Sunday, December 6, 2009

भाषा में स्त्री के अनुभव


                  
 एन्द्रीने रीच ने लिखा है ''स्त्री संघर्ष का समस्त इतिहास सदियों से चुप्पी में डूबा हुआ है। किसी भी स्त्रीवादी लेखिका के लिए सबसे बड़ी सांकृतिक बाधा यह आती है कि प्रत्येक स्त्रीवादी लेखन किसी शून्य से पैदा हुआ जान पड़ता है; जैसे कि हममें से प्रत्येक बिना किसी ऐतिहासिक अतीत, संदर्भयुक्त वर्तमान के जीते, सोचते और काम करते हैं। यह उन कई रास्तों में से एक है जिनमें स्त्री के काम को विच्छिन्न, अनियमित और अपनी किसी भी परंपरा से यतीम मान लिया जाता है।''
    ऐतिहासिक तौर पर स्त्रियाँ किसी भी तरह के सांस्कृतिक उत्पादन से बाहर रखी गईं। भाषा संस्कृति का सबसे अहम हिस्सा है। चूँकि स्त्रियाँ उत्पादन में शामिल न होकर सिर्फ उसकी प्रयोगकर्ता हैं इसलिए वे अपने सांकेतिक अर्थ को प्रमुखता देने में असमर्थ हैं। स्त्री और पुरू दोनों ही अर्थ उत्पन्न करने की क्षमता रखते हैं लेकिन स्त्रियाँ इस स्थिति में नहीं रहीं कि उनके द्वारा दिए गए अर्थ को सामाजिक तौर पर मान्यता मिल सके। वे कभी सार्वजनिक क्षेत्र का हिस्सा नहीं रहीं, संस्कृति की निर्मात्री भी नहीं रहीं। यदि वे कोई अपना अर्थ निर्मित करने की कोशिश भी करती हैं जो पुरू के दिए गए अर्थ से भिन्न हो तो अस्थायी होता है और जल्दी ही नष्ट हो जाता है। सामाजिक पहचान निर्मित करने के जितने भी क्षेत्र हैं उनमें स्त्रियाँ कहीं नहीं हैं। जैसे वे प्रभावशाली दार्शनिक नहीं हैं, राजनेता या प्रवक्ता नहीं हैं, वैयाकरणिक नहीं हैं,भाषाविद् या शिक्षक नहीं हैं और उनके पास वैसा अवसर भी नहीं है कि वे भाषा को प्रभावित कर सकें, संसार की वस्तुओं और टनाओं को परिभाषित करने के लिए नया अर्थ चालू कर सकें। इसका यह अर्थ यह नहीं है कि स्त्रियाँ दार्शनिक नहीं हुईं हैं, भाण नहीं दिया है, कविताएँ नहीं लिखी हैं ,भाषा के सिध्दान्त नहीं जानतीं वे सब कुछ जानती हैं लेकिन केवल यह साबित करने के लिए कि उनकी प्रतिभा का प्रवाह बहुत सीमित है। प्राय: एक पीढी क़ी स्त्री लेखिकाएँ दूसरी पीढ़ी के लिए अनजानी होती हैं। कोई श्रृंखलाबध्दता नहीं है इसलिए प्रत्येक पीढ़ी को नए से शुरु करना पड़ता है। पहले क्या घट चुका है बिना यह जाने हुए।
 स्त्रियों ने उतना ही इतिहास रचा है जितना कि पुरूषों ने लेकिन इसे सूत्रबध्द और प्रसारित नहीं किया गया। स्त्रियों ने शायद उतना ही लिखा जितना कि पुरूषों ने, लेकिन इसे संरक्षित नहीं किया गया और स्त्रियों ने उतने ही अर्थ पैदा किए जितने कि पुरूषों ने पर ये बचे नहीं। स्त्री का जो अर्थ पुरू-सत्य के मेल में नहीं था उसे नहीं बचाया गया। पुरु अनुभव के संचित अर्थ हमें दायरूप में मिले हैं जबकि हमारी स्त्री पूर्वजाओं के अर्थ लगातार विस्मृत होते रहे। अर्थ और नाम मनुष्य से पहले नहीं बने हमने उन्हें बनाया लेकिन उनमें से बहुत कम को बचा कर रख पाए। यह पुरू थे जिन्होंने संसार का नामकरण किया है। यह बहुत स्वाभाविक है कि जिन्होंने नामकरण किया है अपने हित को ध्यान में रखकर किया है। अपने को संदर्भ बनाकर किया है, अपने को केन्द्र में रखकर किया है, अपने संबंध से संसार का नामकरण किया है। यह नामकरण पक्षपातपूर्ण और गलत है क्योंकि आधे अधूरे नाम और उनके आधे अधूरे अर्थ हैं। कोई अलग नाम कोई अलग अर्थ जो स्त्रियों ने देने चाहे होंगे नहीं देने दिए गए परिणामत: स्त्रियाँ और उनके अनुभव अदृश्य कर दिए गए। जब हम स्त्री के अर्थों की खोज भाषा में करते हैं तो एक गहरी चुप्पी पाते हैं





 स्त्री अनुभवों के भाषा में रूपान्तरण की प्रक्रिया पर गौर करें तो देखेंगे कि सीधे स्त्री से जुड़े अनुभव का नामकरण भी स्त्री-अर्थ में नहीं होता। स्त्रियों के लिए जीवन का सबसे कठिन समय मातृत्व का होता है। उनके लिए यह दूसरा जीवन होता है। लेकिन मातृत्व का एक ही अर्थ प्रचलन में है कि माँ बनना एक सुखद अनुभव है। यह भी एक अर्थ हो सकता है लेकिन ऐसा नहीं है कि इसके उलट अनुभव और अर्थ नहीं रहे होंगे। ज्यादातर स्त्रियों के लिए मातृत्व का एकदम दूसरा अर्थ होगा। ऐसी स्त्रियों ने मातृत्व के संबंध में वैकल्पिक और विरोधी अर्थ और नाम पैदा किए होंगे लेकिन बिना अधिकार और किसी प्रकार की वैधता  के। उन स्त्रियों जिनके लिए मातृत्व न तो खुशी और न ही सुंदर अनुभव है के संदर्भ में महत्वपूर्ण सवाल उठ खड़ा होता है। उनके अनुभवों का कोई संदर्भ नहीं मिलता, कहीं से यह बात सत्य नहीं लगती कि मातृत्व कोई दुखद अनुभव है। परिणामत: उन्हें आसानी से अनुचित ठहराया गया। यह एहसास कराते हुए कि उन्हीं में कुछ गड़बड़ी है क्योंकि उनका अर्थ मान्य अर्थ से नहीं मिलता ! यह उन पर चुप रहने का दबाव भी बनाता है।





 यदि वे स्वीकृत से भिन्न अर्थ को बयान करती हैं तो उन्हें असामान्य करार दिया जा सकता है। स्त्री स्वच्छया अपने 'स्नायु रोग ' का प्रदर्न करने और 'अस्वाभाविक' का तमगा पहनने नहीं जाती। जब तक कि स्त्री सचेतनता न हो। अत: ज्यादातर स्त्रियों के लिए बेहतर चुनाव है कि वे अपने अनुभवों और मातृत्व की अवधारणाओं को दूसरी पीढ़ी को न बाँटें।
 स्त्री अनुभव की श्रृंखला इस तरह टूटती है। बेटी बिना यह जाने बिना बड़ी हो जाती है कि सुंदर र सुखद मातृत्व का कोई वैकल्पिक अर्थ भी हो सकता हैवह कभी भी इस घटना के विरोधी वक्तव्य को जान नहीं पाती ! स्त्रियों ने मातृत्व के अपने विरोधी अनुभव लिखे हैं। अधिकां स्त्रियों को यह पता ही नहीं होता कि इसमें कितनी पीड़ा से गुजरना होता है। स्त्री भी स्त्री से यह छिपाती है। तर्क यह होता है कि वे दूसरी स्त्री को डराना नहीं चाहती। अधिकां औरतें बिना यह जाने कि माँ बनने में कितनी तकलीफ होती है, माँ बनने की प्रक्रिया में प्रवे करती हैं। कई बार उनकी मौत भी हो जाती है। जब ऐसी स्त्री को जो माँ नहीं बनी थी यह बताया गया कि यह एक पीड़ादायक अनुभव है तो वह चौंक गई। इस अर्थ में यनिश्चित है कि मातृत्व को स्त्री के अनुभव से देखा गया है। क्योंकि मातृत्व स्त्री के अनुभव का हिस्सा है लेकिन यह 'सही' अर्थ नहीं है, उन अनेक अर्थों में से एक है जिन्हें वैध अर्थं में जगह नहीं मिली है। यह बहुप्रचलित अर्थ भी नहीं है।
 स्त्रीवाद के विकास ने स्त्री के भीतर विश्वास और उसके अर्थों के स्वीकारे जाने की संभावनाएँ पैदा की कि अब वह अपने अनुभवों को पुरू अर्थ से भिन्न अर्थ दे सकी। लेकिन इसके साथ ही विरोध का स्वर भी तीव्र हो रहा है। कोई भी ऐसा अर्थ जो पितृसत्ता के लिए चुनौती पे करता है उसे खतरनाक माना जाता है और कई बार यह स्त्री और पुरू दोनों की तरफ से होता है, हम पुरूषों के विधि- विधान से बनाई हुई दुनिया में रह रहे हैं ,अपनी विश्व -दृष्टि का निर्माण भी उसी के अंतर्गत करते हैं। इसलिए मातृत्व जैसी नितांत स्त्री अनुभव का यह नया नामकरण 'पीड़ादायकभी गुम हो जाएगा जैसे कि अन्य अर्थ गुम गए हैं।


 संसार के अर्थ और नामकरण पुरूषों के किए हुए हैं इसलिए एक भी ऐसा अर्थ जो उन्हें तुच्छ बनाए नहीं मिलता। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा के इस खेल का पितृसत्तात्मक व्यवस्था से गहरा संबंध है। पुरू इस खेल में लंबे समय से लगे हुए हैं जबकि स्त्रियों ने उनके दिए हुए अर्थ को बरता है। स्त्रियाँ ज्ञान और भाषा दोनों क्षेत्रों में बाहर रखी गईं। पितृसत्ताक व्यवस्था में एन्द्रीने रीच के अनुसार ''यह चुप्पी और स्त्री का गायब होना है।'' ऐसी दुनिया में जहाँ भाषा और नामकरण क्ति का प्रतीक है।'' ''चुप्पी दमन है, हिंसा है।''

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