Posts

Showing posts with the label मुक्तिबोध

मजदूरबोध का महान कवि‍ मुक्‍ति‍बोध - वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी

Image
           सबसे पहली बात यह कि‍ मुक्‍ति‍बोध अखण्‍ड भाकपा के सदस्‍य थे। शमशेरबहादुर सिंह ने 'चॉंद मुँह टेढ़ा है' की जो भूमि‍का लि‍खी है उसमें मजदूरों लि‍ख है की मजदूरों के जुलूसों में भाग लेते थे, जुलूस पर जो पुलि‍स के अत्‍याचार होते थे उन्‍हें प्रत्‍यक्ष देखा और झेला था, 'नया खून' के संपादक थे। और 'तारसप्‍तक' में प्रकाशि‍त जो कवि‍ता है मुक्‍ति‍बोध की 'पूंजीवाद के प्रति‍' वह उनकी प्रारंभि‍क कवि‍ताओं में से है। उसमें एक पंक्‍ति‍ आती है ' कि‍ केवल एक जलता सत्‍य देते टाल ।'   यह जानना मुश्‍कि‍ल नहीं है कि‍ मुक्‍ति‍बोध जलता सत्‍य कि‍से कहते थे। मुक्‍ति‍बोध की मानसि‍क या रचनात्‍मक प्रवृत्‍ति‍ यह थी कि‍ वो कि‍सी समस्‍या की अनदेखी नहीं करते। केवल भौति‍क सामाजि‍क समस्‍याएं नहीं बल्‍कि‍ मानसि‍क वैयक्‍ति‍क समस्‍याओं और उलझनों का दबाव उन पर पड़ता था, उन पर भी अपनी कवि‍ताओं में वि‍चार करते थे। इसलि‍ए उनकी कवि‍ता में एक उलझाव लगता है। उनकी मशहूर कवि‍ता की एक महत्‍वपूर्ण पंक्‍ति‍ है 'एक कदम उठाता कि‍ सौ राहें फूटती हैं।' यह उनकी कवि‍ता की रचनात्...

सभ्यता समीक्षा के बड़े आलोचक हैं मुक्‍ति‍बोध- सुधीश पचौरी

सभ्यता समीक्षा के बड़े आलोचक हैं मुक्‍ति‍बोध सुधीश पचौरी मुक्‍ति‍बोध की चि‍न्‍ता के केन्‍द्रीय वि‍षय हैं प्रेम और सौंदर्य। बुनि‍यादी प्रश्‍न मुक्‍ति‍बोध की कवि‍ता में ही आ गया है ' समस्‍या एक - मेरे सभ्‍य नगरों और ग्रामों में सभी मानव सुखी सुंदर व शोषणमुक्‍त कब होंगे ? ये उनकी कवि‍ता का एक अंश है और यही उनकी चि‍न्‍ता का बुनि‍यादी वि‍षय रहा है। मुक्‍ति‍बोध बार बार कहते हैं कि‍ मानव प्रेम और सौंदर्य ये मेरी चि‍न्‍ता के प्रमुख वि‍षय हैं। नयी कवि‍ता के उस दौर में , जो 1943 के आसपास का दौर है , ये लोग प्रगति‍शील आंदोलन के साथ सीपीआई के सदस्‍य थे , नेमीचंद जैन , मुक्‍ति‍बोध आदि‍। उस समय उन्‍होंने तारसप्‍तक में एक बयान लि‍खा है , उससे सि‍द्ध होता है कि‍ ' नयी राहों ' के अन्‍वेषण की व्‍याकुलता उनमें ज्‍यादा है। उस समय का जो भारत है , इस उभरते हुए नए भारत में , नया मध्‍यवर्ग और नि‍म्‍नमध्‍यवर्ग , उसके भवि‍ष्‍य की चि‍न्‍ता इनकी केन...