Monday, March 29, 2010

शिक्षा का उद्देश्य सफल होना है या मनुष्य बनना



         विद्या विनय देती है। यह संस्कृत साहित्य की पुरानी उक्ति है। विनयी होने का क्या अर्थ है ? गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की स्वप्नसंस्था 'विश्वभारती' में 'डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन' के लिए नाम दिया गया 'विनय भवन'। यहाँ स्नातक स्तर के बाद सभी अनुशासनों के छात्र-छात्राओं के लिए 'बैचलर ऑफ एजुकेशन' और 'मास्टर ऑफ एजुकेशन' की पढ़ाई होती है। स्नातक तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद छात्र-छात्राओं को जीवन के व्यवहारिक क्षेत्र में प्रवेश के योग्य माना गया। जीवन और शिक्षा में एकरूपता के लिए तैयार करने में विनय भवन की भूमिका मानी गई। लेकिन गुरूदेव की शिक्षा के सन्दर्भ में जो धारणा थी उससे आज की शिक्षानीति का कोई मेल नहीं।


आज के 'शिक्षागुरूओं' ने विनय की परिभाषा इतनी दूर तक खींची है कि यह चाटुकार होना, लचीला होना , अनुगामी होना , विश्वास करना, मानना, सहनशील होना और न जाने क्या-क्या हो गया है। विद्या अर्जन का यह उद्देश्य नहीं होना चाहिए कि व्यववहारिक या तकनीकी कौशल हासिल करके जीवन में सफलता की सीढ़ियाँ चढें। सफलता के कुछ टिप्स बन गए हैं जो सफल है वह व्यवहारकुशल भी है। अड़ियल नहीं है। लचीला है। तभी सफल भी है।
    वास्तव में शिक्षा का उद्देश्य अच्छा मनुष्य बनाना है। लेकिन न तो कोई मनुष्य बनना चाहता है न कोई बनाना। नामी विदेशी विश्वविद्यालयों की शाखाओं के रूप में कौन से काट की मनुष्य-मैन्यूफैक्चरिंग मशीन हिन्दुस्तान में लगती है इसके बारे में सोचना मुश्किल नहीं है।





Sunday, March 28, 2010

माध्यम और सामाजिक सरोकार - पीटर गोल्डिंग


      तकनीकी क्षेत्र में तेजी से आ रहे परिवर्तनों ने परंपरित जीवनशैली पर इनके प्रभावों को लेकर काफी आलोचना और आशंका पैदा की। कोई आश्चर्य नहीं कि सर्वाधिक नए माध्यम को भी उसी भर्त्सनामूलक आलोचना के नजरिए से देखा गया। टेलीविजन के एक आरंभिक आलोचक ने अपना अनुभव इन शब्दों में लिखा है-
    ''आणविक बमों के बुखार से पीड़ित इस दुनिया में जो बहुत भयावह ढंग से शांति और युध्द के बीच संतुलन बनाए हुए है, एक नया ख़तरा पैदा हुआ है , टेलीविजन का ख़तरा-अणु के जेकिल और हाईड, एक ऐसी ताकत जो संस्कृति और मनोरंजन के क्षेत्र में क्रांति पैदा कर दे, जो एक ही साथ विनाश का दानव भी है और उसका निषेधक भी।''
      माध्यम के इस तकनीकी पक्ष के प्रति जागरुकता और भी ज्यादा गहराई से प्रसारण के साथ जुड़ी हुई है। यद्यपि तकनीक नएपन के प्रति लगाव सिनेमा के आरंभिक इतिहास का महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। शायद इसकी जड़ें और भी गहरी हैं, उदाहरण के लिए, औेद्योगीकरण के विरूध्द लोकप्रिय विद्रोहों के रूप में। नई तकनीक ने कार्य और अवकाश दोनों में बदलाव किया है लेकिन दोनों के बीच का संबंध बहुत महत्वपूर्ण है कम से कम दोनों में से किसी भी क्षेत्र में किसी भी प्रकार के वैज्ञानिक अन्वेषण के प्रभाव के संबंध में तो हैं ही।

सरोकार का दूसरा क्षेत्र जनमाध्यमों की विचारों और विश्वासों को प्रभावित करने और व्यवहार को अपनी तरफ मोड़ने की संभावित क्षमता है। जनसंचार का कर्नेल मॉडल जिसमें कुछ लोग बहुसंख्यक को असीम शक्ति और दण्डमुक्ति के भाव से भरकर संबोधित करते हैं, ने इस तरह के शोधों को जन्म दिया है जिसमें फुसलानेवाले संचार के खतरे और प्रभावों पर जोर है। केन्द्रीय समस्या के रूप में प्रोपैगैण्डा और विज्ञापन को रखा गया। युद्ध के दौरान के अधिकतर शोध आक्रामक प्रोपैगैण्डा के प्रभावों की खोज और इससे लड़ने के बेहतर तरीकों के अन्वेषण में लगे हुए थे। इस तरह के शोधों ने विशेष तौर पर अमेरिका में, बाद के कामों पर दूरगामी प्रभाव डाला जबकि इस देश में भगवान 'हॉ-हॉ' की लोकस्मृतियों और माहौल में व्यापत 'जरूरत के समय में दोस्त' बनाने के चलन ने जिसे बी बी सी ने अपने युद्धकालीन प्रसारणों की नीति बना रखी थी , ने बहुत आगे चलकर प्रसारण के प्रभाव और खतरों की व्याख्या करनेवाले विमर्शों के ढर्रे को बदला।

इसी तरह से विज्ञापन उद्योग के विकास और इसके द्वारा माध्यमों के प्रयोग ने लोकप्रिय रवैय्ये में संभावित परिवर्तन को लेकर एक तनाव की स्थिति पैदा की। इनमें छद्म जरूरतों का निर्माण और भौतिकवाद, धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा और आम जनता के बड़े हिस्से में तुलनात्मक रूप से वंचित होने का बोध शामिल था। डेनीस थॉम्सन जो इस दृष्टिकोण के आरंभिक व्याख्याकार थे और जिन्होंने हाल के वर्षों में इसे बिना किसी घालमेल के फिर जोर देकर दोहराया-''विज्ञापन उपभोक्ताओं की समनुरूप संख्या के बारे में आश्वस्त करता है। ऐसा वह प्रेस और टी वी के ऊपर नियंत्रण के जरिए करता है। इसकी आचार संहिता बहुत जोरदार ढंग से संचार के समूचे तंत्र को आवृत्त करती है। यथास्थिति के सिध्दान्त के अनुकूल इसका लक्ष्य हमारे जीवन को नियंत्रित करना और हमें उपभोक्ता दौड़मशीन (कंज्युमर ट्रेडमिल) पर लगाए रखना है।''
     इस तरह की भावनाओं ने विज्ञापन ,उसकी आचार संहिता, उसकी कृत्रिमता पर किए जा रहे हमले को सीमित कर दिया। बजाए इसके कि माध्यमों में इसके बढ़ते प्रभाव को कम करके दिखाए। जहाँ तक प्रोपैगैण्डा का सवाल है इसके शोधों का उद्देश्य हमले का निशाना बन सकनेवाले 'खलनायकों' पर से ध्यान हटाकर 'पीड़ित' पर ध्यान केन्द्रित करना है।
     सांस्कृतिक आलोचना की लंबी परंपरा से निकलकर एक तीसरा बृहत्तर सरोकार उभरता है जिसका संबंध मैथ्यू अर्नाल्ड, टी एस इलियट और एफ आर लेविस के लेखन से जुड़ता है , जिनका भय यह था कि सांस्कृतिक मिलावट निश्चित रूप से स्तरहीनता को जन्म देगा, अवकाश के बढ़े अवसर तुच्छ जन मनोरंजन के द्वारा बर्बाद किए जा रहे हैं और अंग्रेजी संस्कृति के जरिए इन्हें रोका जा सकता था लेकिन नए माध्यम के द्वारा न केवल इनकी उपेक्षा की जा रही है बल्कि इनके लिए ख़तरा भी पैदा किया जा रहा है। शोध कार्यों का एक बड़ा हिस्सा इन प्रवृत्तियों से लड़ने के तरीके खोजने में लगा है जो इस बात की तसदीक करता है कि ये प्रवृत्तियाँ मौजूद रही हैं।

विश्वास की एक और बेचैन प्रक्रिया है जो माध्यमों के प्रभाव को लेकर सशंकित है। वैकल्पिक अवकाश के साधनों के अभाव में माध्यमों के समक्ष अधिकतम अरक्षण (एक्सपोजर) के कारण अथवा अज्ञानता या अपरिपक्वता के कारण या अस्वाभाविक असुरक्षा की वजह से इन समूहों को विशेष तौर पर संरक्षा की जरूरत है। बच्चे और कामगार वर्ग दोनों समूह इस भूमिका में आन्तरायिक भाव से अनुकूल बैठते हैं।
     बच्चों के लिए सरोकारों की झलक अमेरिका के फ्रेडरिक वर्थैम्स की महत्वपूर्ण शोध कृति 'द सेडक्शन ऑफ द इनोसेन्ट' में विस्तार क साथ दिखाई देती है। इन सरोकारों में नया कुछ नहीं है। जॉन टाबियस ने 19 वीं शती में बाल अपराधों के बारे में लिखते हुए कहा कि '' जैक शिफर्ड, डिक टर्पिन और अन्य अपराध नायकों का लोकप्रिय कल्पना पर प्रभाव ऐसा था कि वे लगभग 19 वीं शती तक अनुश्रुति का हिस्सा बन चुके थे। समसामयिकों ने पाया कि उनके नाम और दुस्साहसिक कारनामे अधिकतर बच्चों को मालूम थे जबकि उन्हें इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया का नाम नहीं पता था। ''
     एक जेल का प्रशासक इन छोटे बच्चों के अपराध के बारे में बिना किसी हिचक के कहता है ''ये उनके सिक्के के नंबर हैं जिनकी मैं गिनती करता हूँ, महोदय।''

न केवल बच्चों की गतिविधियों पर जनमाध्यमों के बढ़ते प्रभाव , उनके आपराधिक व्यवहार, स्कूल के काम, उनके अवकाश के समय पर माध्यमों का एकाधिकार आदि की तरफ ध्यान गया बल्कि सामान्यतया उनकी आस्थाओं , सेक्स के प्रति उनका रवैय्या, नैतिकता पर भी चर्चा हुई। 1960 के मध्य में 'राष्ट्रीय दर्शक और श्रोता' नाम से स्थापित संस्था जो अपने उत्साही सचिव मेरी व्हाइटहाउस के आलोचनात्मक दृष्टिकोण से खासा प्रभावित थी, ने हमेशा प्रसारण के बच्चों पर तथाकथित घातक प्रभावों को अपने प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। श्रीमती व्हाइटहाउस ने बारंबार दोहराया कि कैसे टेलीविजन के बच्चों के कामुक व्यवहार पर पड़नेवाले असर के संबंध में उनकी खोज ने उन्हें 'वाला' जैसी संस्था शुरु करने के लिए उत्प्रेरित किया।

इसी तरह की चिंता भोले, कम पढ़े और सुसंस्कृत माध्यम उपभोक्ताओं को लेकर माध्यम के व्यवहार में और बाद के शोधों में दिखाई देती है। लॉर्ड रीथ, बी बी सी का पहला महानिदेशक, माध्यमों को लोकप्रिय शिक्षण और नैतिक उत्थान के औजार के रूप में ,कम से कम कला के क्षेत्र में नहीं देखे जाने का असली व्याख्याकार बन गया। रीथ ने 1924 में लिखा, '' वर्षों से, सड़क का आदमी ऐसे संगीत से संतुष्ट होता रहा है जो आसानी से और तुरंत घुलमिल जाता है और इसीलिए हमेशा बेहतर नहीं होता।'' सेंसरशिप की भूमिका को लेकर तर्क-वितर्क कई बार सांस्कृतिक सुसभ्यता और जनसंचार की दुर्बलता के विपरीत संबंधों पर जोर देते हैं, सेंसरशिप को कीमत के स्तर पर औचित्यपूर्ण ठहराने अथवा बड़े पैमाने पर निष्क्रिय कर दी गई सामग्री के लिए एक सावधान नियंत्रण को बरतने की आवश्यकता के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।

( पुस्तक अंश- पुस्तक का नाम- जनमाध्यम, लेखक पीटर गोल्डिंग,अनुवाद-सुधा सिंह,प्रकाशक, ग्रंथ शिल्पी,बी-7,सरस्वती कामप्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मीनगर,दिल्ली-110092,मूल्य-325रुपये)

पत्रकारिता में पेशेवर रवैय्या आवश्यक है- पीटर गोल्डिंग

     जनमाध्यम से संबंधित हमारी जानकारी में एक बड़ी चूक संप्रेषक या संचारकर्ता के बारे में किसी भी किस्म की विस्तृत जानकारी का अभाव है; निर्माता, लेखक, सर्जक, प्रबंधक, तकनीकीविद्, पत्रकार और अन्य जिनके निर्णय और विचार जनमाध्यम की प्रस्तुति को आकार देते हैं, इनके बारे में हमें न्यूनतम जानकारी होती है। सांस्थानिक बौध्दिकों और मनोरंजनकर्ताओं आदि जो संचार उद्योग की कार्यशक्ति का निर्माण करते हैं, संख्या में तेजी से वृध्दि हुई है, लेकिन अभी भी सही आंकड़ों का आकलन कर पाना एक मुश्किल काम है। 
      जनगणना के आंकड़े अपर्याप्त लेकिन बुनियादी दिशानिर्देशक आंकड़े हैं। ये बताते हैं कि ' लेखकों, पत्रकारों , और अन्य कामों से जुड़े मजदूरों ' की संयुक्त संख्या में 1951 में 19,086 से 1966 में 31,950 वृध्दि हुई है। इनमें निश्चित तौर पर ज्यादा संख्या विभिन्न किस्म के पत्रकारों की थी जिनका कुल आंकड़ा 24,000 था। इनमें से केवल 3,500 राष्ट्रीय अखबारों में काम करते थे। इनमें से लेखकों की स्थिति ज्यादा सन्दिग्ध थी। अधिकांश लेखकों के पास सांस्थानिक आधार था, ये किसी न किसी पेशे से या ज्यादातर शिक्षाजगत से जुड़े हुए थे, जो ब्रैडबरी के शब्दों में ' साहित्यिक वेतनभोगी ' वर्ग का निर्माण करते हैं। फिन्डलेटर ने 1963 में इनकी संख्या का कुल अनुमान 6,500 और 7,000 के बीच लगाया था, यद्यपि 1972 में 40 प्रतिशत लेखकों की आय उनके लेखन से नहीं आ रही थी, और 56 प्रतिशत की लेखन से आमदनी 500 डॉलर सालाना से भी कम थी।[1] प्रसारणकर्ताओं की संख्या भी उसी तरह भ्रांतिमूलक थी, लेकिन अकेले बी बी सी के पास 1973 में 10,000 से ज्यादा कार्यक्रम निर्माण करनेवाले कर्मचारी थे ( जिसमें अभियांत्रिकी के कर्मचारी शामिल नहीं हैं )।


कर्मचारियों की माध्यमों के बीच दोलायमान होने के कारण यह तस्वीर और जटिल हो जाती है। बहुत से लोग पत्रकारिता और प्रसारण के बीच स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, अपनी प्रतिभा को जो भी माध्यम ज्यादा विकासशील दिखाई देता है और जिसमें काम की संभावना है उसमें नियोजित करते हैं अथवा सांस्थानिक संदर्भ में उपलब्ध अपने आधार का इस्तेमाल दूसरे के लिए उत्पादन में करते हैं। यानि जहाँ वे मूल रूप से काम करते हैं उस संस्थान द्वारा प्रदत्ता सुविधाओं का इस्तेमाल अखबारों और पत्रिकाओं के लिए लेख लिखने में करते हैं। उदाहरण के लिए एक खेल पत्रकार एक फुटबॉल के खिलाड़ी के लिए आत्मकथा लिखता है और ' छाया लेखन ' करता है। माध्यमों के बीच की यह दोलायमान गतिशीलता किसी एक संस्था के लिए पेशेवर प्रतिबध्दता को तरल बनाता है और कला और पेशे के प्रति ज्यादा आम प्रतिबध्दता को प्रोत्साहित करता है, और शायद कैरियर के प्रति ज्यादा व्यक्तिवादी बनाता है। लेकिन माध्यमों के अंदर इस तरह के 'लचीलेपन' का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। विशिष्ट पत्रकारों का अध्ययन बताता है कि इनमें से एक तिहाई स्वतंत्र लेखन से सालाना 500 डॉलर से अधिक कमाते हैं जबकि उच्च पद वाले विशेषज्ञों के लिए अपनी मूल संस्था से अलग अपनी स्वायत्तता स्थापित करने के लिए इस तरह के कामों को हथियार बनाने की जरूरत नहीं है।
    एक पेशेवर समूह की कुल संख्या का जो आंकड़ा पेश किया जाता है वह वास्तव में उस माध्यम की गतिविधियों से गंभीरता से जुड़े हुए लोगों की वास्तविक संख्या को छिपाता है। उदाहरण के लिए, टेलीविजन और पटकथा लेखन से जुड़े लोगों के हितों को देखने वाली संस्था के कुल 1,600 सदस्य हैं। लेकिन संभवत: उनमें से केवल एक दहाई लोग ही कुल निर्मित पटकथा के 90 प्रतिशत का लेखन करते हैं।
     संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी होने के बावजूद भी सर्जनात्मक पेशों में नियुक्तियों की पध्दति बहुत ज्यादा परिवर्तित नहीं हुई है। बहुत बड़ी संख्या में उपलब्धि के बजाए सिफारिश प्रवेश के लिए बड़ी योग्यता मानी जाती है। लेखकों की पृष्ठभूमि से जुड़े तमाम अध्ययन बताते हैं कि वे ज्यादातर मध्यवर्ग से और पुरूष हैं यद्यपि इस तरह के ज्यादातर अध्ययन महत्वपूर्ण लेखकों के लेखन के संदर्भ में अपरिहार्य ऐतिहासिक संकेन्द्रण का शिकार हुए हैं। लारेन्सन ने सन् 1860 से लेकर 1910 के बीच जन्मे या मर गए 170 लेखकों के अध्ययन के द्वारा यह निष्कर्ष निकाला कि उनमें से लगभग आधे ' आक्सब्रिज ' गए , बढ़ी संख्या में ये पेशेवर मध्यवर्ग से थे, और इनमें केवल एक चौथाई स्त्रियाँ थीं। आल्टिक ने कुछ ज्यादा बड़ी समयावधि लेते हुए 20वीं सदी के ह्रासोन्मुखी पेशेवर मध्यवर्ग की चर्चा की है जहाँ से अधिकांश लेखक आते हैं। उसने ' लेखकवर्ग और पाठकवर्ग के बीच बढ़ती दूरियों के जिक्र के साथ जो अध्ययन किया उसमें भी वह इसी तरह के विभाजन पर पहुँचा। '
    पत्रकार इस तरह के गौरवपूर्ण पृष्ठभूमि से अमूमन नहीं आते, छोटे-मोटे पेशों से आते हैं। 'टन्सटाल' के विशेषज्ञ पत्रकारों के पिता 'प्रशासन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण दर्जा रखनेवाले, शैक्षणिक और अन्य पेशों में नौकर थे, इनका उत्पादन या भारी उद्योगों से कोई लेना-देना नहीं था।' विशेषज्ञ अधिकांश पत्रकारों की तुलना में निश्चित रूप से औपचारिक शिक्षा को लेकर गर्व कर सकते थे, और ऐसे विशेषज्ञों का अनुपात जो उच्च शिक्षा तक पहुँचे एक तिहाई है और यह इस पेशे की समग्र स्थिति को देखते हुए बहुत ज्यादा है। पत्रकारिता को कला मानने की धारणा के कारण इस संबंध में किसी भी तरह की सामान्य शिक्षा या विशिष्ट प्रशिक्षण की तुलना में प्रशिक्षणमूलक कार्यक्रम (एप्रेन्टीशिप) की मांग ब्रिटेन के पत्रकारों के विश्वास का केन्द्रबिन्दु है; यद्यपि यह ऐसा विश्वास है जिस पर हाल के वर्षों में बहुत ज्यादा बहस चल रही है। सन् 1969 में प्रशिक्षु पत्रकारों के एक अध्ययन में ब्यॉड बैरेट ने पाया कि ' लगभग आधे विद्यार्थी निम्न मध्य वर्ग और उच्च मध्य वर्ग की प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि से आए थे।' स्कूली पढ़ाई के दौरान लगभग आधे को विश्वविद्यालय में प्रवेश की न्यूनतम अर्हता हासिल थी। फिर भी यह संभव है कि आज का प्रशिक्षु समूह समग्रता में सभी पत्रकारों की तुलना में ज्यादा औपचारिक शिक्षा हासिल किए हुए है, यद्यपि जैसा कि अन्य माध्यम पेशों के साथ भी है बहुत कम आंकड़े उनकी पृष्ठभूमि के विषय में उपलब्ध हैं।
      प्रशिक्षण और प्रवेश के लिए आवश्यक अर्हता हासिल करने के आधार पर औपचारिक नियुक्तियाँ माध्यमगत पेशों में बढ़ते पेशेवराना अंदाज का सूचक है। उदाहरण के लिए नेशनल काउंसिल फॉर द ट्रेनिंग ऑफ जर्नलिस्ट ( 1955 से ) के द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों और फिल्मों और टेलीविजन पाठयक्रमों की विद्यालयों में बढ़ती संख्या इस बात की सूचक है कि माध्यम व्यवसाय में प्रवेश को पेशेवर शिक्षा उपयोगी ढंग से नियंत्रित कर सकती है। पर यह लक्ष्य इस आदर्श के साथ विरोधी मालूम होता है कि सर्जनात्मक पेशों में जिस गुणवत्ता की जरूरत होती है वह जन्मजात होती है या सर्वाधिक सटीक ढंग से 'काम के दौरान' सीखी जाती है। ज्यादा चमक-दमक वाले माध्यमों में प्रवेश की होड़ के साथ जुड़ कर इस विवाद ने प्रशिक्षण कार्यक्रमों के प्रभाव और शक्ति को कम किया है। नियुक्तियों में व्यक्तिगत विशेषीकृत धारणाएँ अभी भी हावी हैं। ब्यॉड बैरेट ने दर्ज किया है कि ' प्रवेश का दायित्व ज्यादातर आवेदनकर्ता के कंधों पर ही होता है- उसे स्वयं को -इस तरह की घोषणा के लिए किसी भी तरह के व्यवस्थित राह के अभाव में - योग्य घोषित करना पड़ता है-----बहुत से पेशेवर पत्रकार और संपादक व्यवस्था की इस कमी को फायदा समझते हैं। बी बी सी ने हाल के वर्षों में अपने निर्माण कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों में कटौती की है और यह कहा है कि ' एक व्यक्ति जो पेशेवर अनुभव प्राप्त करके बी बी सी में नियुक्त होता है उस व्यक्ति की तुलना में जो प्रशिक्षु के रूप में नियुक्त होता है नुकसान में नहीं रहता।'
      माध्यमों में कैरियर का ढाँचा उम्र, माध्यम के प्रकार और विकास की दर के अनुसार अलग-अलग होता है। यदि कोई माध्यम तेजी से विकास कर रहा है ( जैसाकि युध्द के समय बी बी सी ने किया अथवा प्रथम पाँच वर्षों में व्यवसायिक टेलीविजन ने किया) तो उसमें रोजगार और विकास की गति तीव्र होगी और सुरक्षा तथा स्थिरता होगी। ह्रासोन्मुखी माध्यम में , जैसे कि सिनेमा, कैरियर का ढाँचा अनिश्चित होगा और संभवत: इसमें काम करनेवाले एक माध्यम से ज्यादा में पाँव पसारेगें।

( पुस्तक अंश- पुस्तक का नाम- जनमाध्यम, लेखक पीटर गोल्डिंग,अनुवाद-सुधा सिंह,प्रकाशक, ग्रंथ शिल्पी,बी-7,सरस्वती कामप्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मीनगर,दिल्ली-110092,मूल्य-325रुपये)


Tuesday, March 23, 2010

स्त्री का स्व और आत्मकथा के मानक

              



 'स्व' या 'सेल्फ' पुंसवादी समीक्षा में आत्मकथा लेखन का बुनियादी आधार है वह कहीं होता नहीं है बनाया जाता है। अर्जित किया जाता है। यह स्वाभाविक नहीं है। स्वाभाविक 'स्व' वह है जो अंतर्भुक्त है। भरा-पूरा है। इंसान के होने की अनिवार्य शर्त है। आधुनिक अर्थ में 'स्व' को हासिल करने की कोशिश इस स्वाभाविक स्व से दूर भागने की कोशिश है। यहां तक कि इस स्व की सहज स्वामिनी स्त्री को भी इसके कारण हीनताबोध कराया जाता है। क्योंकि स्त्री के स्व और संसार के बाहरी स्व के बीच बड़ा अंतर होता है। उसके अंतर्भुक्त स्व को स्व की कोटि से ही खारिज कर दिया गया। स्त्री के स्व की अन्यतम विशेषता होती है कि इसमें बहुत स्पेश होता है। अपने से ज्यादा दूसरे के लिए। यह एक किस्म की अंतर्क्रिया है स्वयं , अन्य तथा वास्तविक संसार के बीच।
  स्व का निर्माण अंदर मौजूद सहज स्व की मौत है। स्व के निर्माण के क्रम में बाहरी बाधाएं, रुढ़ियां, प्रतिबंध आदि सब काम करते हैं। इनसे टकराते हुए , संघर्ष करते हुए ही इसका निर्माण संभव है। यह संसार के साथ मैं का अंतर्संघर्ष है।
                                             
 'मैं' के साथ बाहरी समाज की अंतर्क्रियाओं में पहले से मौजूद ज्ञान को आत्मसात् करने का आग्रह होता है। बाहर की दुनिया को आत्मसात् करने के क्रम में बच्चा माँ की भाषा और शरीर से दूर चला जाता है। एक ऐसी भाषा को अर्जित करता है जो सहजात नहीं है। वह शक्ति की, वर्चस्व की और असुरक्षाबोध पर विजय की भाषा है। यह पूर्वग्रह से युक्त भाषा है। हाशिए की भाषा नहीं , प्रभावशाली उपलब्धियों की भाषा है। यह अंदर की मृत्यु और बाहर के अर्जन की भाषा है।
  लेखन में वह शक्ति होती है कि उसके जरिए 'सेल्फ' को हासिल किया जा सके। अभाव को पूरा किया जा सके। ध्यान रखना चाहिए कि लेखन में नियम अभिव्यक्त होता है। उत्कृष्ट लेखन नियमों का बेहतर अनुकरण है।

स्पष्ट है कि आत्मकथा विधा में जिस 'सेल्फ' का उदघाटन अब तक हुआ है वह इसी नियंत्रण, नियमन, अभावपूर्ति, असुरक्षाबोध से मुक्ति का, पूर्वग्रह से युक्त उपलब्धियों से भरा वर्चस्वशाली 'सेल्फ' है। इसलिए इसमें महान लोगों की कथाएं हैं , जीवनवृत्त हैं। ऐसा नहीं है कि स्त्रियों ने अब लिखना सीखा है या स्त्रियों का आत्मकथात्मक लेखन अब आया है। लेकिन आत्मकथा के लिए 'सेल्फ' के उद्धाटन की अनिवार्य शर्त ने और इस 'सेल्फ' की विशिष्ट संरचना ने आधुनिक युग के पहले आत्मकथा लेखन को संभव नहीं होने दिया। आधुनिक युग के पहले स्त्रियों द्वारा लिखी गई आत्मकथात्मक कविताएं, गीत और अभिव्यक्ति के अन्य रूपों को आत्मकथा का दर्जा नहीं दिया गया।
 आत्मकथा के साथ गद्य की अनिवार्य शर्त्त लगा दी गई। ध्यान रहे गद्य केवल लेखन की शैली है। लेकिन पद्य की अपेक्षा गद्य में 'सेल्फ' को ज्यादा स्पष्टता , दृढ़ता और सारे संदर्भों के साथ पेश किया जा सकता है। स्व की अभिव्यक्ति के प्रचलित दार्शनिक आधारों के लिए गद्य की शैली ज्यादा मुफ़ीद है। भाषा के जरिए स्व को हासिल करने की कोशिश जीवन को पुन: नामित करने, सत्यापित करने और प्यार करने की प्रक्रिया है।

स्त्री आत्मकथाओं में स्व को दार्शनिक तौर पर हासिल करने के बजाए जीवन को फिर से पाने और प्यार करने की कोशिश है। पुरूष स्व के लिए किसी भी शब्द का प्रयोग तब तक खतरे से खाली नहीं है जब तक कि वह इसके अर्थ को मातहतीकरण और गुलामी के लिए सुरक्षित न कर ले। वह शब्द के अर्थ को खुला नहीं छोड़ सकता जबकि स्त्री के लिए शब्दों की दुनिया अर्थ की निर्माण प्रक्रिया के लिहाज से एक खुली दुनिया है। उसने शब्दों के अर्थ अपने हिसाब से स्थिर नहीं किए हैं। उसे शब्दों के अर्थ को अपने लिए खोजना है। शब्द का संसार उसके लिए भीतर और बाहर की दुनिया में तालमेल बैठाने का नाम है। स्व के रूप में या विषय के रूप में (सब्जेक्ट) अपने को रख कर देखना स्व या विषय के प्रचलित अर्थ में रखकर देखना नहीं है बल्कि जीवन से अपने संबंधों की पुनर्व्याख्या है। अपने को पुन: प्राप्त करना है। जीवन को प्यार करना है।
 स्त्री का स्व मैं, हम और वे में संतरित होता रहता है। स्त्री के आत्मकथात्मक लेखन में स्त्री के कई 'मैं' होते हैं। वह आसानी से इनके भीतर आती-जाती रहती है। मैं, हम, वे की भूमिकाओं में संतरण के कारण स्त्री के लेखन में एक तरह का बिखराव दिखाई देता है। उदाहरण के लिए प्रभा खेतान की आत्मकथा 'अन्या से अनन्या तक' में इसे देख सकते हैं। इस बिखराव के करण पाठक जिस उद्देश्य से स्त्रीआत्मकथा में दाखिल होता है वह खण्डित होता है। कई बार स्त्री कहानी के परिणाम को देखकर निराश होता है। कई बार स्त्री का अनकहा, चुप्पी उसके लिए परेशानी और खीझ पैदा करते हैं। स्त्री आत्मकथा पढ़ते समय सहृदय होने के साथ-साथ दृष्टिसंपन्नता की भी जरूरत होती है। कारण स्त्री आत्मकथा में यह जानना महत्वपूर्ण नहीं हो सकता कि मैं के रूप में स्त्री अपने को कितना अभिव्यक्त कर पाई है बल्कि यह जानना जरूरी है कि स्त्री का 'मैं' क्या बन सकता था ? प्रस्तुति पर नहीं संभावना पर विचार करना होगा। यह भी नहीं भूलना होगा कि यह स्त्री है जिसने अपने बारे में लिखा है।
 
प्रसिद्व मनोशास्त्री लाकां जिस तरह से 'सेल्फ' के विकास की बात करता है उसमें 'प्यार का अभाव' महत्वपूर्ण सिद्वान्त है।लाकां के अनुसार बच्चे का स्व सुरक्षित परिवेश और प्यार की तलाश में विकसित होता है। पर स्त्री के लिए स्व के विकास के अर्थ को समझने की कोशिश करें तो 'प्यार का अभाव' नहीं बल्कि ‘प्यार का भाव’ एक जरूरी भाव है।

    स्त्री का स्व प्यार के भाव के साथ विकसित होता है घृणा के भाव के साथ नहीं। स्त्री आत्मकथाओं में इसे देखा जा सकता है। स्त्री का अपनी माँ के साथ एक द्वन्द्वात्मक संबंध होता है। वह माँ को पसंद-नापसंद एक साथ करती है। पर नापसंदगी की जगहों को समझने की जरूरत है। बड़ी होती हुई लड़की माँ से नफरत नहीं करती जैसाकि लाकां कहता है। बल्कि वह माँ को प्यार करती है, माँ के प्यार के भाव को अपने लिए पसंद करती है। माँ के प्यार का केन्द्र होना चाहती है। लेकिन माँ जहाँ प्रतिबंधात्मक पितृसत्तात्मक रवैये का प्रदर्शन अपने और बेटी के सबंधों में करना चाहती है वहाँ तनाव होता है। माँ की अधूरी इच्छाओं, लड़की के जरिए संसार में अपनी पहचान हासिल करने की कोशिश आदि के मनोवैज्ञानिक सिद्वान्तों का आधार जितना मनोवैज्ञानिक है उससे कहीं ज्यादा सामाजिक-सांस्कृतिक हैं।

Sunday, March 7, 2010

जायज मांग है महिला आरक्षण में आरक्षण

        स्त्री आरक्षण का मुद्दा समाज में स्त्री की अलग पहचान का मुद्दा है। स्त्री के साथ समाज का विषम संबंध ,उसका शोषण और दमन ,राजनीतिक सामाजिक पिछड़ापन आदि तर्कों के पीछे सर्वोपरि तर्क है स्त्री की भिन्नता का तर्क। स्त्री की जैविक ,ऐच्छिक और सामाजिक-राजनैतिक जरुरतें बिल्कुल वही नहीं हैं जो मुख्यधारा की जरुरतें हैं और जिनके तहत समग्र रुप से स्त्री को घटाया जाता है। भिन्नता के इस सवाल को तब अहमियत मिली जब स्त्री की जैविक भिन्नता को विशिष्ट तौर पर उठाया गया।

   लैंगिक विभाजन सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं में बहुत पहले से था लेकिन यूरोप में विभिन्न आंदोलनों के जरिए स्त्रीवादियों ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया। जो लोग आरक्षण के अंदर आरक्षण मांग रहे हैं वे (सपा,बसपा राजेडी आदि) सभी भिन्नता के नजरिए से बुनियादी तौर पर सही हैं। यह समझना चाहिए कि स्त्री के संदर्भ में व्यापक सवाल सार्वजनीन हैं। लेकिन स्त्री के समस्त सवाल सवाल और समस्याएं सार्वजनीन नहीं हो सकतीं।
     जाति और धर्म भारतीय समाज की सांगठनिक विशेषता रही है। भारत में भिन्नता का मूलाधार है जाति और धर्म । यह कारक आरक्षण पर भी लागू होता है।स्त्री को जाति और धर्म से परे महज जेण्डर के रुप में देखना यूरोप की भोंडी नकल है,इसका भारतीय स्त्री के यथार्थ से बहुत कम संबंध है। उल्लेखनीय है संवैधानिक समानता प्राप्त होने के बावजूद मुसलमानों की 60 साल में दुर्दशा कम नहीं हुई, इससे महिला आरक्षण के प्रसंग में सबक लेने की जरुरत है। दूसरी बात यह है कि ओबीसी,अति पिछड़े,गरीब मुसलमान आदि को हमने नौकरीवगैरह में आरक्षण देने की बात मान ली है ऐसे में इन तबकों की औरतों को राजनीतिक आरक्षण की कैटेगरी के बाहर रखना अवैज्ञानिक है।   

   स्त्री अगर राजनीति के व्यापक फ्रेमवर्क में ऑपरेट करेगी तो उसे राजनीतिक तर्कों से ही ऑपरेट करना होगा। यह सच है कि नवजागरण के बाद का स्त्री लेखन जाति और धर्म के फ्रेमवर्क के बाहर का लेखन है। लेकिन आज के संदर्भ में स्त्री से जुड़े किसी भी मसले पर बात करने के लिए भिन्नता के परिप्रेक्ष्य की अनदेखी नहीं की जा सकती। यह भिन्नता सबसे पहले दर्शन के क्षेत्र में अभिव्यक्त हुई।
     जो राजनीतिक दल ( कांग्रेस,भाजपा,वाम वगैरह) स्त्री को एक जैसी मानकर चल रहे हैं वे बुनियादी तौर पर गलत सोच रहे हैं, स्त्री एक जैसी नहीं होतीं, उसमें विभिन्न किस्म की भिन्नता होती है, यह भिन्नता तब ही समझ में आएगी जब इसे दार्शनिक धरातल पर विवेचित किया जाए। इसके अलावा हमें स्त्रीवाद की सटीक अवधारणात्मक समझ और स्त्री आंदोलन की ऐतिहासिक प्रक्रिया को भी ध्यान में रखना होगा।
     स्त्रीवाद की अनेक अवधारणात्मक परिभाषाएं मिलती हैं। इनमें सबसे सुसंगत परिभाषा पाम मोरिस ने दी है। मोरिस के अनुसार (1) स्त्री और पुरू के बीच लिंगभेद का बुनियादी आधार है संरचनात्मक असमानता। इसके कारण स्त्री को नियोजित सामाजिक अन्याय का सामना करना पड़ता है। (2) दो लिंगों के बीच की असमानता बायोलॉजिकल जरूरत का परिणाम नहीं है, बल्कि यह लिंगभेद की सांस्कृतिक निर्मिति है। इस नजरिए से देखें तो स्त्रीवाद के सामने दोहरी चुनौतियां दिखाई देंगी। लिंग की पहचान को किस तरह के सामाजिक और मानसिक ताने-बाने के तहत निर्मित किया जाता है, प्रसारित किया जाता है उसे समझा जाए और उसे बदला कैसे जाए इस पर विचार किया जाए
     स्त्रीवादी समझ 'पुरू' और ' स्त्री ' की स्पष्ट परिभाषा के साथ आरंभ होती है। इसी में उसकी बायोलॉजिकल कटेगरी को समाहित कर दिया जाता है। यही वजह है कि औरत लंबे समय से बायोलॉजिकल सारतत्ववाद (एसेंसलिज्म) के तौर पर व्याख्यायित होती रही है। इसी के कारण यह विश्वास भी जम गया है कि औरत की बच्चा पैदा करने में अपरिहार्य भूमिका है। निष्कर्ष यह कि जो स्वाभाविक और अनिवार्य है उसे बदला नहीं जा सकता। क्योंकि उसी से चरित्र गठन होता है। यही बुनियादी समझ है जिसके आधार पर हजारों वर्षों से विभिन्न समाजों और देशों में औरत के समर्पणकारी और मातहत रूप की व्याख्या होती रही है। उसकी संस्कृति-दर-संस्कृति परिभाषा बदलती रही है।
         स्त्रीवाद की धारणा के विकास का महिला आन्दोलन के विकास,स्वरूप और परिप्रेक्ष्य से गहरा संबंध है। यही वजह है कि स्त्रीवाद की परिभाषा का दायरा और केन्द्रीय विय भी विभिन्न देशों में बदलता रहा है। अमेरिकी स्त्रीवादी इतिहासकार, रोजलिन बेक्सनवेल और लिण्डा गॉर्डन ने अनेक खण्डों में तैयार की गई अपनी पुस्तक में अमेरिकी स्त्रीवाद के इतिहास के बहुरंगी आयामों को समेटने की कोशिश की है। इसके बहाने महिला आन्दोलन के वैविध्य को रूपायित किया है। साथ ही उसमें आए विचलनों को भी रेखांकित किया है। जबकि ब्रिटि संकलन में मिशेल बरेट और एन्नी फिलिप्स ने ' डिस्टेबलाइजिंग थ्योरी : कंटेम्प्रेरी फेमिनिस्ट डिबेट' (1992) पुस्तक में सत्तर और नब्बे के दक में स्त्रीवादी सैध्दान्तिकी में आए अंतरालों की चर्चा की है।    
         विगत तीन दकों में पश्चिमी स्त्रीवाद में नाटकीय परिवर्तन आए हैं। पहले साझा अनुमानों और विवादरहित रूढियों के खिलाफत को स्त्रीवादी विचारकों और महिला आंदोलन ने तवज्जह दी। किन्तु सत्तर के क में स्त्रीवाद ने 'छद्म निश्चितता' को निशाना बनाया और स्त्री शोषण के संरचनात्मक कारणों की खोज पर ध्यान केन्द्रित किया। नब्बे के दक में स्त्रीवाद ने स्त्री शोषण के सीधे-सादे सामाजिक और भौतिक कारणों की व्याख्या का काम छोड़कर ज्यादा जटिल सवालों पर अपने को केन्द्रित किया सामाजिक हायरार्की ,सामाजिक वैम्य और खासकर लिंगभेद के सवाल पर केन्द्रित किया। इसी क्रम में 'बायनरी अपोजी' के सवालों पर भी गौर किया। साथ ही स्त्री के रीर का नए सिरे से मूल्यांकन किया।
       नवजागरण ने शक्तिसम्पन्न (काली, दुर्गा आदि) और आत्मसजग स्त्री की धारणा निर्मित की। यह ऐसी स्त्री थी जो तर्क और विवेकवाद में विश्वास करती थी। सामाजिक और राजनीतिक प्रगति में विश्वास करती थी। यही समाजसुधार के महाप्रकल्प की संभावना थी। इस समझ के आधार पर अमूर्त्त स्त्री सैध्दान्तिकी का जन्म हुआ।
        सत्तर के दक में स्त्रीवाद ,महासैध्दान्तिकी से स्थानीय समस्याओं के अध्ययन की ओर मुखातिब हुआ। पितृसत्ता के अन्तरसांस्कृतिक विश्लेषण से सेक्स, नस्ल और वर्ग के ज्यादा जटिल ऐतिहासिक कारणों की खोज की ओर मुखातिब हुआ। स्त्री की अस्मिता अथवा स्त्री हितों पर विचार करने की बजाय स्त्री अस्मिता की अस्थिरता, स्त्री की जरूरतों के बारे में सचेत प्रयासों और सरोकारों की ओर मुखातिब हुआ।
      इसी तरह  उत्तर आधुनिकतावादी 'स्त्रीवाद और ' आधुनिकतावादी' स्त्रीवाद के बीच में बुनियादी फ़र्क आधुनिकता की धारणा को लेकर है। इस दौर में 'नए' के प्रति उत्साह और पुराने के प्रति त्याग की भावना प्रबल थी। जबकि उत्तर संरचनावादी इस बात पर जोर दे रहे थे कि आलोचनात्मक रिवाजों के बारे में कोई समग्र नजरिया नहीं बनाया जा सकता। इसी क्रम में ' सब्जेक्टिविटी' ,' आइडेण्टिटी, 'एजेन्सी' आदि के सवालों पर विचार किया गया। इसके अलावा सामाजिक संरचनाओं, रिवाजों और संस्कारों के साथ संबंधों के सवालों पर भी विचार किया गया। पहले इन सवालों की राजनीतिक-आर्थिक पुनर्निर्माण, सामाजिक रूपान्तरण और स्त्री कल्याण के कार्यों के नाम पर उपेक्षा की गई थी

     इसी दौर में महिलाओं ने प्रजनन के अधिकारों, शिक्षा और प्रशिक्षण, औरतों को पुरुषों की तुलना में कम वेतन , कार्य क्षेत्र में औरतों के साथ भेदभाव, छेडखानी, घरेलू हिंसा और कामुक शोष, विश्वव्यापी सैन्यीकरण, नस्लवाद, साम्राज्यवाद की विरासत के खिलाफ संघर्ष के साथ तीसरी दुनिया के देशों में विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य के सवाल भी उठाए। 
         भारत में सत्तर के बाद तेजी से स्त्री आंदोलन का असमान विकास हआ है। स्त्री उत्पीड़न, छेड़खानी, दहेजप्रथा, बालविवाह, स्त्री-भ्रूणहत्या, कार्यक्षेत्र में महिलाओं के साथ भेदभाव और वैम्य, राजनीतिक और सांस्कृतिक भेदभाव के सवालों के साथ स्त्री अस्मिता, प्रेम, पितृसत्ता, महिला के वस्तुकरण आदि के सवालों के साथ साम्प्रदायिक और आतंकवाद की शिकार महिलाओं की समस्याएं भी तेजी से विमर्श के केन्द्र में आई हैं। इसके अलावा विस्थापन, मजदूरी, खेतमजदूर औरत, वेश्याओं और उनके बच्चों के भरण-पोण और विकास के सवाल भी उठे हैं। ये सारे सवाल हैं जिन्हें किसी न किसी रूप में स्त्रीवादी विचारकों ,महिला और स्वैच्छिक संगठनों ने उठाया है। इस समग्र प्रक्रिया के गर्भ से ही महिला अस्मिता बनी और महिला आरक्षण के सवाल खड़े हुए हैं। महिला किसी राजनीतिक दल की धरोहर नहीं है बल्कि वह समाज की देन है और उसकी सत्ता और अस्मिता स्त्री  प्रक्रिया की देन है।