तन होता है। आधार की तुलना में यह परिवर्तन धीमी गति से होता है। भाषा में वर्ग का सवाल तब महत्वपूर्ण हुआ जब एंगेल्स ने भाषा के सामाजिक आधार को खोजने की बात की। उसने कहा कि परिवार में पत्नी सर्वहारा होती है और पति पूँजीपति। संसार का सबसे पहला वर्गविभाजन स्त्री- पुरुष के बीच होता है। एंगेल्स ने लिखा, '' आधुनिक वैयक्तिक परिवार नारी की खुली या छिपी हुई घरेलू दासता पर आधारित है। और आधुनिक समाज वह समवाय है जो वैयक्तिक परिवारों के अणुओं से मिलकर बना है। ................परिवार में पति बुर्जुआ होता है और पत्नी सर्वहारा की स्थिति में होती है।''
 एंगेल्स ने सामाजिक विकास की व्याख्या करते हुए इस बात की तरफ ध्यान खींचा कि सामाजिक व्यवस्था मातृसत्ता से पितृसत्ता की तरफ गई। यह इतिहास की एक बड़ी घटना है। इतना बड़ा परिवर्तन सहज ही नहीं घटा होगा। लेकिन यह बिना खून-खराबे के घट गया।इसका कारण संपत्ति का एकत्रीकरण था। '' जैसे-जैसे संपत्ति बढ़ती गई, वैसे-वैसे इसके कारण एक ओर तो परिवार की तुलना में पुरुष का दर्जा ज्यादा महत्वपूर्ण होता गया, और दूसरी ओर पुरुष के मन में यह इच्छा जोर पकड़ती गई कि अपनी पहले से मजबूत स्थिति का फायदा उठाकर उत्तराधिकार की पुरानी प्रथा को उलट दिया जाए, ताकि उसके बच्चे हक़दार हो सकें। परंतु जब तक मातृसत्ता के अनुसार वंश चल रहा था, तब तक ऐसा करना असंभव था। इसके लिए आवश्यक था कि मातृसत्ता को उलट दिया जाए, और ऐसा किया भी गया। .........यह पूर्णत: प्रागैतिहासिक काल की बात है। यह क्रांति सभ्य जनगण में कब और कैसे हुई इसके बारे में हम कुछ नहीं जानते पर यह क्रांति वास्तव में हुई थी।''
 '' मातृसत्ता का विनाश नारी जाति की विश्व ऐतिहासिक महत्व की पराजय थी। अब घर के अंदर भी पुरूष ने अपना आधिपत्य जमा लिया। नारी पदच्युत कर दी गई। वह जकड़ दी गई। वह पुरुष की वासना की दासी, संतान उत्पन्न करने का यंत्र बनकर रह गई।''
    समाज में स्त्री की मातहत अवस्था और उसके ऐतिहासिक कारणों पर विचार करते हुए मार्क्स ने लिखा कि '' आधुनिक परिवार में न केवल दासप्रथा बल्कि भूदास-प्रथा भी बीज-रूप में निहित है, क्योंकि परिवार का संबंध शुरु से ही खेती के काम-धंधे से रहा है। लघु रूप में इसमें वे तमाम विरोध मौजूद रहते हैं जो आगे चलकर समाज में और उसके राज्य में बड़े व्यापक रूप से विकसित होते है।''
    भाषा की उत्पत्ति सामूहिक श्रम के दौरान होती है। भाषा के वर्गीय आधार से पहले भाषा का लिंगीय आधार तैयार किया गया। मार्क्स-एंगेल्स ने लिखा है कि संतानोत्पत्ति के लिए पुरुष और नारी के बीच श्रम-विभाजन ही पहला श्रम-विभाजन है। एंगेल्स ने इसमें जोड़ते हुए लिखा कि इतिहास में पहला वर्ग-विरोध, एकनिष्ठ विवाह के अंर्तगत पुरुष और नारी के विरोध के विकास के साथ-साथ और इतिहास का पहला वर्ग-उत्पीड़न पुरुष द्वारा नारी के उत्पीड़न के साथ-साथ प्रगट होता है।
 मार्क्स के अनुसार भाषा अधिरचना है और वर्ग के द्वारा निर्मित होती है। इस तरह से एक वर्ग अपनी भाषा को दूसरे पर लाद सकता है और एक भाषा गायब हो सकती है यदि इसका व्यवहारकर्ता वर्ग गायब हो जाए। या इसका इस्तेमाल न करे। यही कारण है कि सामाजिक और आर्थिक क्रांति के कारण भाषा के विकास में बड़ी-बड़ी  दरारें हैं, तोड़-मरोड़ हैं। मार्क्स के भाषा-चिंतन को पार्टी के आधिकारिक नजरिए का दर्जा मिला लेकिन 1950 में स्टालिन ने भाषा पर मार्क्स से भिन्न राय रखी और बहस की दिशा बदली। स्टालिन ने भाषा को अधिरचना मानने से इंकार कर दिया साथ ही वर्ग-भाषा के सिध्दान्त को भी अस्वीकार किया। इसके पीछे तात्कालिक राजनीतिक कारण सोवियत संघ का एकीकरण था।
   मार्क्स और स्टालिन की भाषा-संबंधी धारणाओं के पीछे जो भी कारण रहा हो लेकिन दोनों भाषा के संबंध में गलत निष्कर्षों का शिकार हुए। भाषा के सार्वजनीन या राष्ट्रीय आधारों की खोज और वर्ग-भाषा की स्वीकृति-अस्वीकृति के क्रम में दोनों ही भ्रांति के शिकार हुए हैं। भाषा विज्ञान के उन्नत सिध्दान्तों और पध्दतियों के आधार पर आज ज्यादा बेहतर निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।  स्त्रीवादी चिंतकों ने मार्क्स-स्टालिन के भाषाविज्ञान संबंधी निष्कर्षों को चुनौती देते हुए साबित किया है कि दोनों ने भाषा और इसके भाषिक व्यवहार में विरोध को बिल्कुल कम करके देखा गया है।
  प्रत्येक मस्तिष्क में एक व्याकरणिक व्यवस्था होती है- यह सॉस्यूर की धारणा है। बातचीत के विविध तरीकों जो कि प्रयोक्ता के भाषिक ज्ञान का प्रकार्य हैं साथ ही कुछ व्यक्तिगत कारक जैसे स्मृति, ध्यान, आवेग आदि और भाषिक तथा स्थितिगत संदर्भ जिसमें वाक् उत्पन्न होता है इन सब को ध्यान में रखकर ही भाषा के सार्वजनीन आधार और वर्गभाषा के होने के बारे में बात की जा सकती है।
    ­नॉम चॉमस्की के अनुसार सार्वजनीन की समस्या को हमेशा सतह और गहराई दोनों बनावटों में देखा जाना चाहिए केवल शाब्दिक आधार पर नहीं।
भाषा का वर्ग होता है कि नहीं होता इस बहस का केन्द्र ब्द और वाक्य विन्यास में अतियोक्तिमूलक दूरी है। स्टालिन ने माना कि 'वर्ग-बोलियाँ' और 'वर्ग जार्गन' शाब्दिक विशेषताओं के कारण होते हैं लेकिन इसे वह विशिष्ट भाषा, बुर्जुआ की भाषा, सर्वहारा या किसान की भाषा मानने से इंकार करता है। इन बोलियों का न तो अपना कोई व्याकरण होता है न ही कोई वाक्य विन्यास वे इसे राष्ट्र-भाषा से उधार लेते हैं। इसके विपरीत मार्क्स की धारणा है कि चाहे बुर्जुआजी कहें चाहे सर्वहारा कहें, वर्ग-व्याकरण होता है और वह सार्वजनीन ब्दों के प्रयोग पर टिका होता है जो सामाजिक आर्थिक संरचना के अनुसार होता है। यदि यह माने कि विमर्श का उत्पादन भाषा का प्रकार्य है और इसमें भेजनेवाले, संदर्भित वस्तु और प्राप्तकर्ता का संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मज़दूर वर्ग के द्वारा सहज रूप से बनाये गए वाक्य और मध्यवर्ग के द्वारा बनाए गए वाक्य में फ़र्क हो जाता है। यह देखा गया है कि दोनों की भाषा में शाब्दिक विशिष्ट्ताएं भिन्न हैं, ब्द चयन में अंतर है। सबसे ज्यादा उल्लेखनीय है ब्दावली का अंतर। उच्चारण की विविध शैलियाँ आसानी से अलगायी जा सकती हैं। कई ऐसी भिन्नताएं मिलती हैं जिनके आधार पर वर्ग भाषा को परिभाषित किया जा सकता है बजाए ब्दों के आधार पर करने के। ब्द की व्याख्या भी वाक्यगत और अर्थगत विश्लेण की मांग करती है।
मज़दूर वर्ग की भाषा का अध्ययन करने पर पता चलता है कि विय का संज्ञा रूप अमूमन 'मैं', 'हम', 'कोई' आदि होता है जो कि संदे देनेवाले विय और पैदा किए गए वक्तव्य के बीच कम-से कम अंतर का आभास देता है। संज्ञा के लिए अन्य पद सजीव, चल रूप होते हैं या विशिष्ट जड़ रूप। क्रिया-रूप प्राय: प्रक्रिया या कार्यरूप में होते हैं जिसमें करना महत्वपूर्ण होता है। रूपान्तरण की प्रक्रिया और चयन किए गए क्रियारूप  वर्तमान अथवा अतीत में 'नरैटिव' के प्रचलन को दिखाते हैं। वस्तु के संज्ञा रूप में सजीव और विशिष्ट ठोस जड़ की प्रमुखता होती है।
मजदूर वर्ग के लिए काम भाषा में उपस्थित नहीं होता बल्कि वह वक्ता के साथ ही संलग्न होता है जिसको भाषा में शाब्दिक अनुवाद के जरिए नहीं लाया जा सकता। मध्यवर्ग के लिए भाषा स्वयं में उत्पादन का औजार है जिसमें इसका मैनिपुलेन व्याकरण और सैध्दान्तिक अवधारणाओं को जन्म दे सकता है साथ ही विचारधाराओं को भी ; विचारधाराएं जो आर्थिक उत्पादन के तंत्र पर नियंत्रण के लिए आवश्यक साधन हैं। सवाल उठता है कि तात्कालिक अनुभव पर आधारित विमर्श और सामाजिक-सांस्कृतिक माध्यमों का निर्माण करनेवाले विमर्श में क्या अंतर है ? लुइस ईरीगरी का मानना है कि वक्तृता के इन दोनों ढंगों में प्रस्तुति के तरीके और विमर्श के वास्तविक उद्देश्य के बीच दूरी  है। एक मामले में काम या काम का नरैटिव 'संसार' में लाया जाता है तो दूसरे में भाषा का मैनिपुलेन भाषि'वस्तु' को अन्य में परिभाषित करने के लिए किया जाता है। वक्तृता के ये विविध प्रकार्य इस बात से तय होते हैं कि उत्तर देनेवाले के काम का सामाजिक महत्व क्या है ?
चूँकि श्रम का महत्व हमारे समाज में घटता गया है , इस कारण मेहनतकशों की भाषा शैली ,उनके ब्द-भंडार हेय दृष्टि से देखे जाने लगे। मजदूरों की भाषा , स्त्रियों की भाषा के प्रति जो धारणाएं प्रचलित हैं उनका उत्स यही चालाकी भरी घृणा और उपेक्षा का भाव है जिसमें अपने वर्चस्व की चिंता सर्वोपरि है। यह एकदम सच है कि शोषक वर्ग हमेशा से अपने हितों के संरक्षण के लिए एक रहा है। विचारों के उत्पादन के क्षेत्र में भी यह सच है। मजदूर वर्ग की बोली के लिए अशिक्षित, गंवारू, ग्राम्य बोली की संज्ञा देना ; मज़दूर नेता चीख-चीखकर भाण देते हैं अत: चीख-चीखकर बोलना गंवारपन की निशानी है। असभ्यों की शैली है। क्रोध में भी गंभीर ढंग से बोलना , स्व धीमा रखना, भावहीन ढंग से लगभग रोबोट की तरह बोलना - सभ्य शैली है।
आजकल जो तमाम एटीकेट सिखाने वाली संस्थाएं हैं वे काँटा-छुरी कैसे पकड़ें के साथ यह भी सिखाती हैं कि बातचीत में कैसे स्वर का प्रयोग करें, अपने से उच्च अधिकारी से बात कर रहें हों तो आपके हाव-भाव ,निगाहें कहाँ हों, इसी तरह से स्त्रियों के मामले में कि उनकी बातचीत सभाओं, गोष्ठियों में किस तरह की हो , कैसे मिश्रित समूह में बात करते समय उनकी भूमिका फैसिलिटेटर की होनी चाहिए। उन्हें सर्पोटिव ढंग से बातचीत में पहल करनी चाहिए, कोई असुविधाजनक स्थिति पैदा करनेवाली या सवाल उठानेवाली भाषा से बचना चाहिए। उनकी भाषा कुल मिलकर 'यस बॉस' की भाषा होनी चाहिए।

Friday, April 2, 2010

खिलाड़ी,बहू और मीडिया

               

 सानिया स्टार टेनिस खिलाड़ी हैं। अपनी रैंकिंग में उतार-चढ़ाव के बावजूद सानिया मीडिया का पसंदीदा चेहरा रही हैं। सफल और स्टार खिलाड़ी के पीछे लगकर मीडिया उनकी छवि को अपने हक़ में भुनाता है। उन्हें इंसान से भगवान बनाने में सारी मेहनत लगा देता है। जितना बड़ा आख्यान बना सकता है बनाता है। सारी सकारात्मक स्टोरिज़ को बयान करने की कोशिश करता है। उनके कपड़े जूते , चड्ढी, बनियान सब महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इस महागाथा के निर्माण के पीछे मीडिया जनमनोविज्ञान की बहती गंगा में तो हाथ धो ही रहा होता है साथ ही भविष्य का एजेण्डा भी सेट कर रहा होता है। वह अपने लीन पीरियड के लिए मसाला जुटा रहा होता है।
 मीडिया ने सानिया की स्टोरी का आगाज़ पॉजिटिव ख़बर से किया था, टी वी सीरियलों में चल रही शादी और गुड़ियों सी सजी-धजी दुल्हनों की भीड़ में असली दुल्हन बनने चली सानिया मिर्जा की कहानी सुनाई गई। फिर अचानक शादी में विघ्न पैदा हुआ। जैसाकि सीरियली शादी में होता है। एक नया चरित्र आएशा का दाखिल होता है। बताया जाता है कि आएशा शोएब की पहली पत्नी है। उनके पास निकाहनामा है जिसे वो पाकिस्तानी मीडिया को प्रसारित करने के लिए देती हैं। वैध और अवैध शादी की बहसें जन्म लेती हैं। एक मौलवी जी टी वी पर मीमांसा मलिक के समाचार एंकरिंग के दौरान कहते हैं कि यदि शोएब ने पहले शादी की भी है तो उसे मुसलमान होने के नाते चार शादियाँ करने का हक़ तो है। मुस्लिम समाज में विवाह की स्थितियाँ और औरत के हक़ का मसला बनने लगता है। आधुनिक समाज में मुस्लिम पर्सनल लॉ, जिसे मुसलमानों के मसले पर भारतीय क़ानून से इतर फैसले लेने का हक़ प्राप्त है का औरत के हकूक के मामले में निहायत ही पिछड़ा चेहरा सामने लाने की कोशिश की जाती है। इसमें मुकम्मल तौर पर इन स्थितियों में क्या प्रावधान है बताने की कोशिश नहीं की जाती। बस इतना प्रचारित किया जाता है कि मुसलमानों को शरियत के अनुसार चार बीवियाँ रखने का हक़ है !
 मीडिया 29 मार्च 2010 से सानिया मिर्जा और शोएब मलिक की शादी की अटकलपच्चू में लगा हुआ था। पहले दिन सानिया और शोएब की प्रसन्न तस्वीरें दिखाई दीं। मिठाई, खुशी की बातें और शादी की तैयारियों की बातें सुनाई दीं। यहाँ तक तो किसी आम सीरियल की कहानी की तरह ही सानिया की कहानी भी चली। पर इसी बीच पत्रकारों ने भविष्य की योजनाओं का प्रश्न खड़ा कर दिया- सानिया शादी के बाद कहाँ रहेंगी ? भारत के लए खेलेंगी या पाकिस्तान के लिए ? इस प्रश्न ने जैसे आग लगा दी। राष्ट्रीयता के ठण्डे पानी में उबाल पैदा कर दिया। भारत में शिवसेना के कार्यकत्ताओं और शिवसेना प्रमुख ख़म ठोंककर मैदान में आ गए। पर राष्ट्रभक्ति के पाठ की शुरूआत का श्रेय इस बार समाजवादी पार्टी के नेता अबु आजमी ले गए। पाकिस्तान के टेनिस फेडरेशन के अध्यक्ष दिलावर अब्बास के बयानों से जाहिर हुआ कि कट्टरवादियों के लिए हिन्दुस्तान के अलावा भी पसारा है।
 बिना यह सवाल पूछे-जाने की क्या सानिया पाकिस्तान के नागरिक के साथ शादी करके हिन्दुस्तान की नागरिकता छोड़ देंगी , सानिया को पाकिस्तान टेनिस फेडरेशन के अध्यक्ष दिलावर अब्बास की तरफ से पाकिस्तान की बहू होने के नाते पाकिस्तान की तरफ से खेलने की सलाह दी गई। तो बाल ठाकरे ने भी दहाड़कर घोषणा की कि सानिया पाकिस्तानी से शादी करने के बाद हिन्दुस्तान के लिए नहीं खेल सकतीं। सानिया की देशभक्ति संदिग्ध है क्योंकि अरबों की आबादीवाले भारत में उन्हें एक भी सुटेबल ब्यॉए नहीं मिला ? शायद बाल ठाकरे को लगा हो कि सानिया ने ऐसा करके हिन्दुस्तानी मर्दों की 'जवांमर्दी' पर प्रश्नचिह्न लगाया है ?(वैसे बलात्कार और यौनहिंसा, घरेलू हिंसा के मामलों के आंकड़े तो कुछ और ही बताते हैं !) वाकई कबीले के सरदार की नाक कट गई , घर की लड़की कट्टर दुश्मन पाकिस्तान के लड़के के साथ ! छी: छी:! ( वैसे खाप पंचायतों के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर क्या कहेंगे ? वहाँ तो गांव के भीतर की बात थी।)
 बाल ठाकरे इतने आहत थे कि उन्होंने यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि उनका कट्टरतावाद पाकिस्तान के कट्टरतावाद से एक क्यों हो रहा है ? अलग तर्कों के बावजूद निष्कर्ष में एक जगह कैसे पहुँच रहे हैं ? ठाकरे ने यह भी कहा कि लोग मैदान पर सानिया के खेल को नहीं उनके फैशन और छोटी स्कर्ट को देखने जाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि सानिया ने टेनिस की दुनिया में हिन्दुस्तान की पहचान तब बनाई थी जब मैदान लगभग खाली था। उन्होंने अपने कठिन परिश्रम और लगन से अपने खेल का लोहा मनवाया। अगर खेलों में खिलाड़ियों की पोशाक महत्वपूर्ण होती और लोग खिलाड़ी की टांगों को देखने टिकट कटाकर खेल देखने जाते तो क्रिकेट के बजाए टेनिस को लोकप्रिय खेल होना चाहिए था। ठाकरे ने हिन्दुस्तानियों के खेल-बोध पर भी उंगली उठाई है। अच्छी कद-काठी और फैशन सफलता की गारंटी होती तो हर अच्छी कद-काठी की खिलाड़ी लड़की सफल खिलाड़ी होती ! पर ऐसा नहीं है।
 भारत की विदेश नीति के तहत अन्य पड़ोसी देशों की तुलना में पाकिस्तान के साथ ज्यादा संवेदनशील व्यवहार है। पाकिस्तान से हमारी संस्कृति और व्यवहार के संबंध भी अन्य पड़ोसी देशों की तुलना में ज्यादा क़रीबी हैं। सियासी क़िताब में पाकिस्तान शत्रु है। पर कट्टर सियासतदानों के लिए पाकिस्तान का हर नागरिक भी शत्रु है। ठीक वैसे ही जैसे कट्टर पाकिस्तानी सियासतदानों के लिए हिन्दुस्तान का हर नागरिक शत्रु है !
 इस मसले में जितने पेंच हैं उन सबका क़ानूनी हल है। चाहे वह दो शादी का मामला हो, निकाह के होने न होने का मामला या तलाक़ का मामला हो, किस देश की तरफ से खेलेंगी यह प्रश्न हो, नागरिकता का प्रश्न हो या कोई और प्रश्न अंतत: इन्हें क़ानून के अनुसार ही तय होना है। होना भी यही चाहिए। मीडिया ट्रायल के जरिए गुनहगार तय करने के पहले क़ानूनी प्रावधानों की सही जानकारी देनी चाहिए। मीडिया का काम यह नहीं होना चाहिए कि वह यह जाहिर करे कि पूरी जांच-पड़ताल कर मामले की मेरिट-डिमेरिट तय करना तो क़ानून का काम है उसके पास जब मसला जाएगा तो वह करेगा ही तब तक ख़बर को चटपटी स्टोरी क्यों न बनाकर टी आर पी बढ़ाएं ! कहाँ गया मीडिया पर किसी भी सेंसरशिप के खिलाफ आत्मनियंत्रण का दावा ? जिस आवेशपूर्ण माहौल का निर्माण मीडिया कर रहा है उसमें किसी की भी कैजुअलिटी हो सकती है। टाइम्स नाउ के अर्णब गोस्वामी कल प्राइम टाइम में इस विषय पर जो बहस चला रहे थे उसमें उनके द्वारा पूछे गए सवालों में कहीं यह सवाल नहीं था कि क्या आएशा या माहा सिद्दकी का परिवार मीडिया में आने से पहले क़ानून की शरण में गया ? हिन्दुस्तानी मीडिया कब अपनी भाषा बोलेगा, अपने पैटर्न तय करेगा, अपनी जिम्मेदारी समझेगा यह सवाल है।

Thursday, April 1, 2010

मुहब्बतवाली शादी

      (सानिया मिर्जा)
       
     सानिया मिर्जा शोएब मलिक से शादी करेंगी। यह खबर है पर इसने एक साथ ही  कई मसलों को जन्म दे दिया है। पड़ोसी देश के साथ अंतर्राष्ट्रीय संबंध के मुद्दे के साथ-साथ सानिया और शोएब के पिछली जिंदगी को खंगालने का काम शुरू हो चुका है। सानिया को सलाह और निर्देश देनेवालों की भरमार हो रही है। राजनीतिक क्षेत्र से सबसे ज्यादा बयानबाजी हुई। समाजवादी पार्टी के नेता अबु आजमी के बयान से तो लगता नहीं कि वे किसी सभ्य नागरिक समाज का हिस्सा हैं। यह काम शिवसेना किया करती है, मसले को राष्ट्रीय रंग देकर कर भी रही है। पर समाजवादी पार्टी जैसे बढ़त लेने को तैयार बैठी है। अबु आजमी का कहना है कि- जहाँ शादी पहले लगी थी वहीं शादी करनी चाहिए। माँ बाप के कहने से शादी करनी चाहिए लेकिन ये मुहब्बत करनेवाले लोग हैं। पर मुझे यह पसंद नहीं कि सानिया पाकिस्तानी से शादी करें और दुबई में रहें तथा भारत के लिए खेलें। ध्यान रखें कि उनकी पार्टी के सुप्रीमो माननीय मुलायम सिंह ने महिला आरक्षण के अंदर आरक्षण की मांग की है। इस आधार पर वे महिला आरक्षण बिल का विरोध कर रहें हैं लेकिन विरोध करते हुए निहायत ही गैरजिम्मेदाराना बयान दिया था कि आरक्षित सीटों पर चुनी गई महिला उम्मीदवारों को देखकर लोग सीटी बजाएंगे।
  शिवसेना के कार्यकर्त्ता भी मैदान में आ गए हैं। शिवसेना का बयान है कि अगर सानिया मिर्जा़ शोएब मलिक से शादी करती हैं तो सानिया के साथ-साथ पूरे देश को ख़तरा है।
  इसमें एक पक्ष पाकिस्तान टेनिस फेडरेशन के दिलावर अब्बास का भी है जो कहते हैं कि सानिया को पाकिस्तान की तरफ से खेलना चाहिए और पाकिस्तानी लड़कियों की प्रेरणा स्रोत बनना चाहिए। उसमें मुख्य जोर इस पर है कि सानिया को अपने पति का अनुसरण करना चाहिए।
 उल्लेखनीय है कि कल यानि 31 मार्च के पहले तक क़यास और अटकलें लगाई जाती रहीं। अपुष्ट ख़बरों के कैप्शन चलते रहे कि क्या सानिया शोएब से शादी करेंगी? कल जब सानिया ने पुष्टि की कि वे शोएब से शादी करने जा रही हैं। उन्होंने अपने परिवारीजनों के साथ मीडिया के सामने आकर कहा कि वे शोएब से शादी के निर्णय पर बहुत खुश हैं, उनके परिवार के लोग भी खुश हैं और वे चाहती हैं कि मीडियावाले भी इस खुशी में शामिल हों। वे इस समय सिर्फ शादी की तैयारियों के बारे में सोच रही हैं। तमाम उलझन भरे सवालों के जवाब में सानिया ने कहा कि वे भारत के लिए खेलेंगी और शोएब ,इंशाअल्लाह पाकिस्तान के लिए और वे शादी के बाद दुबई रहेंगी। इसके साथ ही मीडिया ने उनके पूर्व मंगेतर सोहराब जो विदेश में एम बी ए की पढ़ाई कर रहा है के परिवारवालों को खोज निकाला। सोहराब के पिता का बयान था कि वे सानिया को आर्शीवाद देंगे और बुलाने पर शादी में भी शामिल होंगे।
 मीडिया कवरेज के दौरान और पाकिस्तान फेडरेशन के अध्यक्ष के बयान के जवाब में दिए गए बयान में कि सानिया भारत के लिए खेलेगी, सानिया के पिता- माता सानिया की पसंद के साथ दिखाई दिए। फिर पता नहीं अबु आजमी और शिवसेना को कैसे यह इलहाम हो गया कि सानिया का यह निर्णय माता-पिता , घर -परिवार और देश के खिलाफ है। मुहब्बत करनेवाले क्या अपराधी होते हैं ?
 सबसे महत्वपूर्ण बात कि सारी सलाह सानिया को क्यों ? क्या इसमें सानिया का लड़की होना और आधुनिक बिंदास फैशनेबल छवि, इससे पहले भी संबंधों का टूटना आदि कहीं उसके खिलाफ तो नहीं जा रहा? यह जानना चाहिए कि टेनिस और फैशन की दुनिया का संबंध नया नहीं है। विलियम्स बहनें और अन्य महिला खिलाड़िनें इसका हिस्सा रही हैं। सानिया की छवि के साथ ग्लैमर की दुनिया का गहरा संबंध है। वे मीडिया आईकॉन हैं। लेकिन इन सबसे क्या अपनी निजी जिन्दगी के फैसले लेने का उनका हक़ छिन जाता है। भारतीय मीडिया क्या पप्पाराजी की तरफ बढ़ रहा है ? और यदि ऐसा है तो शोएब के लिए वह इस सलाह को किसी नेता के मुँह से क्यों नहीं निकलवा लेता कि शोएब शादी के बाद हिन्दुस्तान के लिए खेलेंगे ?
 दरअसल शादी एक पूरा पैकेज है। वह चाहे 'मुहब्बत' वाली हो या 'बिना मुहब्बतवाली'। इसके अंदर के संबंधों और दुनिया को व्यक्तिगत तरीके से परिभाषित करने की कोशिश हो रही है पर आम राय और उम्मीदें शादी के पैकेज के अनुकूल ही हैं। इसी कारण सानिया से बहू होने के फर्ज को पूरा करने की उम्मीद है। शादी के अंदर मौजूद यौनशुचिता की धारणा के तहत ही सानिया के पुराने संबंधों को खोज-खोजकर बताया जा रहा है। जबकि शोएब द्वारा पहली पत्नी से तलाक़ लिए बिना सानिया से शादी की ख़बर मीडिया में आने के बावजूद हमें नहीं चौंकाती। शोएब की पहली पत्नी से तलाक़ न होने की स्थिति में सबसे ज्यादा प्रभावित सानिया, शोएब और उनकी पहली पत्नी(यदि हैं  तो) होंगी। तो क्या ये लोग इससे अनजान हैं? यदि नहीं तो मीडिया और अन्य लोगों को कोई भी हक़ नहीं है कि वे राष्ट्रीयता के नाम पर, देश की बेटी या बहू के नाम पर, सेलिब्रिटी के नाम पर किसी के व्यक्तिगत जीवन में टांग अड़ाएं। यदि विवाह एक क़ानूनी प्रक्रिया है तो विवाह से मुक्त होना भी एक क़ानूनी प्रक्रिया है और क़ानून के दरवाजे सबके लिए खुले हैं। हर व्यक्ति को अपनी निजी जिन्दगी अपने ढंग से जीने का अधिकार है।    

Monday, March 29, 2010

शिक्षा का उद्देश्य सफल होना है या मनुष्य बनना



         विद्या विनय देती है। यह संस्कृत साहित्य की पुरानी उक्ति है। विनयी होने का क्या अर्थ है ? गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की स्वप्नसंस्था 'विश्वभारती' में 'डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन' के लिए नाम दिया गया 'विनय भवन'। यहाँ स्नातक स्तर के बाद सभी अनुशासनों के छात्र-छात्राओं के लिए 'बैचलर ऑफ एजुकेशन' और 'मास्टर ऑफ एजुकेशन' की पढ़ाई होती है। स्नातक तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद छात्र-छात्राओं को जीवन के व्यवहारिक क्षेत्र में प्रवेश के योग्य माना गया। जीवन और शिक्षा में एकरूपता के लिए तैयार करने में विनय भवन की भूमिका मानी गई। लेकिन गुरूदेव की शिक्षा के सन्दर्भ में जो धारणा थी उससे आज की शिक्षानीति का कोई मेल नहीं।


आज के 'शिक्षागुरूओं' ने विनय की परिभाषा इतनी दूर तक खींची है कि यह चाटुकार होना, लचीला होना , अनुगामी होना , विश्वास करना, मानना, सहनशील होना और न जाने क्या-क्या हो गया है। विद्या अर्जन का यह उद्देश्य नहीं होना चाहिए कि व्यववहारिक या तकनीकी कौशल हासिल करके जीवन में सफलता की सीढ़ियाँ चढें। सफलता के कुछ टिप्स बन गए हैं जो सफल है वह व्यवहारकुशल भी है। अड़ियल नहीं है। लचीला है। तभी सफल भी है।
    वास्तव में शिक्षा का उद्देश्य अच्छा मनुष्य बनाना है। लेकिन न तो कोई मनुष्य बनना चाहता है न कोई बनाना। नामी विदेशी विश्वविद्यालयों की शाखाओं के रूप में कौन से काट की मनुष्य-मैन्यूफैक्चरिंग मशीन हिन्दुस्तान में लगती है इसके बारे में सोचना मुश्किल नहीं है।