Saturday, December 8, 2012

उत्तर आधुनिक माध्यम परिदृश्य को कैसे समझें -सुधा सिंह


  यह लेख बजरिए मैतेलार्द उत्तरआधुनिक माध्यम परिदृश्य को समझने की कोशिश है। इसे सूचना समाजःएक परिचय पुस्तक की भूमिका के रूप में लिखा गया है। यहां उसका एक अंश दिया जा रहा है।    
 इस पुस्तक के बारे में विस्तृत जानकारी इस प्रकार है-सूचना समाजःएक परिचय, आर्मंड मैतेलार्द, अनुवाद और संपादन--सुधा सिंह, प्रकाशक ग्रंथशिल्पी, सरस्वती कॉम्प्लेक्स, सुभाष चौक, लक्ष्मीनगर, नई दिल्ली-110092, मूल्य-395 रूपए,2012   

 सूचना समाज पदबंध का संबंध सूचना के बुनियादी रूप से न होकर अत्याधुनिक रूप से है। इसके अंतर्गत एक ऐसे समाज की बात की गई है जो पूरी तरह से सूचनाओं के संजाल से घिरा हो। सूचनाएं उसके उपभोग के लिए अहर्निश उपलब्ध हों। मनुष्य के विचार, चिंतन और दर्शन के सारे रूप सूचनाओं में बदल दिए गए हों। मेतलार्द की ‘सूचना समाज’ की विश्लेषण प्रक्रिया से साफ जाहिर है कि वे मानव मस्तिष्क के निरंतर कुंद किए जाने की प्रक्रिया से परेशान हैं। मनुष्य के परिश्रम को आसान करने के नाम पर ईजाद की गई ये मशीनें मनुष्य को अपनी बुद्धि और मेधा के इस्तेमाल करने से विरत करती हैं।
 सूचना युग की महत्वपूर्ण उपलब्धि है कम्प्यूटर। यह आज हर तरह की गणना कर सकने में सक्षम है। इंटरनेट के कारण यह त्वरित सूचना का  भी केन्द्र है। आज कम्प्यूटर की गणना प्रणाली के आधार पर विकसित सभी उपकरणों में नेट की सुविधा हासिल की जा सकती है। छोटे से जेबी मोबाइल के अंदर भी हम दुनिया के साथ जुड़े होने का एहसास पाल सकते हैं। ऐसा लगता है जैसे इस छोटे से कम्प्यूटर मशीन के आगे बैठा आदमी किसी जादुई दुनिया के दरवाजे पर बैठा हो। लेकिन ग़ौरतलब है कि कम्प्यूटर के की बोर्ड का प्रयोग कर रहा आदमी क्या भाषा भी जानता है ? भाषा के अक्षरों से हाथ, मस्तिष्क और विचारों का जो संबंध है वह कम्प्यूटर के कीबोर्ड से नहीं है। वहां फॉरमेटेड भाषा है। अक्षरों को केवल करीने से रखना भर है। भाषा बनानी नहीं पड़ती , बनी हुई है, इन्हें व्यवस्थित करके रख देना भर है। इसलिए आब सुलेख की बात नहीं की जा सकती। ʻकम्प्यूटर-लेखʼ की बात की जा सकती है।
 हैरोल्ड इन्नीस की तरह ही मेतलार्द ने विभिन्न समाजव्यवस्थाओं के साथ मशीन के संबंध को जोड़कर देखा है। गणना की मशीनों, विशेषकर कैलकुलेटर का विकास पूंजीवाद के विकासशील दौर की जरुरत थी जबकि व्यापारियों और सटोरियों के लाभ और व्यापार के लिए आंकड़ों के संग्रह, भंडारण और बाजार थे। समय और स्थान की अवधारणा बदल रही थी। मनुष्य को उसकी परिस्थितियों से आजाद करने की कोशिशों ने मशीनों पर निर्भरता बढ़ाई। इस क्रम में सूचना को बुद्धि का पर्याय मान लिया गया। लेकिन इस ‘इनफॉर्मेनेशन’ का ‘इंटेलिजेंस’ से कोई लेना-देना नहीं, यह सूचनासंग्रह मात्र है। सांख्यिकी के बढ़ते प्रभाव ने सूचनाओं को आंकड़ों में बदलने का काम किया। विकास, ह्रास, जनसंख्या, आमदनी, नफा-नुकसान सब अब अंक, दर और प्रतिशत में व्याख्यायित होने लगे। संख्याओं के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े रूप को दर्ज करना संभव हुआ। अध्ययन की नई पद्धतियों सर्वेक्षणमूलक , तुलनात्मक और सारणिबद्ध आदि का चलन शुरू हुआ। अब एक राज्य या देश के संदर्भ में दूसरे राज्य या देश को पिछड़ा या अगड़ा बताना ज़्यादा आसान था। विकसितअविकसित की कोटियां तय करने का आधार ये आंकड़े बनते गए। मेतलार्द ने बहुत साफ-साफ समझाने की कोशिश की कि सर्वेक्षणमूलक अध्ययन का आधार राजनीतिक अंकगणित है।
अंकगणित की इस शाखा का जन्म ही राज्य द्वारा जनता की विभिन्न गतिविधियों का हिसाब-किताब रखने के लिए हुआ है। विशेषज्ञों ने प्रत्येक क्षेत्र में सरकारी इस्तेमाल की नई भाषा का विकास किया। अब हर क्षेत्र की अपनी विशिष्ट भाषा थी।
 चिकित्साशास्त्र के अंतर्गत मनुष्य के शरीर को एक बड़े मशीन के रूप में देखने की पद्धति ने उसकी आत्मा को न्यून बनाया। मेतेलार्द के अनुसार सामाजिक प्रक्रिया का यह जैविक दृष्टिकोण नए किस्म की शक्ति संरचना को दर्शाता है। यह नजरदारी और सुरक्षात्मक तकनीक के बढ़ते महत्व को दर्शाता है। विशेषकर मनुष्य को एक-एक क्षण के लिए मशीनों के जरिए बांधकर और अनुशासन में रखने की प्रक्रिया को दर्शाता है। यह मनुष्य को पालतू और गुलाम बनाए जाने की भी प्रक्रिया है। ‘नॉर्मल’, ‘स्तरीय’ , ‘बराबरी’ जैसे पदबंध मूलतः ज्यामितिशास्त्र की देन हैं। राजनीतिक समाजशास्त्र के क्षेत्र में इन्हें लागू करते वक्त हर तरह के स्थानीय पुट और विभिन्नताओं को मिटाकर एक मानक रूप पर जोर होता है।
 हर नई तकनीक मानवीय दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तनों के दावों के साथ आती है लेकिन इन पर लगाई गई लागत और श्रम के मुकाबले इनसे होनेवाले लाभों की न्यूनता पर किसी का ध्यान नहीं जाता। ज़्यादातर इनकी असफलताओं को भुला दिया जाता है। इसका सबसे घातक रूप तकनीकी नियतिवाद है।
 समाज को एक बड़े औद्योगिक इकाई के रूप में देखने के नजरिए ने प्रबंधन युग की नींव डाली। औद्योगिक प्रबंधकों की तरह ही सामाजिक प्रबंधकों की जमात शिक्षा, उद्योग, सामाजिक आपदा , सामाजिक आयोजनों आदि के क्षेत्र में कुकुरमुत्ते की तरह पैदा हुए। इनका लक्ष्य मनुष्य नहीं वस्तुएं बनीं। सांख्यिकी और प्रबंधन के इस नए विज्ञान में मनुष्य एक ‘औसत सामाजिक आदमी’ में अवमूल्यित हो जाता है। इसके लिए सत्ता की तरफ से उसके लिए जो भी दिया जाएगा वह उपलब्ध सामाजिक औसत से ज्यादा नहीं होगा। इस आदमी की सारी उपलब्धियां यहां तक कि जीवन का मूल्य भी औसत ही होता है। बीमा कंपनियों के सारे तर्क, सरकार की समस्त कल्याणकारी योजनाओं का सार यही है- आदमी का औसत के रूप में अवमूल्यन।
 मेतलार्द ने हैरॉल्ड इन्नीस, लेरोइ गोरहान, मार्शल मैकलुहान आदि की अवधारणाओं का विस्तार से मूल्यांकन किया है। सभ्यता के विकास का संबंध, विशेषकर साम्राज्यवादी वर्चस्व के विकास का संबंध मशीनों के साथ गहरे जुड़ा है। मनुष्य की स्मृति मशीनों के विकास के साथ-साथ अंतर्मुखी से बहिर्मुखी हुई। मशीन का विस्तार मनुष्य के विस्तार का पर्याय बनता गया। ये अब जगजाहिर है कि कम्प्यूटर नेटवर्क का विकास अमेरिका की सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए हुआ था। इसी तरह से ʻसूचनाʼ का सतही अर्थ ख़बर या जानकारी मात्र नहीं थी बल्कि सूचना का अर्थ विभिन्न तकनीकी माध्यमों द्वारा दुनिया के अन्य देशों की खुफिया जानकारियां एकत्रित करनी थी। वन्नेवर बुश से लेकर क्लॉड शैनन तक का संबंध अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा शोध समिति से था।  
 आमतौर पर यह मानते हैं कि तकनीक और विज्ञान का धर्म और अंधविश्वास से छत्तीस का आंकड़ा है। तकनीक की तुलना में धर्म को पिछड़ा विचार माना जाता है पर किसी भी नई तकनीक या वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ समाज की मौजूदा शक्तिशाली संस्थाओं का गहरा रिश्ता होता है। मैकलुहान के नई तकनीक के संबंध में विश्व प्रसिद्ध विचारों का उसके धार्मिक विचारों के साथ गहरा संबंध है। कम्प्यूटर के जरिए इंटरनेट की जिस रियल टाईम स्पेस की क्षमता पर हम आज मुग्ध हैं वह दरअसल ʻसेजʼ (सेमी ऑटोमेटिक ग्राउण्ड एनवावॉयरमेंट सिस्टम) की परमाणु युद्ध के ख़तरे का सामना करने के लिए तैयार की गई रणनीति थी। यह दुश्मन की खोज करना, तत्काल निर्णय लेना और उस पर जवाबी कार्रवाई करने का एक संपूर्ण परिपथ था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से तकनीकी अनुसंधान में आई तेजी और इंटरनेट के तीव्र विकास का संबंध सैन्य कार्रवाई की जरूरतों को पूरा करने के लिए किए जा रहे शोधों और परमाणु शोधों से है।
 ध्यान रखना चाहिए कि द्वीतीय विश्वयुद्ध ने यह स्थिति साफ कर दी थी कि आगे आनेवाली लड़ाइयों में वायुसेना की ताक़त ही निर्णायक ताक़त बनने जा रही है। सूचना नेटवर्क का सारा खेल इसी ताक़त को हासिल करने से जुड़ा है। साथ ही ʻसूचना युगʼ और ʻसूचना समाजʼ जैसे पदबंध को समझने के लिए जरूरी है कि हम ʻजनसमाजʼ , ʻउत्तर औद्योगिकʼ, ʻउत्तर पूंजीवादीʼ और ʻउत्तर आधुनिकʼ पदबंधों को भी समझें।
   क्यों उत्तर औद्योगिक समाज में उत्पादन से ज़्यादा महत्वपूर्ण सेवा क्षेत्र हो गए ? इस पर विचार की जरूरत है। पेशेवर और प्रशिक्षित लोगों की तादाद श्रमिकों की तादाद की तुलना में कई गुना ज़्यादा तेजी से बढ़ी है। इसी प्रकार उत्पादन की जगह प्रबंधन ने ले लिया है। सूचना समाज के अंतर्गत ʻग्लोबल विलेजʼ की अवधारणा को इस परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। डेनियल बेल द्वारा ज्ञान और विश्वविद्यालयों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया, जिनमें से विश्वविद्यालय ज्ञान के विश्वव्यापी सूचनातंत्र के उत्पादन का केन्द्र थे। ये ज्ञान को इकट्ठा करने और एक अंतर्राष्ट्रीय पेशेवरों की जमात तैयार करने की प्रयोगशाला के रूप में विकसित हो रहे थे। ये सब सन् 70 के दशक में ज्ञान के विकास की अमेरिकी नीति के तहत हो रहा था। ग़ौरतलब है कि यही हाल आज के समय में भारतीय विश्वविद्यालयों का भी है।
 मेतलार्द ने इस पुस्तक में विस्तार से तकनीक और नेटवर्क के प्रसार के साथ बदलती हुई सामाजिक अवधारणाओं को प्रस्तुत किया है। खासकर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की सैन्य जरुरतों के अनुसार तकनीक के विकास की ब्रिटिश-अमेरिकी नीति और इसके अनुरूप ही जनसमाज की जगह ज्ञानसमाज और सूचना समाज की अवधारणाओं के विकास का विस्तार से विश्लेषण किया है। इसमें उत्तर औद्योगिक युग के प्रवक्ता डेनियल बेल से लेकर भविष्यवादी विश्लेषक एलविन टॉफलर तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय में साम्यवादी देशों के विशेषज्ञ ज़्बिग्नेव ब्रेजेंस्की के ʻटेक्नोट्रॉनिक युगʼ का विस्तार से आकलन है।
   मनुष्य के साझे ज्ञान को पहुंच के अंदर रखने के लिए और मांग पर तत्काल उपलब्ध होने के लिए जरूरी था कि विश्व सूचना संजाल का निर्माण किया जाता। पुराने आदर्श सार्वजनीनतावाद को अपदस्थ करके केवल नेटवर्क की सार्वजनीनता का अभियान चला। इसकी अगुवाई अमेरिका ने की और अन्य तथाकथित पिछड़े देशों ने तकनीक, पद्धतियां और सांस्थानिक आदतों को अमेरिका से उधार लेकर अपने ʻपिछड़ेपनʼ को कम करने की कोशिश की।
   भारत में भी नब्बे के दशक में ʻज्ञान समाजʼ की अवधारणा फल-फूल रही थी और उसी दौर में सैम पित्रोदा इसके ʻआईकॉनʼ बने। ध्यान रहे कि अमेरिका में नेटवर्क समाज के सभी प्रवक्ताओं का संबंध किसी न किसी रूप में अमेरिका की सैन्य और रक्षा विभागों से रहा है। ʻग्लोबल गवर्नेंसʼ या ʻपैन अमेरिकी प्रशासनʼ की तुलना में वैश्विक नियमन ज़्यादा कारग़र नीति है और इस नियमन का वाहक आधुनिक समय में नेटवर्कों का संजाल ही हो सकता है।    
 सन् 1970 में जोर-शोर से उछाली गई ʻसूचना-समाजʼ की अवधारणा ने राष्ट्र-राज्य के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगाया। यह सवाल उठा कि सूचना के वैश्विक तंत्र के सामने राष्ट्र राज्य का क्या अस्तित्व रह जाता है? कुछ देशों ने इसका प्रत्युत्तर सूचना उद्योग के क्षेत्र में देशी कंपनियों को बढ़ावा देकर करने की कोशिश की।
   सन् सत्तर तक सूचना के नियमन और डिरेगुलेशन की बातें आम नहीं हुई थीं। इसी क्रम में जापानी माध्यम सिद्धांतकार योनेजी मसूदा का नाम उल्लेखनीय है। तकनीक के क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों पर निर्भरता कम करने और देशी तकनीक विकसित करने के क्रम में दुनिया के देशों को आई बी एम कंपनी का भारत के साथ किया गया व्यवहार उत्प्रेरक बना। आई बी एम ने अचानक भारत से निकल जाने का निर्णय लिया और अपनी पूंजी में से कुछ भी देने से इंकार किया। इस घटना ने तकनीकी स्वनिर्भरता के लिए न केवल भारत को बल्कि अन्य निर्भर देशों को भी उत्प्रेरित किया। अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों पर तकनीक के हस्तांतरण के लिए दबाव बनाने के लिए इसे समझौते का हिस्सा बनाया गया। जापान, भारत, ब्राजील आदि देशों का जोर तकनीकी क्षेत्रों में देशीकरण की तरफ बढ़ता गया।
   80-90 के दशक में कंप्यूटर के बढ़ते प्रयोग को बेरोजगारी का बड़ा कारण बताया गया साथ ही सार्वभौमिकता की रक्षा के लिए अपने डाटा बैंक के निर्माण पर जोर दिया गया। कल्याणकारी राज्य के मॉडल में विश्वास करनेवाले देशों के लिए नोरा और मिन्क की रिपोर्ट खासा मायने रखती है जिसमें कहा गया कि सार्वजनिक सेवा की भावना सामने होनी चाहिए और सार्वजनिक अधिकारियों की देख रेख में नेटवर्क के स्तरीकरण से लेकर सैटेलाइटों के लॉन्च करने से लेकर डाटा बैंक के निर्माण तक की कार्रवाइयों को अंजाम देना चाहिए। केवल ये ही समाज के मौलिक ढांचे को आधार प्रदान कर विकास का नया मॉडल दे सकती है। सन् 80 के दशक में फ्रांस ने ʻसूचना के मुक्त प्रवाहʼ की अमेरिकी एकाधिकारवादी नीति का पुरजोर विरोध किया।
 आठवें दशक में विकसित देशों के विशेषकर अमेरिका की अंतरिक्ष पर अधिकार करने के उद्देश्य से सैटेलाइटों के जरिए की जा रही नज़रदारी के लिए ʻसामाजिक जरूरतʼ का नारा विकसित किया गया। बहुत-सी मानवीय जरूरतों का हल संचार के जरिए निकालने की बात की गई। विशेषकर शिक्षा, जनस्वास्थ्य, क़ानूनी सूचनाएं और डाकसेवाओं आदि के क्षेत्र में। दूरस्थ सेवाओं का महत्व बहुत तेजी से बढ़ा। दूरस्थ शिक्षा व्यवस्था का उद्धेश्य बहुत साफ था कि नागरिकों की एक लचीली जमात पैदा की जाए जिसकी जरूरत 21वीं सदी की पूंजीवादी व्यवस्था को पड़ेगी। मनोरंजन से लेकर तकनीक तक की खपत के लिए एक बड़े बाजार की जरूरत भी इससे पूरी होती दिख रही थी। शिक्षा के क्षेत्र में जिस ʻडिस्टेंस एजुकेशनʼ और ʻ ई लर्निंगʼ की बात भारत में जोरों पर हैं उसका उद्देश्य विश्वविद्यालयी शिक्षा व्यवस्था की कमियों को उजागर कर उसे दुरुस्त करना नहीं था बल्कि इस संस्था तक पहुंच के अधिकार को सीमित करना था। कारण था बढ़ती बेरोजगारी। रोजगार के उत्पादक क्षेत्रों में कमी। रोजगार केवल सेवा क्षेत्रों में दिखाई दे रहे थे। उसी अनुसार शिक्षा का नया ढ़ांचा तैयार किया जा रहा था। इस क्रम में किसी भी किस्म की गंभीर गवेषणा का निषेध भी शामिल था। 

1 comment:

सुरेन्द्र सोनी said...

निश्चय ही, जिस पुस्तक की भूमिका का यह अंश है - वह सोच के नए दरीचे खोलने वाली एक उपयोगी पुस्तक होगी..!
सुधाजी ! आपको बधाई...!!