Sunday, July 12, 2009

कहानी के प्रति‍मान और खुलापन

कहानी खुले छोरोंवाली विधा है। कविता का शास्त्र बहुत पुराना है पर कहानी का शास्त्र हिंदी पंडित अभी भी नहीं बना पाए हैं। अचानक प्रतिमान निर्मित करने का आग्रह क्यों ? प्रतिमान के बिना क्या कहानी नहीं लिखी जा रही ? हिन्दी में कहानी का शास्त्र रचने की कोशि‍श करनेवालों में सबसे पहला नाम डॉ नामवर सिंह का है। नई कहानी के कुछ कहानीकारों और आलोचकों ने भी इस प्रयास में साथ दिया। लेकिन ये प्रयास नगण्य हैं। अभी भी कहानी बिना किसी निश्‍चि‍त प्रतिमान के बड़ी ठसक के साथ विकसित होती चली जा रही है। कहानी की पत्रिकाएं छप रहीं हैं, लघु पत्रिकाओं में कहानी एक अनिवार्य घटक है।
एक समय में 'कहानी' , 'नई कहानी' और आज 'हंस', 'कथादेश' आदि साहित्यिक पत्रिकाएं कहानी की लोकप्रियता को दरशाती हैं। अखबारों के रविवारीय मनोरंजन के पृष्‍ठ कहानी छापे बिना पूरे नहीं होते। फिर भी इस विधा का न तो कोई फार्मूला है न ही कोई शास्त्र ! बुनियादी सवाल है कि आखिर पंडित प्रतिमान गढ़ना क्यों चाहते हैं ? इससे कहानी का फायदा है या उनका ? कहीं यह सब सुविधानुकूल विवेचना के लिए तो नहीं किया जा रहा ? भारतीय मानक ब्यूरो की तरह प्रतिमानित कथा साहित्य के दायरे में कौन होगा और कौन-कौन उससे बाहर होगा। मानकों का चयन आप किन आधारों पर करेंगे ? मानक स्थापित करनेवाले कौन-कौन होंगे ? कैसी कहानियाँ होंगी ? मानक स्थापित करने की जो बेचैनी है वह कहीं विचलन साबित करने की बेकरारी का ही विस्तार तो नहीं ? अब तक कथा साहित्य के जो मानक रहे आए हैं उनके आधार पर रचनाओं का विश्‍लेषण हो सका है ? इस मानकीकरण से रचनाएँ बहिष्‍कृत हुईं हैं या नहीं ? बहिष्‍कृत हुईं हैं तो वे किनकी रचनाएँ हैं ?
नई कहानी और समकालीन कहानी के प्रतिमानों की जब भी बात की गई कविता के मानकों को क्यों सामने रखा गया ? यह एक मजबूर साहित्यिक स्थिति थी या सचेत साहित्यिक चयन ? कहानी के मानकों की जब भी बात करते हैं तो खास तरह के मानदंड ही क्यों सामने रखते हैं -बिंब, प्रतीकविधान, साधारणीकरण आदि ? कविता के प्रतिमानों को ज्यों का त्यों कहानी पर लागू करने का अर्थ क्या है ? यह जानी हुई बात है कि कहानी 'खुला' होना ही इसकी ताकत है। इससे कहानी में ज्यादा लोगों की ज्यादा तरीकों से भागीदारी संभव हो पाती है। सबसे महत्वपूर्ण चीज कि कविता से भिन्न कहानी स्त्री की विधा है।
कविता का सारा जोर शास्त्रीय रूपायन पर है , प्रातिभ ज्ञान के विस्फोट और निरंतर अभ्यास पर है , कविता प्रतिभा और अभ्यास दोनों का फल होती है। ज्ञान के विषम बँटवारे वाले समाजों में प्रतिभा तो संभव है पर अभ्यास का अधिकार कुछ निश्‍चि‍त लिंग और जाति को ही रहा। भक्त-कवियों के संदर्भ में संत पहले या कवि जैसे सवाल या स्त्रियों के कविता न करने या करने पर पिष्‍टपेषण करने की स्थितियों का कारण यही है कि कविता पुंसवादी विधा है। स्त्रियों और हाशि‍ए पर फेंके गए लोगों को इसे अभ्यास से अर्जित करना पड़ता है। इसका शास्त्र है और शास्त्र का पाठ , ज्ञान कुछ लोगों के लिए है। कहें कि कविता अनुकरण का शास्त्र है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहाँ यह बात भी ध्यान रखना चाहिए कि अनुकरणमूलक कलाओं में दक्षता हासिल करने में स्त्री की सानी नहीं हो सकती।
नृत्य, अभिनय ,चित्र हो या कविता इन सबमें स्त्रियों की महारत है। कारण वे अच्छा अनुकरण करती हैं ! जैसे वनगमन के समय सीता ने राम और लक्ष्मण के पगचिह्नों के बीच अपने लिए जगह बनाते हुए किया था ! तभी तो छायावाद चतुष्‍टयी में बाद में दाखिल हुई महादेवी से 'बढ़िया' और 'छायावादी गुणों से पूर्ण ' कविता कोई और नहीं लिख पाया। लेकिन तब भी साहित्य-इतिहास का बड़ा तथ्य यह है कि आधुनिक कहानी के आरंभ से ही विश्‍व की प्रत्येक भाषा में स्त्रियों ने इस विधा को बडे उत्साह के साथ अपनाया। इसका कारण एक तो इसकी गैर -शास्त्रीय परंपरा रही और दूसरे कि स्त्री को पहली बार अपनी भाषा में अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करने का मौका मिला।
साहित्य-इतिहास की विशेष तौर पर हिन्दी साहित्येतिहास की विडंबना है कि इसने स्त्री के इस बड़े अवदान की अनदेखी की है ! आधुनिक युग में हिन्दी की पहली कहानी की बहस में 'बंगमहिला' की कहानी शामिल है किन्तु इसके बाद कोई नाम बहुत दूर तक नहीं मिलता। बीसवीं सदी के पहले दशक से हिन्दी की आधुनिक कहानी की परंपरा बन जाती है पर स्त्री कथा की कोई परंपरा आज भी नहीं बन पाई है ! प्रतिमान तलाशने का काम जो कुछ मौजूद है उसकी अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

1 comment:

Raviratlami said...

मुझे याद है कि अस्सी के दशक में अ-कहानी भी प्रचलित हुआ था. उस पर कुछ प्रकाश डाल सकें तो उत्तम होगा