Friday, July 10, 2009

अस्‍िमता वि‍मर्श की संकीर्णताओं से मुक्‍ति‍ का पाठ

अस्मिता विमर्श की संकीर्णताओं से मुक्ति का पाठ

प्रस्तुत विषय पर संवाद का आयोजन करके आपलोगों ने एक मौजू विषय पर ध्यान खींचा है। इसके लिए बधाई के हकदार हैं। समस्या जितनी बोलने में है उससे ज्यादा इसके विमर्श को खोजने में है। हिन्दी में अस्मिताएं ही अस्मिताएं हैं। किंतु विमर्श नहीं है। अस्मिता की सैध्दान्तिकी नहीं है। अस्मिता की आलोचना नहीं है। हमें अस्मिता पर बात करने में मजा आता है। विवाद करने में मजा आता है उसे दूर करने अथवा उसकी वैज्ञानिक व्याख्या तैयार करने में मजा नहीं आता। हम विमर्श के नाम पर विमर्श करने में दिलचस्पी लेते हैं यह तो कुल मिलाकर 'कला कला के लिए' की तरह है। 'विमर्श के नाम पर विमर्श' अथवा ' अस्मिता अस्मिता का खेल' हमारी उसी पुरानी मानसिकता का द्योतक तो नहीं है जिसमें विवाद के विषय वे होते थे जो वास्तव नहीं होते थे अथवा वास्तव सवालों से ध्यान खींचने के लिए उठाए जाते थे। हमारी मुश्किल यह है कि हम अस्मिता की ओट में यथार्थ सवालों से भाग रहे हैं। अस्मिता अथवा पहचान का निर्माण्ा और उसकी प्रक्रियाओं को पूरी जटिलताओं के साथ खोला जाना चाहिए। कहीं सामयिक सामाजिक -राजनीतिक सवालों को दरकिनार करने के लिए तो अस्मिता पर हंगामा ज्यादा नहीं हो रहा ?
अस्मिता की समस्या वास्तव अर्थों में उन लोगों की समस्या है जिनके सामने पहचान का संकट है अथवा जो सामाजिक अलगाव में जी रहे हैं। अस्मिता पर बात करते हुए हमें बुनियादी तौर पर यह सवाल उठाना चाहिए कि क्या हम अस्मिता के नाम पर मानव की समग्र पहचान को तो कहीं धुंधला नहीं कर रहे ? कहीं मनुष्य के जीवन के बड़े सवालों की अनदेखी तो नहीं कर रहे ? हमें अस्मिता के नाम अस्मिता की बहस के मौजूदा अंधड़ से सावधान रहना होगा। अस्मिता के सवालों को मनुष्य के सवालों से काटकर देखा जा रहा है। मनुष्य की बड़ी अस्मिताओं को छोटी-छोटी अस्मिताओं के बहाने हाशिए पर डालने की कोशिशें हो रही हैं। इस बहाने एक तरह से अस्मिताओं के बीच में जंग का एलान कर दिया गया है। हमें खोजना होगा कि इस जंग के आयोजक कौन हैं ?
जो लोग अस्मिता पर बातें करना चाहते हैं अथवा यहां पर एकत्रित हुए हैं वे सभी लोकतांत्रिक आन्दोलन का हिस्सा हैं अथवा किसी न किसी रूप में वाम आन्दोलन का भी हिस्सा रहे हैं। आज पहचान का कोई एक ही पैमाना प्रचलन में नहीं है बल्कि पहचान के कई पैमाने हैं। अस्मिता को सिर्फ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर ही विश्लेषित नहीं करना चाहिए। बल्कि व्यक्ति की पहचान और जुड़ाव के कई और रूप भी हैं जो साथ ही साथ चलते हैं। मसलन् एक स्त्री स्त्री है साथ ही माँ है,बंगाली है,मुसलमान है,भारतीय है, एशियाई है और यही औरत जब अमरीका चली जाती है तो अमेरिकन पहचान भी उससे जुड़ जाती है। इसके अलावा वह औरत लेस्बियन भी हो सकती है। कहने का अर्थ यह है कि एक व्यक्ति की एक नहीं एकाधिक पहचान होती हैं और ये सारी अस्मिताएं उसके व्यक्तित्व के साथ गुंथी होती हैं। इनमें कौन सी अस्मिता को हम खोलना चाहते हैं, इसी संदर्भ में सबसे प्रमुख सवाल है अस्मिता के संदर्भ का। अस्मिता को उसके विशेष संदर्भ में ही पढ़ा और देखा जा सकता है। अस्मिता को सामान्यीकरण के सहारे देखना सही नहीं होगा। अस्मिता को सामान्यीकरणों के सहारे देखना और सरलीकृत समाधान,संतोषजनक समाधान खोजना आसान है और हमने लंबे समय से हिन्दी में सरलीकरणों के आधार पर ही बातें की हैं। अमर्त्यसेन ने सही लिखा है कि '' अस्मिता सटीक संदर्भ पर निर्भर होती है।'' दूसरी महत्वपूर्ण बात अमर्त्यसेन ने लिखी है कि अस्मिता एक नहीं बल्कि एकाधिक होती है। अस्मिता को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि हम अन्य किस्म की पहचान के रूपों को अस्वीकार करें। यह व्यक्ति के ऊपर निर्भर करता है कि वह किसे महत्ताा देना चाहता है।
आप अस्मिता के जिस रूप की भी बातें करें कृपया उसके सही संदर्भ के साथ बातें करें। ज्योंही अस्मिता के सही संदर्भ में बातें की जाएंगी तो तुलनात्मक तौर पर प्राथमिकताएं भी तय करनी पड़ेंगी, विभिन्ना किस्म की वफादारियों के साथ उसके संबंध को भी खोलना पड़ेगा। अमर्त्यसेन ने लिखा है अस्मिता पर बातें करते हुए एक खतरा 'रिडक्शनिज्म' का भी है। समाजविज्ञानी जब अस्मिता की बातें करते हैं तो अमूमन दो किस्म के 'रिडक्शनिज्म' के शिकार होते हैं। पहला 'रिडक्शनिज्म' वह है जिसमें अन्य (यह अदर नहीं है) की अस्मिता की एकदम उपेक्षा की जाती है। उसके किसी भी किस्म के प्रभाव ,मूल्य आदि को अस्वीकार किया जाता है। इसी को 'अस्वीकार की अस्मिता' (आइडेंटिटी डिसरिगार्ड)कहते हैं। 'रिडक्शनिज्म' का दूसरा रूप है ''सिंगुलर एफीलेशन' यानी 'एकक लगाव', इसके तहत व्यक्ति की पहचान को किसी खास चीज से जोड़कर देखते हैं। व्यवहारिक तौर पर उससे जुड़ा भी होता है। सामूहिकतौर पर उसकी पहचान उससे बनती भी है। किंतु एक मनुष्य के नाते हम किसी एक से नहीं अनेक से जुड़े होते हैं। हमारे व्यक्तित्व में एक नहीं अनेक अस्मिताओं का वास रहता है। हमारी एक नहीं एकाधिक वफादारियां होती हैं। भारत जैसे देश में व्यक्ति की एक नहीं अनेक अस्मिताएं हैं। एक अस्मिता वह है जो जन्मना है, एक वह है जो लिंगाधारित है,एक वह है जो पेशागत है, एक वह है जो क्षेत्रीय बाशिंदे के तौर पर है। कुछ लोग हैं जो अपने संकुचित नजरिए के कारण अस्मिता के बहुलतावादी रूप को स्वीकार करने की बजाय उसके एकल चरित्र पर अतिरिक्त जोर दे रहे हैं। इसके कारण अनेक किस्म के टकराव, विवाद, सामाजिक संघर्ष,अभिव्यक्ति की आजादी के लिए खतरा आदि समस्याएं पैदा हो रही हैं। व्यक्ति की एकल अस्मिता नहीं होती बल्कि बहुलतामूलक अस्मिता होती है। एकल अस्मिता को प्रामाणिक बनाना और उसके लिए संतोषजनक तर्क खोजना बेहद मुश्किल है, एक ही वाक्य में कहें तो एकल अस्मिता की तर्क,आंदोलन,राजनीति आदि किसी भी तरह हिमायत और रक्षा संभव नहीं है। कभी कभी वर्गीकरण को बौध्दिक तौर पर सिध्द करना भी मुश्किल होता है। फ्रेंच माक्र्सवादी-समाजशास्त्री बोर्दियो के अनुसार कभी कभी सामाजिक एक्शन ऐसी ''भिन्नाता को जन्म देते हैं जिनका कभी अस्तित्व ही नहीं था।'' और ''सामाजिक जादू लोगों का रूपान्तरण करता है और उन्हें बताता है कि वे भिन्ना हैं।''
हमें ''कंट्रास्टिंग' और '' नानकंट्रास्टिंग' अस्मिताओं के बीच में अंतर करना चाहिए। मसलन् यह संभव है कि विभिन्ना किस्म के समूह एक ही किस्म की केटेगरी में आते हों। जैसे बंगाली अथवा बिहारी की पहचान में विभिन्ना किस्म की अस्मिताओं का समाहार किया जा सकता है। अथवा नागरिक की केटेगरी में अनेक किस्म की अस्मिताओं को समाहित किया जा सकता है। अथवा मुसलमान अथवा हिन्दू की पहचान में अनेक किस्म की अस्मिताओं को समाहित किया जा सकता है। ये सारे रूप वे हैं जो विभिन्ना किस्म के अंतरों को अस्वीकार करते हैं। इसी तरह अस्मिता के वे भी रूप हैं जहां अंतरों पर,भेद पर,भिन्नाता पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। इस क्रम में हम मनुष्य रूपी अस्मिता को भूल गए हैं। हमें भेद और अभेद वाली अस्मिताओं में से भेद वाली अस्मिताएं पसंद हैं। हमें मानवीय अस्मिता पसंद नहीं हैं। हम व्यक्ति को स्त्री, दलित,जाति,राष्ट्र,पेशा,भाषा आदि से जोड़कर देखने लगे हैं और मानवीय अस्मिता को इन सबके सामने भूल गए हैं अथवा उपेक्षा करने लगे हैं। यह भी कह सकते हैं हम बड़े हुए है किंतु अपनी पहचान के नाम पर बौने भी हुए हैं। हमने अस्मिता को महान बनाया है मनुष्य की अस्मिता को महान नहीं बनाया है। हमने अस्मिता के सवालों पर चर्चा की है मनुष्य के सवालों पर चर्चा नहीं की है। हमारा चयन,वफादारियां, नजरिया, विश्वदृष्टिकोण सभी कुछ अस्मिता के एकल रूप से परिचालित रहा है हमने यदि मनुष्य को आधार बनाया होता तो अस्मिता के एकल की बजाय बहुलतावादी रूप की प्रतिष्ठा की होती।
अस्मिता के संदर्भ में एक बात यह यह भी है कि अस्मिता कोई तयशुदा ,बनी-बनायी चीज नहीं है,ईश्वरप्रदत्ता चीज नहीं है, बल्कि उसे अर्जित करना पड़ता है। उसे आप अपने अंदर खोजते है,ं अर्जित करते हैं। हम जब अस्मिता के विवादों की बातें करते हैं तो हमें यह भी देखना चाहिए कि विवाद असली हैं अथवा नकली हैं। विवादों का हमारी वफादारी पर क्या असर हो रहा है। हमारी प्राथमिकताओं और प्रतिबध्दताओं पर क्या असर हो रहा है ? विवाद का इतिहास,संस्कृति ,भाषा,राजनीति,पेशे, परिवार, बंधुत्व आदि पर क्या असर हो रहा है। इन सारी चीजों की सामुदायिक महिमामंडन के नाम पर उपेक्षा नहीं की जा सकती। सवाल यह नहीं है कि हम अस्मिता को चुनें या नहीं चुनें ? सवाल यह है हमारे पास विकल्प की अस्मिता कौन सी है ? अथवा हमारे पास बहुआयामी-बहुस्तरीय अस्मिता है ? क्या हम जो अस्मिता चुन रहे हैं वह हमें पर्याप्त स्वतंत्रता और मानवीयबोध प्रदान करती है ? क्या वह हमारी मानवीय प्राथमिकताएं समग्रता में तय करने में मदद करती है ?

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