Wednesday, January 27, 2010

युद्ध पत्रकारिता के विकल्प की तलाश में - जगदीश्वर चतुर्वेदी




                                                       



( गाजा में इस्राइल के अवैध कब्जे के खिलाफ फिलीस्तीनी कलाकारों की प्रतिवादी कला)
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संकट की अवस्था में मीडिया को कैसे देखें ? यह सवाल सबसे महत्व का है। संकट की अवस्था में साधारण लोग संशय और भ्रम के शिकार होते हैं।ऐसी स्थिति में साधारण आदमी का मीडिया पर विश्वास नहीं होता और न स्वयं पर ही भरोसा होता है। क्षेत्रीय युध्द का कवरेज इसे क्षेत्रीय युध्द नहीं रहने देता,बल्कि विश्वव्यापी मुद्दा बना देता है।इस तरह के युध्द के कवरेज में लगातार विध्वंस और मौत के दृश्य बार बार आते रहे हैं,ये दृश्य हमें बार-बार ज्यादा से ज्यादा व्याख्या की ओर ले जाते हैं किंतु टीवी पर व्याख्याकारों का अकाल पड़ा है,सीएनएन और बीबीसी जैसे माध्यमों पर जो व्याख्याकार आ रहे हैं वे सैन्य विशेषज्ञ हैं ,भू.पू. अमेरिकी-इस्राइली सैनिक अधिकारी हैं या फिर किसी कंजरवेटिव रिसर्च संगठन के थिंक टैंक हैं।


      समाचार चैनलों में इन दिनों सनसनीखेज खबर बनाने या फिर खबर छपाने का चक्र चल रहा है।इसके कारण सबसे ज्यादा उन्हें क्षति पहुँच रही है जो अपने अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।अपने जायज अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।समाचार चैनलों में गैर जरूरी सवालों पर ज्यादा ध्यान देने से ऑडिएंस के अ-राजनीतिकरण की प्रक्रिया को बल मिलता है।चैनल खबरों के इतिहास में नहीं जाते और न सही खबरों का चयन करते हैं। फिलीस्तीनी जनता के संघर्ष और कष्टों की खबरें एकसिरे से गायब हैं और जो खबरें दिखाई जा रही हैं वे हमलों की हैं।इजराइली सेना या फिलिस्तीनी संगठनों के हमले की खबरों को दिखाते समय खबरों के पीछे का सच छिपाया जाता है।
स्राइली प्रशासन की कट्टरपंथी नीति के तहत इस्राइली ब्रॉडकास्टिंग ऑथरिटी ने कुछ अर्सा पहले यह आदेश दिया कि रेडियो खबरों में 'सेटलर्स' और 'सेटलमेंट्स' पदबंध का प्रयोग नहीं किया जाय।उल्लेखनीय है कि 1967 के युध्द के बाद फिलिस्तीनियों की जिन जमीनों पर अवैध बस्तियां बसायी गईं उन्हें 'सेटलमेंट्स' कहते हैं,और इनके अवैध बाशिंदों को 'सेटलर्स' कहते हैं। इस पाबंदी का असर हुआ और अब वे 'नेवरहुड'पदबंध का प्रयोग करते हैं।

यू.एन.प्रस्ताव सं.446 के अनुसार इन इलाकों में यहूदी बस्तियां बसाना गैर कानूनी है।यह प्रस्ताव 1979 में पास हुआ और तब से लेकर आज तक अधिकृत इलाकों में अवैध बस्तियां बसाने का काम जारी है।इनमें लाखों फंडामेंटलिस्ट यहूदियों को बसाया गया है।

   सुरक्षा परिषद ने एक अन्य प्रस्ताव पास करके यह भी कहा है कि अधिकृत बस्तियों के मूल बाशिंदों को न तो हटाया जाय और न स्थानान्तरित ही किया जाय।अमेरिकी मीडिया किस तरह इस्राइलपंथी है और फिलिस्तीन विरोधी पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है इस तथ्य की पुष्टि के लिए 'नेशनल पब्लिक रेडियो'(एनपीआर) के प्रसारणों के बारे में किए गए अनुसंधान से मदद ली जा सकती है।यह अनुसंधान 'फेयर' ने किया।इसमें सन्2001की प्रथम छमाही के समाचारों का मूल्यांकन किया गया।इसमें निष्कर्ष निकला कि इस अवधि में एनपीआर ने अपनी खबरों में 62 स्राइली और 51 फिलिस्तीनियों की मौत की खबर प्रसारित की।सतही तौर पर यह आंकड़ा असंतुलित दिखाई नहीं देता।लेकिन गहराई में जाकर समीक्षा की गई तो पता चला कि इस अवधि में फिलिस्तीन-इस्राइल संघर्ष के दौरान 77 इस्राइली और 148 फिलिस्तीनी मारे गए।इसका अर्थ हुआ कि 81 फीसद इस्राइलियों की मौत की खबर प्रसारित की गई जबकि मात्र 34 फीसद फिलिस्तीनियों की मौत की खबर प्रसारित की गई।

इसी अवधि में 30 फिलिस्तीनी नागरिक मारे गए जिनकी उम्र 18वर्ष से कम थी।इनमें से मात्र 6 की खबर प्रसारित हुई यानी 20फीसद की रिपोर्टिंग हुई।इसके विपरीत 19 अल्पवयस्क इस्राइली मारे गए जिनमें से 17 की खबर प्रसारित हुई। यानी 89फीसद की रिपोर्टिंग की गई।इसी अवधि में 61 युवा फिलिस्तीनी मारे गए।किंतु 26फीसद की ही रिपोर्टिंग हुई। इसी तरह इस्राइली नागरिकों की मौत की खबर तुरंत प्रसारित की गई। 84 फीसद इस्राइली नागरिकों की मौत की खबर को 'नेशनल पब्लिक रेडियो' ने तुरंत प्रसारित किया। जबकि इस्राइली सेना की इसी अवधि में हुईं 69 फीसद मौत की खबरें प्रसारित की गईं।

इसकी तुलना में फिलिस्तीनी सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने की 72 फीसद खबरें प्रसारित की गईं और फिलिस्तीनी नागरिकों के मारे जाने की मात्र 22 फीसद खबरें प्रसारित की गईं।सर्वे की अवधि में अधिकृत इलाकों में 112 फिलिस्तीनी नागरिक मारे गए।इनमें से मात्र 26 की मौत की खबर प्रसारित की गई।इसके विपरीत अधिकृत अवैध बस्तियों में रहने वाले 28 इजराइली मारे गए इनमें से 21 की खबर 'नेशनल पब्लिक रेडियो' ने प्रसारित की।

कहने का तात्पर्य यह है कि अमेरिकी बहुराष्ट्रीय और राष्ट्रीय जनमाध्यमों का इस्राइल-फिलिस्तीन संघर्ष की खबरों की प्रस्तुतियों को लेकर संतुलित और वस्तुगत रवैयया कभी नहीं रहा। बल्कि इन माध्यमों की नीतियां अमेरिकी विदेश नीति से तय होती रही हैं।अमेरिकी विदेशी नीति मध्य-पूर्व के संदर्भ में अरब देशों और फिलिस्तीन राष्ट्र के हितों के खिलाफ और इस्राइली नस्लवादी, विस्तारवादी और फंडामेंटलिस्ट नीति से गहरे जुड़ी रही है। इस्राइली प्रशासन की प्रत्येक नीति को बहुराष्ट्रीय चैनल व्यापक कवरेज देते हैं जिससे उसके क्रिया- कलापों को वैध बनाया जा सके और फिलिस्तीनियों के संप्रभु राष्ट्र की स्थापना के संघर्ष को नाजायज ठहराया जा सके।
     मीडिया कवरेज का मूल समस्या है तथ्य और कल्पना के प्रति रवैयये की। कहां खबर है और कहां कहानी है।इसके बारे में मीडिया खासकर समाचार चैनलों के क्षरा सबसे ज्याइा भ्रम पैदा किया जा रहा है।सामान्य तौर पर खबर से बड़ी कहानी होती है,उसका कल्पना या वक्ता के विचारों से संबंध होता है। घटना के तथ्यों से उसक कोई संबंध नहीं होता। समाचार चैनलों में युध्द की खबरें कम और युध्द के इलाके का काल्पनिक विवरण ज्यादा आता रहता है।
     मसलन् चैनल पर युध्द के मोर्चे से एक खबर दिखाई गयी,उसके बाद उसके व्याख्याकार आने शुरू हो गए,वे सारे दिन या घंटों अपने विचारों को व्यक्त करते रहते हैं।आमतौर पर इन विचारों का घटना से कम काल्पनिक कहानी से ज्यादा संबंध होता है।
     हम यह भी कह सकते हैं ये 'खबर' के नाम पर व्यक्त की गयी 'राय' है। इस 'राय' में वक्ता के पूर्वाग्रह वर्चस्व बनाए होते हैं,इसके कारण ऑडिएंस या पाठक को 'खबर' को लेकर भ्रम पैदा हो जाता है। यह भी कह सकते हैं कि 'खबर' और 'राय' के बीच में चैनलों के द्वारा जो घालमेल चलाया जा रहा है वह खबर को गुम कर देता है और पूर्वाग्रहों को स्थापित कर देता है।यह काम 'रिपोर्ट' और 'खबर' के बीच घालमेल पैदा करके किया जाता है।
     मीडिया में 'रिपोर्ट' महज राय को व्यक्त करती है ,उसे खबर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।मीडिया कवरेज को देखते समय यह देखा जाना चाहिए कि किस तरह के वाक्य,भाषा,शीर्षक या कैप्सन का बार-बार प्रसारण किया जा रहा है। इनका बार-बार प्रसारण खास तरह की समझ बनाता है। ये हमेशा खास किस्म के अर्थ को व्यक्त करते हैं। इनके माध्यम वैचारिक प्रचार कार्य किया जाता है।यह भी कह सकते हैं कि समाचार के खास किस्म के कोड होते हैं जिनका भाषा के माध्यम से समाचार चैनल इस्तेमाल करते हैं।
    समाचार की भाषा में इनकी पुनरावृत्ति इस बात का संकेत भी है कि मामला सरल और सीधा सादा नहीं है। समाचार के भाषायी प्रयोग दर्शक को खास मनोदशा और वैचारिक सोच में ढ़ालते हैं,उसके लिए प्रशिक्षित करते हैं।उनके बारे में कोई भी निष्कर्ष इस बात पर निर्भर करता है कि हम उन्हें किस तरह ग्रहण करते हैं,दर्शक की आलोचनात्मक क्षमता का स्तर क्या है ?दर्शक की तथ्य के संदर्भ को समझने की क्षमता,स्टोरी के पीछे छिपे इतिहास को जानने की क्षमता पर समाचार का प्रभाव निर्भर करता है। समाचार के कोड वर्ड का इसी अर्थ में विशेष महत्व होता है।
    मसलन् इस्राइल के द्वारा फिलीस्तीनी इलाकों पर कब्जे के खिलाफ में फिलीस्तीनी प्रतिरोध को बीबीसी ने कभी प्रतिरोध नहीं कहा,बल्कि उसे 'सशस्त्र मुठभेड़' (आर्मड कनफंट्रेशन)कहा,जब 'सशस्त्र मुठभेड़' कहा जाएगा तो इसका अर्थ होगा कि फिलीस्तीनी अपनी जमीन पर वैध अधिकार प्राप्त करने के लिए हिंसा फैला रहे हैं।
    'कनफंट्रेशन' इकतरफा होता है।इसका अर्थ यह भी होगा कि फिलीस्तीनी हिंसा पैदा कर रहे हैं। जबकि सच यह है कि हिंसाचार इस्राइल कर रहा है। किंतु इसका कहीं भी बीबीसी खबरों में जिक्र नहीं मिलेगा। बीबीसी ने हम्मास को 'आर्मड मिलिशिया' कहा,जबकि फिलीस्तीनी नजरिए से हम्मास एक प्रतिरोधी सैन्य संगठन है। जबकि 'आर्मड मिलीशिया' का अर्थ है हाशिए का ग्रुप।
      समाचार के संदर्भ में यह तथ्य हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए यदि पूर्व निर्धारित अर्थ के तहत समाचार प्रसारित किए जाएंगे तो किसी भी किस्म विमर्श जन्म नहीं लेता, फिलीस्तीन, इराक, और अफगानिस्तान के संदर्भ में बहुराष्ट्रीय समाचार चैनलों से इन इलाकों की जो खबरें आ रही हैं वे इसी कारण विमर्श पैदा नहीं करतीं,वे इकतरफा प्रचार सामग्री की तरह पेश की जा रही हैं।यही वजह है कि इन क्षेत्रों के बाशिंदों के अधिकारों के समर्थन में जनता जुगाड़ करना मुश्किल होता जा रहा है।
मध्यपूर्व संकट मीडिया कवरेज विस्तृत मूल्यांकन का मूल मकसद है मीडिया की व्यापक शक्ति का शांति के लिए इस्तेमाल किया जाय,आज दुनिया को युध्द पत्रकारिता की नहीं बल्कि शांति पत्रकारिता की जरूरत है। आज के दौर में यदि कोई यह सोचे कि वह अराजकता या तबाही या विध्वंस से राजनीतिक लाभ उठा सकता है,राजनीतिक बढत हासिल कर सकता है तो वह गलतफहमी का शिकार है। इस तरह की किसी भी स्थिति में कोई भी अनुकूल परिणाम हासिल नहीं कर सकता है। इस्राइल को अरब देशों या फिलीस्तीन से आत्मरक्षा के नाम पर हमला करने की मीडिया में नंगी वकालत की जा रही है,किंतु आत्मरक्षा का अधिकर अरब देशों,फिलीस्तीन या इराक को नहीं है। सवाल किया जाना चाहिए कि यह आत्मरक्षा का एकतरफा और मनमाना अधिकार सिर्फ इस्राइल को ही क्यों है ?




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