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स्त्री का स्व और आत्मकथा के मानक

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                 ' स्व ' या ' सेल्फ ' पुंसवादी समीक्षा में आत्मकथा लेखन का बुनियादी आधार है वह कहीं होता नहीं है बनाया जाता है। अर्जित किया जाता है। यह स्वाभाविक नहीं है। स्वाभाविक ' स्व ' वह है जो अंतर्भुक्त है। भरा-पूरा है। इंसान के होने की अनिवार्य शर्त है। आधुनिक अर्थ में ' स्व ' को हासिल करने की कोशिश इस स्वाभाविक स्व से दूर भागने की कोशिश है। यहां तक कि इस स्व की सहज स्वामिनी स्त्री को भी इसके कारण हीनताबोध कराया जाता है। क्योंकि स्त्री के स्व और संसार के बाहरी स्व के बीच बड़ा अंतर होता है। उसके अंतर्भुक्त स्व को स्व की कोटि से ही खारिज कर दिया गया। स्त्री के स्व की अन्यतम विशेषता होती है कि इसमें बहुत स्पेश होता है। अपने से ज्यादा दूसरे के लिए। यह एक किस्म की अंतर्क्रिया है स्वयं , अन्य तथा वास्तविक संसार के बीच।   स्व का निर्माण अंदर मौजूद सहज स्व की मौत है। स्व के निर्माण के क्रम में बाहरी बाधाएं , रुढ़ियां , प्रतिबंध आदि सब काम करते हैं। इनसे टकराते हुए , संघर्ष करते हुए ही इसका निर्माण संभव है। यह संसार के साथ मैं का अंतर्...

शाहरूख एक्टिविस्ट नहीं हैं राजदीप सरदेसाई

          हिन्दी फिल्मों के बादशाह शाहरूख खान की नई फिल्म ' माई नेम इज़ खान ' 12 फरवरी को प्रदर्शित होने जा रही है। शाहरूख का कसूर है कि उन्होंने अपने पड़ोसी देश के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंध की बात कही है। उन पर आरोप है कि वे पाकिस्तान समर्थक हैं। देशद्रोही हैं। तथाकथित राष्ट्रवादी और अन्य हिन्दुत्ववादी संगठन उन से माफी मांगने को कह रहे हैं। शाहरूख खान का कहना है कि उन्होंने कोई ग़लती नहीं की, फिर माफी किस बात की। वे भारतीयता के बारे में पैसोनेट हैं। वे कहते हैं कि मेरी देशभक्ति पर सवाल उठे तो क्या इसे मुझे समझाना पड़ेगा। मैं बंबई में रहता हूँ। मुम्बईकर हूँ। 20 साल से रह रहा हूँ। यह एक आजाद मुल्क है और प्रत्येक भारतीय को हक़ है जब तक वह अपने टैक्स देता है और कोई आपराधिक कर्म नहीं करता तब तक वह निर्बाध रूप से अपना काम कर सके। मैंने मुम्बई से सब कुछ कमाया है। मेरा मुम्बई पर जितना हक़ है उससे ज्यादा मुम्बई का मुझ पर हक़ है। यह मेरी अस्मिता का प्रश्न है कि मैं पहले भारतीय हू ¡ बाद में मुम्बईकर। हिन्दी सिनेमा व्यावसायिक सिनेमा है। हमको सबसे बड़ा डर है कि हमारे क...

बहिणाबाई चौधरी- मैं अब अपने लिए-

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   बहिणाबाई चौधरी (1880-1905) महाराष्ट्र के जलगाँव जिले की कपास की खेती करनेवाली किसान स्त्री थी। बहिणाबाई की कविताएँ मूलतः किसानी के श्रम के दौरान लिखी गई कविताएँ हैं। भारत के अन्य हिस्सों में स्त्रियों की रचनात्मकता उनके जीवन के कार्यव्यापार के बीच से फूटी है , बहिणाबाई की कविताएँ भी उसी तरह से रची गई हैं। बहिणाबाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं लेकिन जीवन के गाढ़े अनुभव के दर्शन उनके गीतों में बिखरे हैं। मराठी के ओवी छंद में खानदेसी और वर्हाडी बोलियों में बहिनीबाई के गीत मिलते हैं। जो चीज ज्यादा आकर्षित करती है वह है परंपरा और रूढ़ियों के बीच से जगह बनाने की कोशिश। जीवन के प्रति ललक। भाग्य से संघर्ष की इच्छा। इस कविता में एक विधवा स्त्री की तकलीफ और परिस्थितियों से संघर्ष के साथ- साथ जीवन को सुंदर बनाने की इच्छा शामिल है।                                              ...