Friday, August 7, 2009

भाषा का कामुक खेल और स्‍त्री भाषा

भाषा क्या है? अभिव्यक्ति का माध्यम। सम्प्रेण का माध्यम। कितने परिवारों से ताल्लुक रखती है? इण्डो ऑस्ट्रिक फलाँ -फलाँ । इसके व्याकरण का निर्माण कब हुआ ? 2000-3000 साल पहले। किस महापंडित ने पहला व्याकरण लिखा ? महामहिम फलाँ -फलाँ ने। व्याकरण में कौन कौन सी चीजें शामिल हैं? संज्ञा, सर्वनाम,कारक ,वचन ,लिंग आदि के जरिए भाषा कैसे अत्याधुनिक बनती है? इस तरह के कितने सवाल भाषा के संदर्भ में उठाए और हल किए जा चुके हैं। लेकिन भाषा किसके सम्प्रेण का माध्यम है ? किसकी अभिव्यक्ति होती है भाषा में ? भाषा-परिवार की बात करते हैं तो क्या परिवार के अंतर्गत वर्चस्व के संबंध को देखते हैं ? भाषा के विभिन्न तत्वों के जरिए यह संबंध कैसे अपने को अभिव्यक्त करता है ? स्त्री इस भाषा में स्वयं को कैसे व्यक्त करती है? स्त्री इस भाषि‍क संरचना में किस स्तर पर दाखिल होती है ? लिंग-भेद का आधार क्या है ? भाषा के अंतर्गत इसका चलन कब से शुरु हुआ ?

स्त्री भाषा के प्रश्‍न पर विचार करनेवालों में डेल स्पेण्डर का नाम प्रमुख है। स्पेण्डर ने 1980 में एक किताब लिखी '' मैन मेड लैंगवेज ''। स्पेण्डर ने किताब के आभार में स्वीकार किया है कि इसके लिखे जाने का पूरा श्रेय स्त्री आंदोलन को जाता है। भूमिका का पहला वाक्य है ''स्त्रियाँ इस बात से वाकिफ़ हैं कि पुरू श्रेष्‍ठता एक मिथ है और वे इस ज्ञान को कई स्तरों पर बरतती हैं।'' साथ ही यह भी लिखा पुरू श्रेष्‍ठता का पुरू क्ति से कोई लेना देना नहीं है दोनों अलग हैं। लेकिन दोनों अद्भुत ढंग से गुँथे हुए हैं। पुरू श्रेष्‍ठता ,पुरू क्ति के लिए मार्ग प्रस्त करती है। पुरू श्रेष्‍ठता की झूठ का किसी भी रूप में खुलासा पुरू क्ति को कम करनेवाला है। जब समाज में बहुत बड़ा भाग इस झूठ को पहचानने लगे तो इस क्ति की रक्षा या रूप परिवर्तन की जरूरत होती है।

स्पेण्डर ने समाज में पुरूषों की भूमिका को वर्चस्वशाली भूमिका के रूप में देखा है। इसलिए वे कहती हैं कि पुरू हमेशा से इस सामाजिक स्थिति में रहे हैं कि वे पुरू श्रेष्‍ठता का मिथ निर्मित कर सकें और इसे स्वीकार भी करवा सकें। वे इस स्थिति में रहे हैं कि इस झूठ को पुष्‍ट करने के लिए अपनी श्रेष्‍ठता के पक्ष में प्रमाण जुटा सकें। इसलिए स्पेण्डर का कहना है कि यह ऐसा मिथ है जिस पर हमला तो किया जा सकता है लेकिन जिसका उन्मूलन संभव नहीं है क्योंकि इसकी जड़ें सामाजिक बुनियाद में हैं। सामाजिक तानाबाना इस झूठ को बनाए रखने, इससे सहयोग करने के पक्ष में है। अगर इसकी मुखालफत करनी है तो हमारे विश्‍वास और मूल्यों के पुनर्निर्माण से कम पर बात नहीं बनेगी। प्रत्येक दिन हम अपने संसार का निर्माण पुरू नियमों के अनुसार करते हैं। हम प्रत्येक स्तर पर जद्दोजहद करते हैं अपनी दुनिया को अर्थवान बनाने के लिए लेकिन हममें से कम को ही यह भान होता है कि ये नियम कितने गहरे और स्वैच्छिक हैं। हम अपने सत्य का निर्माण जिस रूप में करते हैं या करने के लिए उत्प्रेरित किया जाता है उसमें इन नियमों की अहम भूमिका होती है। सत्य के निर्माण का एक अहम हिस्सा भाषा है। भाषा इस दुनिया को वर्गीकृत और व्यवस्थित करने का माध्यम है,यह सत्य को मैनीपुलेट करने का माध्यम भी है। भाषि‍क बनावट और भाषि‍क व्यवहार के माध्यम से ही हम अपनी दुनिया को वास्तविक बनाते हैं और अगर बुनियाद में ही गड़बड़ी है तो भ्रम के शि‍कार होते हैं। भाषि‍क नियम जो सांकेतिक व्यवस्था हैं यदि गलत हैं तो रोजाना धोखा खाते हैं।

स्पेण्डर का साफ मानना है अर्थ संबंधी नियम जो भाषा का हिस्सा हैं स्वाभाविक नहीं हैं। वे संसार में मौजूद हैं और उन्हें केवल अर्थ के जरिए खोजा जाना है ऐसा भी नहीं हैं।इसके उलट कोई और चीज खोजने के पहले इन्हें खोजा गया है।एक बार जन्म ले लेने के बाद ये नियम स्व -अधिकृत और स्व -वैध हो गए। उन हिचकिचाहटों से अलग, जो कभी रहे होंगे। भाशा के वर्तमान वर्गीकरण को विष्लेशित करके इसके उत्पत्ति और नियम बनने के कारणों तक पहुँचा जा सकता है क्योंकि यह हमारी विश्‍वदृष्‍टि‍ के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्पेण्डर ने भाषा को पुरू निर्मित और पुरू के लिए निर्मित माना है। जिसमें पुरू स्वयं नियम होता है। उसमें पुरू एकमात्र मानक और सामान्य होता है और जो इस दायरे में नहीं आते वे विचलन होते हैं। वर्गीकरण का यह सार्वजनीन तरीका मनुष्‍य जाति को दो बराबर भागों में नहीं बाँटता बल्कि पुरू के बरक्स सकारात्मक या नकारात्मक के रूप में बाँटता है। अर्थ के सबसे बुनियादी स्तर पर स्त्री की हैसियत पुरू की हैसियत से तय होती है । इस स्तर पर कई सकारात्मक या नकारात्मक अर्थ बनाये गए हैं।

स्पेण्डर प्रजननांगों के आधार पर मनुष्‍य जाति को विभाजित करने पक्ष में नहीं हैं। प्रजननांगों के आधार पर विभाजन का अर्थ है कि हम केवल दो लिंग मान रहे हैं और लिंगाधारित व्यवहार की एक पूरी श्रृंखला की वकालत कर रहे हैं। इन नियमों के आधार पर दुनिया को विभाजित करके पुरू श्रेश्ठता का औचित्य प्रतिपादन कर रहे हैं। पुरू श्रेश्ठता का यह नियम जब हम इसका विरोध कर रहे होते हैं तब भी हमारी दुनिया के नियम और व्यवहारों को नियंत्रित कर रहा होता है। पूरी दुनिया का बँटवारा ऋणात्मक पुरू या धनात्मक पुरू में है। यह एक सांकेतिक व्यवस्था है जिसमें हम पैदा हुए हैं । जब हम समाज के सदस्य बन जाते हैं और संकेत के अर्थ में प्रवे करना षुरु करते हैं तो साथ ही हम एक दुनिया भी निर्मित करना शुरु करते हैं ताकि इन संकेतों का व्यवहार संभव हो। इस तरह से हम पितृसत्तात्मक व्यवस्था में दाखिल होते हैं और इसे सत्य साबित करने में मदद करते हैं।

पितृसतात्मक व्यवस्था का मुख्य पक्ष है पुरूष श्रेष्‍ठता। कुछ स्त्रीवादी सिध्दांतकारों ने इसका नकार शुरु किया है। दुनिया को वर्गीकृत करने के नए नियम खोजने की पहल की है। जो इस धारणा पर आधारित नहीं है कि 'ठीक ठाक ठंग से मनुष्‍य' केवल पुरूष ही है और स्त्री नकार है।इसमें स्त्री को एक स्वायत्त सत्ता के रूप में देखे जाने पर जोर है। तथ्य जुटाए जाने पर जोर है जो पुरूष श्रेष्‍ठता को चुनौती देते हैं।

No comments: