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आधुनि‍कता के अधूरे प्रकल्‍प में कहानी और यथार्थ

कहानी का उद्भव बताते हुए भारतीय परंपरा में चाहे जातक या पंचतंत्र की कथाओं में जाएं या कथासरित्सागर में एक बात जरूर ध्यान रखने की है कि इन कहानियों का संसार एकांगी नहीं है। सबकी भागीदारी है। उस समय के समाज का पूरा ढाँचा ,संबंध और प्रतिनिधित्व मौजूद है। यानी देखा और जिया गया संसार है और उस पर पुरा हुआ रूपक-प्रतीकों की एक दुनिया है। इन सबसे ऊपर है कभी न खत्म होनेवाली कथा। कल्पना के रुमानी पंखों से सजी हुई। अर्थात इस बहस का कोई अर्थ नहीं कि कहानी को यथार्थवाद ने कितना नुकसान पहुँचाया ! यथार्थ के बिना कहानी नहीं बनती ठीक वैसे ही जैसे कोरी कल्पना कहानी का आधार नहीं हो सकती। मनोवैज्ञानिक निश्कर्षों पर जाएं तो कल्पना भी यथार्थ का एक हिस्सा है। यहाँ चूँकि बहस का यह मुद्दा नहीं है इसलिए मैं अपनी बात इस बिन्दु तक सीमित रखना चाहूँगी कि केवल 'आर्टिफैक्ट' कहानी नहीं हो सकता। यह वैसा ही होगा कि मंडप सजा दिया जाए और दूल्हा-दुल्हन का पता न हो। तय मानिए ऐसी स्थिति में बाराती भी नहीं आएंगे ! कायदे से हमें मात्रा पर विचार करना चाहिए। इसमें आनुपातिक संबंध होना चाहिए। यहीं कथा के मानकों के आध...