Tuesday, March 23, 2010

स्त्री का स्व और आत्मकथा के मानक

              



 'स्व' या 'सेल्फ' पुंसवादी समीक्षा में आत्मकथा लेखन का बुनियादी आधार है वह कहीं होता नहीं है बनाया जाता है। अर्जित किया जाता है। यह स्वाभाविक नहीं है। स्वाभाविक 'स्व' वह है जो अंतर्भुक्त है। भरा-पूरा है। इंसान के होने की अनिवार्य शर्त है। आधुनिक अर्थ में 'स्व' को हासिल करने की कोशिश इस स्वाभाविक स्व से दूर भागने की कोशिश है। यहां तक कि इस स्व की सहज स्वामिनी स्त्री को भी इसके कारण हीनताबोध कराया जाता है। क्योंकि स्त्री के स्व और संसार के बाहरी स्व के बीच बड़ा अंतर होता है। उसके अंतर्भुक्त स्व को स्व की कोटि से ही खारिज कर दिया गया। स्त्री के स्व की अन्यतम विशेषता होती है कि इसमें बहुत स्पेश होता है। अपने से ज्यादा दूसरे के लिए। यह एक किस्म की अंतर्क्रिया है स्वयं , अन्य तथा वास्तविक संसार के बीच।
  स्व का निर्माण अंदर मौजूद सहज स्व की मौत है। स्व के निर्माण के क्रम में बाहरी बाधाएं, रुढ़ियां, प्रतिबंध आदि सब काम करते हैं। इनसे टकराते हुए , संघर्ष करते हुए ही इसका निर्माण संभव है। यह संसार के साथ मैं का अंतर्संघर्ष है।
                                             
 'मैं' के साथ बाहरी समाज की अंतर्क्रियाओं में पहले से मौजूद ज्ञान को आत्मसात् करने का आग्रह होता है। बाहर की दुनिया को आत्मसात् करने के क्रम में बच्चा माँ की भाषा और शरीर से दूर चला जाता है। एक ऐसी भाषा को अर्जित करता है जो सहजात नहीं है। वह शक्ति की, वर्चस्व की और असुरक्षाबोध पर विजय की भाषा है। यह पूर्वग्रह से युक्त भाषा है। हाशिए की भाषा नहीं , प्रभावशाली उपलब्धियों की भाषा है। यह अंदर की मृत्यु और बाहर के अर्जन की भाषा है।
  लेखन में वह शक्ति होती है कि उसके जरिए 'सेल्फ' को हासिल किया जा सके। अभाव को पूरा किया जा सके। ध्यान रखना चाहिए कि लेखन में नियम अभिव्यक्त होता है। उत्कृष्ट लेखन नियमों का बेहतर अनुकरण है।

स्पष्ट है कि आत्मकथा विधा में जिस 'सेल्फ' का उदघाटन अब तक हुआ है वह इसी नियंत्रण, नियमन, अभावपूर्ति, असुरक्षाबोध से मुक्ति का, पूर्वग्रह से युक्त उपलब्धियों से भरा वर्चस्वशाली 'सेल्फ' है। इसलिए इसमें महान लोगों की कथाएं हैं , जीवनवृत्त हैं। ऐसा नहीं है कि स्त्रियों ने अब लिखना सीखा है या स्त्रियों का आत्मकथात्मक लेखन अब आया है। लेकिन आत्मकथा के लिए 'सेल्फ' के उद्धाटन की अनिवार्य शर्त ने और इस 'सेल्फ' की विशिष्ट संरचना ने आधुनिक युग के पहले आत्मकथा लेखन को संभव नहीं होने दिया। आधुनिक युग के पहले स्त्रियों द्वारा लिखी गई आत्मकथात्मक कविताएं, गीत और अभिव्यक्ति के अन्य रूपों को आत्मकथा का दर्जा नहीं दिया गया।
 आत्मकथा के साथ गद्य की अनिवार्य शर्त्त लगा दी गई। ध्यान रहे गद्य केवल लेखन की शैली है। लेकिन पद्य की अपेक्षा गद्य में 'सेल्फ' को ज्यादा स्पष्टता , दृढ़ता और सारे संदर्भों के साथ पेश किया जा सकता है। स्व की अभिव्यक्ति के प्रचलित दार्शनिक आधारों के लिए गद्य की शैली ज्यादा मुफ़ीद है। भाषा के जरिए स्व को हासिल करने की कोशिश जीवन को पुन: नामित करने, सत्यापित करने और प्यार करने की प्रक्रिया है।

स्त्री आत्मकथाओं में स्व को दार्शनिक तौर पर हासिल करने के बजाए जीवन को फिर से पाने और प्यार करने की कोशिश है। पुरूष स्व के लिए किसी भी शब्द का प्रयोग तब तक खतरे से खाली नहीं है जब तक कि वह इसके अर्थ को मातहतीकरण और गुलामी के लिए सुरक्षित न कर ले। वह शब्द के अर्थ को खुला नहीं छोड़ सकता जबकि स्त्री के लिए शब्दों की दुनिया अर्थ की निर्माण प्रक्रिया के लिहाज से एक खुली दुनिया है। उसने शब्दों के अर्थ अपने हिसाब से स्थिर नहीं किए हैं। उसे शब्दों के अर्थ को अपने लिए खोजना है। शब्द का संसार उसके लिए भीतर और बाहर की दुनिया में तालमेल बैठाने का नाम है। स्व के रूप में या विषय के रूप में (सब्जेक्ट) अपने को रख कर देखना स्व या विषय के प्रचलित अर्थ में रखकर देखना नहीं है बल्कि जीवन से अपने संबंधों की पुनर्व्याख्या है। अपने को पुन: प्राप्त करना है। जीवन को प्यार करना है।
 स्त्री का स्व मैं, हम और वे में संतरित होता रहता है। स्त्री के आत्मकथात्मक लेखन में स्त्री के कई 'मैं' होते हैं। वह आसानी से इनके भीतर आती-जाती रहती है। मैं, हम, वे की भूमिकाओं में संतरण के कारण स्त्री के लेखन में एक तरह का बिखराव दिखाई देता है। उदाहरण के लिए प्रभा खेतान की आत्मकथा 'अन्या से अनन्या तक' में इसे देख सकते हैं। इस बिखराव के करण पाठक जिस उद्देश्य से स्त्रीआत्मकथा में दाखिल होता है वह खण्डित होता है। कई बार स्त्री कहानी के परिणाम को देखकर निराश होता है। कई बार स्त्री का अनकहा, चुप्पी उसके लिए परेशानी और खीझ पैदा करते हैं। स्त्री आत्मकथा पढ़ते समय सहृदय होने के साथ-साथ दृष्टिसंपन्नता की भी जरूरत होती है। कारण स्त्री आत्मकथा में यह जानना महत्वपूर्ण नहीं हो सकता कि मैं के रूप में स्त्री अपने को कितना अभिव्यक्त कर पाई है बल्कि यह जानना जरूरी है कि स्त्री का 'मैं' क्या बन सकता था ? प्रस्तुति पर नहीं संभावना पर विचार करना होगा। यह भी नहीं भूलना होगा कि यह स्त्री है जिसने अपने बारे में लिखा है।
 
प्रसिद्व मनोशास्त्री लाकां जिस तरह से 'सेल्फ' के विकास की बात करता है उसमें 'प्यार का अभाव' महत्वपूर्ण सिद्वान्त है।लाकां के अनुसार बच्चे का स्व सुरक्षित परिवेश और प्यार की तलाश में विकसित होता है। पर स्त्री के लिए स्व के विकास के अर्थ को समझने की कोशिश करें तो 'प्यार का अभाव' नहीं बल्कि ‘प्यार का भाव’ एक जरूरी भाव है।

    स्त्री का स्व प्यार के भाव के साथ विकसित होता है घृणा के भाव के साथ नहीं। स्त्री आत्मकथाओं में इसे देखा जा सकता है। स्त्री का अपनी माँ के साथ एक द्वन्द्वात्मक संबंध होता है। वह माँ को पसंद-नापसंद एक साथ करती है। पर नापसंदगी की जगहों को समझने की जरूरत है। बड़ी होती हुई लड़की माँ से नफरत नहीं करती जैसाकि लाकां कहता है। बल्कि वह माँ को प्यार करती है, माँ के प्यार के भाव को अपने लिए पसंद करती है। माँ के प्यार का केन्द्र होना चाहती है। लेकिन माँ जहाँ प्रतिबंधात्मक पितृसत्तात्मक रवैये का प्रदर्शन अपने और बेटी के सबंधों में करना चाहती है वहाँ तनाव होता है। माँ की अधूरी इच्छाओं, लड़की के जरिए संसार में अपनी पहचान हासिल करने की कोशिश आदि के मनोवैज्ञानिक सिद्वान्तों का आधार जितना मनोवैज्ञानिक है उससे कहीं ज्यादा सामाजिक-सांस्कृतिक हैं।

3 comments:

Udan Tashtari said...

अच्छा आलेख!
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हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

अनेक शुभकामनाएँ.

sudha singh said...

जी ,धन्यवाद। प्रयत्न करूँगी आपकी बात रख पाऊँ।

Rangnath Singh said...

विचारोत्तेजक लेख है।