Thursday, October 21, 2010

क्या औरत को माँ बनने के लिए प्रोत्साहन की ज़रूरत है ?

      यूरोपीय समुदाय स्त्रियों के लिए मातृत्व के अवकाश को बढ़ाने पर विचार कर रहा है। यूरोप में अभी चौदह हफ्ते का मातृत्व अवकाश स्त्रियों को मिला हुआ है। इसे बढ़ाकर इक्कीस हफ्ते करने पर यूरोपीय संसद विचार कर रही है। क्या इसे स्त्री आंदोलनों की सफलता माना जाए ? या फिर स्त्री आंदोलनों के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि ? अभी इस प्रस्ताव पर विचार चल रहा है , इसके पक्ष विपक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं। इस विषय में कुछ भी कहने के पहले मैं कह दूँ कि व्यक्तिगत तौर पर मैं इस प्रस्ताव के पक्ष में हूँ और कोई भी स्त्री जिसके अंदर स्त्री की चेतना है वह इसके पक्ष में होगी।
इस प्रस्ताव के लाने के पक्ष विपक्ष दोनों में तर्क दिए जा रहे हैं। जो पक्ष में हैं और जो इसका समर्थन कर रहे हैं उनका तर्क है कि स्त्रियों के लिए मातृत्व अवकाश बढ़ाने पर स्त्रियाँ गर्भाधान के लिए आकर्षित होंगी। उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा। आज स्त्रियाँ बाहर काम कर रही हैं और उन्हें बाहर के काम से गर्भाधान के समय अगर अवकाश मिलेगा तो वे प्रोत्साहित होंगी। यह समाज के लिए अच्छा होगा, देश के लिए अच्छा होगा, देश की जनसंख्या संतुलन के लिए अच्छा होगा। सभी स्त्रीवादी विचारों वाली महिलाएं इसके पक्ष में होंगी।
जाहिर है कि इस प्रस्ताव का यह पक्ष बड़ा मज़बूत है कि स्त्रियों को मातृत्व अवकाश के अंदर ज्यादा से ज्यादा समय मिले। बच्चा जनने के क्रम में स्त्री के स्वास्थ्य और शरीर की जो हानि होती है, उसकी रिकवरी के लिए उसे पर्याप्त समय मिलना ही चाहिए। बल्कि न केवल बच्चा जनने , उसके पालन-पोषण में भी औरत की केन्द्रीय भूमिका होती है। यह कहना सच के ज्यादा क़रीब होगा कि बच्चा पालना औरत की केन्द्रीय जिम्मेदारी समझी जाती है।
सवाल है कि यह स्थिति क्यों आई कि स्त्री को आज बच्चा पैदा करने के लिए किसी प्रोत्साहन की जरुरत आन पड़ी ? और यह डर समाज में घर करने लगा कि भौगोलिक संतुलन गड़बड़ हो सकता है! जबकि हालत यह रही है कि सभी समाजों में स्त्री को बच्चा पैदा करने की मशीन समझा गया है। औरत की सार्थकता ही इस बात में मानी गई है कि वह संतान को जन्म दे। उसकी उर्वरता की तुलना धरती से की गई है। जो या तो फसल पैदा करती है या बांझ होती है। बीच की कोई स्थिति नहीं होती। धरती की तरह ही औरत की भी स्वतंत्र रूप से कोई सामाजिक भूमिका नहीं देखी गई। उसकी कोख , उसकी प्रजनन क्षमता , मासिक धर्म ये सब पुरुष के लिए रहस्यमय संसार थे। इससे भी ज्यादा रहस्यमय था औरत की कोख की अनिश्चतता। मर्द के लिए आज भी यह जानना आसान नहीं है कि औरत की कोख में उसी का बच्चा है या नहीं। हालांकि आज विज्ञान के पास इसका उत्तर है। विज्ञान के पुंसवादी ओरिएन्टेशन की तरक्की से अब ये तो जाना जा सकता है कि औरत की कोख का बीज किस मर्द का है। पर ये सब इतना सहज सुलभ और वैध नहीं है। दूसरी चीज कि ऐसी कोई भी स्थिति औरत मर्द के बीच अविश्वास, असामान्य स्थितियों और असभ्यता का ही पता देती है। (यह दीगर बात है कि इस तरह के कई सामाजिक असभ्यताओं की शिकार औरत सदियों से रही है और समाज ने इसे सामान्य स्थिति  के तौर पर ही लिया है!)
ज्यादातर मर्दों के लिए आज भी औरत की कोख रहस्य भरी है। यह किसी तिलिस्म से कम नहीं! चूँकि हमारे समाज का ढ़ाँचा पुंसवादी है अत: मर्दों के लिए यह एक जनाना कार्यव्यापार ही रहा है। वह इसमें शामिल नहीं होता , दूर से देखता है। उसकी भूमिका तमाशबीन की होती है। चूँकि सारे परिवर्तन स्त्री के शरीर में घट रहे होते हैं, ये सब उसकी दिनचर्या , शरीर और मन की संरचनाओं में भी भारी परिवर्तन पैदा करते हैं। वह , वह नहीं होती जो गर्भाधान के पहले थी। ये सारे बदलाव स्त्री को बांधते हैं , वह अपनी स्वतंत्रता खोती है , स्त्री को सिखाया जाता है कि मर्द को बांधे रखने के लिए उसमें आवश्यक लावण्य होना चाहिए , मर्द भी स्त्री से ऐसी अपेक्षा रखते हैं; स्त्री वह भी ‘खोती’ है। इस प्रक्रिया में किसी भी महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका से वंचित स्त्री अपना आत्मविश्वास खोती है जिसके कारण वह आगे चलकर कई तरह की हीन ग्रंथियों का शिकार भी होती है। हालांकि यह भी उतना ही बड़ा सच है कि हममें से ज्यादातर स्त्रियों के मन में बचपन से ही मातृत्व को भविष्य की एक सुखमय इच्छा और स्त्री-जीवन की सार्थकता के रूप में पोषा जाता है। खाद-पानी दिया जाता है। हममें से अधिकांश स्त्रयों की मांए हमें यह नहीं बतातीं कि मातृत्व एक कष्टकर अनुभव भी है। कि इसमें हमारी जान का ख़तरा भी शामिल है। हमें विज्ञान की उपलब्धियों के बारे में बताया जाता है, डॉक्टरों की दक्षता के बारे में बताया जाता है , इसमें शामिल सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, भावात्मक जोखिम के बारे में प्राय: बात नहीं की जाती। माँ तो माँ , एक सहेली भी दूसरी सहेली को यह नहीं बताती कि बच्चा पैदा करना स्त्री के लिए केवल एक सुखद अनुभव नहीं है। इसका एक नकारात्मक अर्थ भी है। बल्कि कोशिश यह होती है कि स्त्री के किसी भी कारण से बच्चा न होने को एक अभावमूलक संदर्भ दिया जाए।
इन सब के बावजूद यदि आज यह स्थिति यूरोपीय समाजों में आ गई है कि औरत को बच्चा पैदा करने के लिए प्रोत्साहन दिए जाने की बात की जा रही है तो यह विचारणीय मसला है। इसे सामान्य सरकारी नीति कहकर टालना ग़लत होगा। इसमें मोटे तौर पर जनसंख्या वृध्दि की वर्चस्वशाली सामाजिक मानसिकता की अभिव्यिक्ति तो है ही लेकिन उससे गंभीर बात है स्त्रियों में ,तमाम स्वीकृतिमूलक और महिमामंडन करनेवाली सामाजिक संरचनाओं की मौजूदगी के बावजूद, इस भूमिका के प्रति उपेक्षा। ध्यान रखनेवाली बात है कि पितृसत्तात्मक सेटअप केवल विवाह व्यवस्था के भीतर मातृत्व का महिमामंडन करता है। अविवाहित मातृत्व उसके लिए कुफ्र है।
स्त्रियों का माँ बनकर सामाजिक भूमिका के प्रति उपेक्षा भाव का एक बड़ा कारण अपनी तमाम आलोचनामूलक भूमिकाओं के बावजूद पूंजीवाद ने पैदा किया है। स्त्री की आर्थिक स्व निर्भरता ने उसके लिए नई ज़मीन तैयार की है। वह अपनी पहचान के अन्य आधारों को बच्चे पैदा करने के अलावा भी पैदा कर सकती है। यह बड़ा फ़र्क है जो आज की औरत के लिए आम है। दूसरी चीज कि यह सच है कि बच्चे आज भी केवल औरत ही पैदा कर सकती है ( आगे कौन जाने कि मजबूरी में सही इस मामले में औरतों के विकल्प पर न सोचा जाएगा !) लेकिन ऐसा करने की प्रक्रिया में वह अकेली और असुरक्षित हो जाए तो वह यह नहीं चाहेगी। आज की समाजव्यवस्था में बच्चा स्त्री के लिए पूरा प्रोजेक्ट है। न्यूक्लियर समाजों में इसका निर्वाह वह अकेले करने में असमर्थ है। इसमें पति-पत्नी और समाज तीनों की जवाबदेहियाँ सुनिश्चत की जानी चाहिए। माँ बनने वाली स्त्री के लिए समाज में और काम की जगहों पर विशेष इन्सेंटिव दिया जाना चाहिए ताकि इसमें लगनेवाले समय के कारण वह अपने को दक्षता या कौशल में पिछड़ा हुआ न महसूस करे।     
बात एक अच्छे प्रस्ताव और सदिच्छा भर की है तो इस पर किसी भी तरह की बहस से कोई फर्क नहीं पड़नेवाला। प्रसंगवश जिक्र कर दूँ कि भारत में नौकरियों में स्त्री को मातृत्व अवकाश मिला हुआ है। उच्च शिक्षा संस्थानों में नौकरी के नियमों के नए निर्देशों के अनुसार स्त्री को दो वर्ष के मातृत्व अवकाश का प्रावधान है साथ ही पैतृक अवकाश की भी बात की गई है। यह नियम सन् 2006 से अमल में आया है। पर इसके व्यवहारिक पक्ष पर गौर करें तो चौंकानेवाले तथ्य सामने आएंगे। कई कॉलेजों में यह देखा गया है कि छुट्टी मांगी गई है, मातृत्व की अपेक्षा करनेवाली महिलाएं घर बैठ गईं हैं पर बाद में उन्हें छुट्टी एडजस्ट कराने में दिक्कतें पेश आईं हैं।
मेरा मानना है कि सदिच्छा, प्रस्ताव या किसी भी संवैधानिक स्थिति को अमली जामा पहनाने के लिए, उसके लागू किए जाने और मनवाने पर जोर दिया जाना चाहिए। इसके लिए एक मज़बूत तंत्र की जरुरत है। चाहे किसी भी देश या समाज की बात क्यों न हो स्त्री का मसला ऐसा नहीं है कि इसे केवल संवैधानिक जामा पहनाकर अमल के जनता और संस्थानों की इच्छा के हवाले कर दिया जाए। इच्छा से तो लोग ‘लेडीज़’ लिखे रहने बावजूद बसों में घन्टे-आध घन्टे के सफर में सीट तक नहीं छोड़ते फिर स्त्री के अधिकारों का सम्मान करना तो दीगर बात है।    

1 comment:

निर्मला कपिला said...

केवल कानून के बल पर ही किसी मसले मे सुधार नही हो सकता। जब पुरुष भी इस मामले मे स्त्री पक्ष को अपने मन से समानता का अधिकार नही देता,घर के प्रति दोनो की जिम्मेदारी बराबर नही होती तब तकौरत के लिये मुश्किलें आती ही रहेंगी। अच्छा लगा आलेख। शुभकामनायें\