Sunday, March 28, 2010

माध्यम और सामाजिक सरोकार - पीटर गोल्डिंग


      तकनीकी क्षेत्र में तेजी से आ रहे परिवर्तनों ने परंपरित जीवनशैली पर इनके प्रभावों को लेकर काफी आलोचना और आशंका पैदा की। कोई आश्चर्य नहीं कि सर्वाधिक नए माध्यम को भी उसी भर्त्सनामूलक आलोचना के नजरिए से देखा गया। टेलीविजन के एक आरंभिक आलोचक ने अपना अनुभव इन शब्दों में लिखा है-
    ''आणविक बमों के बुखार से पीड़ित इस दुनिया में जो बहुत भयावह ढंग से शांति और युध्द के बीच संतुलन बनाए हुए है, एक नया ख़तरा पैदा हुआ है , टेलीविजन का ख़तरा-अणु के जेकिल और हाईड, एक ऐसी ताकत जो संस्कृति और मनोरंजन के क्षेत्र में क्रांति पैदा कर दे, जो एक ही साथ विनाश का दानव भी है और उसका निषेधक भी।''
      माध्यम के इस तकनीकी पक्ष के प्रति जागरुकता और भी ज्यादा गहराई से प्रसारण के साथ जुड़ी हुई है। यद्यपि तकनीक नएपन के प्रति लगाव सिनेमा के आरंभिक इतिहास का महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। शायद इसकी जड़ें और भी गहरी हैं, उदाहरण के लिए, औेद्योगीकरण के विरूध्द लोकप्रिय विद्रोहों के रूप में। नई तकनीक ने कार्य और अवकाश दोनों में बदलाव किया है लेकिन दोनों के बीच का संबंध बहुत महत्वपूर्ण है कम से कम दोनों में से किसी भी क्षेत्र में किसी भी प्रकार के वैज्ञानिक अन्वेषण के प्रभाव के संबंध में तो हैं ही।

सरोकार का दूसरा क्षेत्र जनमाध्यमों की विचारों और विश्वासों को प्रभावित करने और व्यवहार को अपनी तरफ मोड़ने की संभावित क्षमता है। जनसंचार का कर्नेल मॉडल जिसमें कुछ लोग बहुसंख्यक को असीम शक्ति और दण्डमुक्ति के भाव से भरकर संबोधित करते हैं, ने इस तरह के शोधों को जन्म दिया है जिसमें फुसलानेवाले संचार के खतरे और प्रभावों पर जोर है। केन्द्रीय समस्या के रूप में प्रोपैगैण्डा और विज्ञापन को रखा गया। युद्ध के दौरान के अधिकतर शोध आक्रामक प्रोपैगैण्डा के प्रभावों की खोज और इससे लड़ने के बेहतर तरीकों के अन्वेषण में लगे हुए थे। इस तरह के शोधों ने विशेष तौर पर अमेरिका में, बाद के कामों पर दूरगामी प्रभाव डाला जबकि इस देश में भगवान 'हॉ-हॉ' की लोकस्मृतियों और माहौल में व्यापत 'जरूरत के समय में दोस्त' बनाने के चलन ने जिसे बी बी सी ने अपने युद्धकालीन प्रसारणों की नीति बना रखी थी , ने बहुत आगे चलकर प्रसारण के प्रभाव और खतरों की व्याख्या करनेवाले विमर्शों के ढर्रे को बदला।

इसी तरह से विज्ञापन उद्योग के विकास और इसके द्वारा माध्यमों के प्रयोग ने लोकप्रिय रवैय्ये में संभावित परिवर्तन को लेकर एक तनाव की स्थिति पैदा की। इनमें छद्म जरूरतों का निर्माण और भौतिकवाद, धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा और आम जनता के बड़े हिस्से में तुलनात्मक रूप से वंचित होने का बोध शामिल था। डेनीस थॉम्सन जो इस दृष्टिकोण के आरंभिक व्याख्याकार थे और जिन्होंने हाल के वर्षों में इसे बिना किसी घालमेल के फिर जोर देकर दोहराया-''विज्ञापन उपभोक्ताओं की समनुरूप संख्या के बारे में आश्वस्त करता है। ऐसा वह प्रेस और टी वी के ऊपर नियंत्रण के जरिए करता है। इसकी आचार संहिता बहुत जोरदार ढंग से संचार के समूचे तंत्र को आवृत्त करती है। यथास्थिति के सिध्दान्त के अनुकूल इसका लक्ष्य हमारे जीवन को नियंत्रित करना और हमें उपभोक्ता दौड़मशीन (कंज्युमर ट्रेडमिल) पर लगाए रखना है।''
     इस तरह की भावनाओं ने विज्ञापन ,उसकी आचार संहिता, उसकी कृत्रिमता पर किए जा रहे हमले को सीमित कर दिया। बजाए इसके कि माध्यमों में इसके बढ़ते प्रभाव को कम करके दिखाए। जहाँ तक प्रोपैगैण्डा का सवाल है इसके शोधों का उद्देश्य हमले का निशाना बन सकनेवाले 'खलनायकों' पर से ध्यान हटाकर 'पीड़ित' पर ध्यान केन्द्रित करना है।
     सांस्कृतिक आलोचना की लंबी परंपरा से निकलकर एक तीसरा बृहत्तर सरोकार उभरता है जिसका संबंध मैथ्यू अर्नाल्ड, टी एस इलियट और एफ आर लेविस के लेखन से जुड़ता है , जिनका भय यह था कि सांस्कृतिक मिलावट निश्चित रूप से स्तरहीनता को जन्म देगा, अवकाश के बढ़े अवसर तुच्छ जन मनोरंजन के द्वारा बर्बाद किए जा रहे हैं और अंग्रेजी संस्कृति के जरिए इन्हें रोका जा सकता था लेकिन नए माध्यम के द्वारा न केवल इनकी उपेक्षा की जा रही है बल्कि इनके लिए ख़तरा भी पैदा किया जा रहा है। शोध कार्यों का एक बड़ा हिस्सा इन प्रवृत्तियों से लड़ने के तरीके खोजने में लगा है जो इस बात की तसदीक करता है कि ये प्रवृत्तियाँ मौजूद रही हैं।

विश्वास की एक और बेचैन प्रक्रिया है जो माध्यमों के प्रभाव को लेकर सशंकित है। वैकल्पिक अवकाश के साधनों के अभाव में माध्यमों के समक्ष अधिकतम अरक्षण (एक्सपोजर) के कारण अथवा अज्ञानता या अपरिपक्वता के कारण या अस्वाभाविक असुरक्षा की वजह से इन समूहों को विशेष तौर पर संरक्षा की जरूरत है। बच्चे और कामगार वर्ग दोनों समूह इस भूमिका में आन्तरायिक भाव से अनुकूल बैठते हैं।
     बच्चों के लिए सरोकारों की झलक अमेरिका के फ्रेडरिक वर्थैम्स की महत्वपूर्ण शोध कृति 'द सेडक्शन ऑफ द इनोसेन्ट' में विस्तार क साथ दिखाई देती है। इन सरोकारों में नया कुछ नहीं है। जॉन टाबियस ने 19 वीं शती में बाल अपराधों के बारे में लिखते हुए कहा कि '' जैक शिफर्ड, डिक टर्पिन और अन्य अपराध नायकों का लोकप्रिय कल्पना पर प्रभाव ऐसा था कि वे लगभग 19 वीं शती तक अनुश्रुति का हिस्सा बन चुके थे। समसामयिकों ने पाया कि उनके नाम और दुस्साहसिक कारनामे अधिकतर बच्चों को मालूम थे जबकि उन्हें इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया का नाम नहीं पता था। ''
     एक जेल का प्रशासक इन छोटे बच्चों के अपराध के बारे में बिना किसी हिचक के कहता है ''ये उनके सिक्के के नंबर हैं जिनकी मैं गिनती करता हूँ, महोदय।''

न केवल बच्चों की गतिविधियों पर जनमाध्यमों के बढ़ते प्रभाव , उनके आपराधिक व्यवहार, स्कूल के काम, उनके अवकाश के समय पर माध्यमों का एकाधिकार आदि की तरफ ध्यान गया बल्कि सामान्यतया उनकी आस्थाओं , सेक्स के प्रति उनका रवैय्या, नैतिकता पर भी चर्चा हुई। 1960 के मध्य में 'राष्ट्रीय दर्शक और श्रोता' नाम से स्थापित संस्था जो अपने उत्साही सचिव मेरी व्हाइटहाउस के आलोचनात्मक दृष्टिकोण से खासा प्रभावित थी, ने हमेशा प्रसारण के बच्चों पर तथाकथित घातक प्रभावों को अपने प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। श्रीमती व्हाइटहाउस ने बारंबार दोहराया कि कैसे टेलीविजन के बच्चों के कामुक व्यवहार पर पड़नेवाले असर के संबंध में उनकी खोज ने उन्हें 'वाला' जैसी संस्था शुरु करने के लिए उत्प्रेरित किया।

इसी तरह की चिंता भोले, कम पढ़े और सुसंस्कृत माध्यम उपभोक्ताओं को लेकर माध्यम के व्यवहार में और बाद के शोधों में दिखाई देती है। लॉर्ड रीथ, बी बी सी का पहला महानिदेशक, माध्यमों को लोकप्रिय शिक्षण और नैतिक उत्थान के औजार के रूप में ,कम से कम कला के क्षेत्र में नहीं देखे जाने का असली व्याख्याकार बन गया। रीथ ने 1924 में लिखा, '' वर्षों से, सड़क का आदमी ऐसे संगीत से संतुष्ट होता रहा है जो आसानी से और तुरंत घुलमिल जाता है और इसीलिए हमेशा बेहतर नहीं होता।'' सेंसरशिप की भूमिका को लेकर तर्क-वितर्क कई बार सांस्कृतिक सुसभ्यता और जनसंचार की दुर्बलता के विपरीत संबंधों पर जोर देते हैं, सेंसरशिप को कीमत के स्तर पर औचित्यपूर्ण ठहराने अथवा बड़े पैमाने पर निष्क्रिय कर दी गई सामग्री के लिए एक सावधान नियंत्रण को बरतने की आवश्यकता के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।

( पुस्तक अंश- पुस्तक का नाम- जनमाध्यम, लेखक पीटर गोल्डिंग,अनुवाद-सुधा सिंह,प्रकाशक, ग्रंथ शिल्पी,बी-7,सरस्वती कामप्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मीनगर,दिल्ली-110092,मूल्य-325रुपये)

1 comment:

Rangnath Singh said...

आपको पुस्तक के लिए बधाई और आभार भी।