Saturday, September 29, 2012

किसान क्या खाएं- सहजानन्द सरस्वती

हमने देखा है कि किसानों को दिन-रात इस बात की फिक्र रहती है कि मालिक (जमींदार) का हक नहीं दिया गया, दिया जाना चाहिए, साहू-महाजन का पावना पड़ा हुआ है उसे किसी प्रकार चुकाना होगा, चौकीदारी टैक्स बाकी ही है, उसे चुकता करना है, बनिये का बकिऔता अदा करना है आदि-आदि। उन्हें यह भी चिन्ता बनी रहती है कि तीर्थ-व्रत नहीं किया, गंगा स्नान न हो सका, कथा वार्ता न करवा सके, पितरों का श्राद्ध तर्पण पड़ा ही है, साधु-फकीरों को कुछ देना ही होगा, देवताओं और भगवान को पत्र-पुष्प यथाशक्ति समर्पण करना ही पड़ेगा। वे मन्दिर-मस्जिद बनाने और अनेक प्रकार के धर्म दिखाने में भी कुछ न कुछ देना जरूरी समझते हैं। यहाँ तक कि ओझा-सोखा और डीह-डाबर की पूजा में भी उनके पैसे खामख्वाह खर्च हो ही जाते हैं। चूहे, पंछी, पशु, चोर बदमाश और राह चलते लोग भी उनकी कमाई का कुछ न कुछ अंश खा जाते हैं। सो भी प्राय: अच्छी चीजें ही। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बहुत ही हिफाजत से रखने पर भी बिल्ली उनका दूध-दही उड़ा जाती है। कौवों का दाँव भी लग ही जाता है। कीड़े-मकोड़े और घुन भी नहीं चूकते वे भी कुछ लेई जाते हैं। 
सारांश यह कि संसार के सभी अच्छे-बुरे जीव उनकी कमाई की चीजों के हिस्सेदार बनते हैं। किसान भी खुद यही मानते हैं कि उन सबों का भी हक उनकी कमाई में है। 
लेकिन क्या वे कभी यह भी सोचते हैं कि हमें और हमारे बाल-बच्चों को भी खाने का हक है? जरा इस प्रश्न की तह में जाकर देखना चाहिए। यह सही है कि वे और उनके परिवार के लोग खाते-पीते हैं। नहीं तो जिन्दा कैसे रहते। यह भी ठीक है कि किसान बराबर ही जीविका-जीविका चिल्लाते रहते हैं। मैं मानता हूँ कि हर किसान यही कहता है कि क्या करें गुजर-बसर के लिए खेती-बारी कर लेते हैं और दूसरा भी उपाय ढूँढ़ते हैं। वह पेट के ही नाम पर नौकरी चाकरी और दूसरे काम भी करता है। खेती मारी गई या रोटी का और जरिया गया तो बाल-बच्चे मर ही जाएँगे, यह भी सोचता रहता है इससे हमें इनकार नहीं। मगर इन सब बातों से जो निष्कर्ष निकाला जाता है उस पर जरा गौर करना होगा। केवल ऊपरी बातों से असलियत का पता नहीं लगता जब तक डूब के भीतर देखा न जाए। 
यह माना जाता है कि पेट के लिए ही सबकुछ किया जाता है। लेकिन क्या सचमुच यही बात है? यदि हाँ तो फिर किसान अपनी गाय-भैंस का दूध दुह के स्वयं पी क्यों नहीं लेता और बाल-बच्चों को पिला क्यों नहीं देता। उसे रोकता कौन है, यदि पेट के ही लिए सभी काम सचमुच करता है? पीने से जो बचे उसका दही बना के क्यों खा-खिला नहीं डालता? दही के बाद भी बच जाए तो घी निकाल के खाने में क्या रुकावटें हैं? दुहने के बाद फौरन खा-पी जाने में तो खैरियत है। घर जाने पर तो न जाने कौन-कौन से दावेदार खड़े हो जाएँ।
 (सहजानंद सरस्वती की रचना किसान क्या करें से साभार)

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