Sunday, November 29, 2009

कैथरीन विलियम्स की एक कविता





जितना मुझे याद है उससे ज्यादा भूल चुकी हूँ
एक बिखरे अतीत की
अनजान कहानियों में खुद को खोजती हुई।
विस्थापन,ताकत के दुरुपयोग और सरोकारविहीनता के
धुंधलके में खोई जिंदगी के बीच
पैंतालीस वर्ष बाद,
फिर मैं जीवित हुई-
अंधकार से निकल रोशनी के लिए

(प्रस्तुति -सुधा सिंह)

3 comments:

अरविन्द श्रीवास्तव said...

स्वागत है ..... आत्मा से निकली कविता ...बधाई !

अनिल कान्त : said...

इसे पढवाने के लिए आभार

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

achchee kavita ..........
.............. aabhar ..........