आत्मकथा का शिल्प और दलित-स्त्री आत्मकथाः दोहरा अभिशाप -सुधा सिंह
21 वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण विधा आत्मकथा है। इसमें बड़ी संख्या में स्त्रियों की आत्मकथाएँ शामिल हैं। आत्मकथा का जो पुराना ढांचा था वह इस दौर में टूटा। अभिव्यक्ति, शिल्प सभी स्तरों पर इस दौर की आत्मकथा पहले के प्रयासों से अलग है। आत्मकथा के संबंध में साहित्यिक धारणा यह थी कि आत्मकथा उसी की होनी चाहिए जिसने जीवन के किसी क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की हो। यह उपलब्धि चाहे सामाजिक हो, राजनीतिक या साहित्यिक। जाहिर है कि ऐसी उपलब्धियों को हासिल करने का मौक़ा आसानी से स्त्री को नहीं मिलता। यही कारण है कि बहुत कम स्त्रियों ने नब्बे के दशक के पहले अपनी आत्मकथा लिखी। किसी क्षेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त कर या कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर आत्मकथा लिखने के बजाए आत्मकथा सामान्य उपलब्धियों की भी हो सकती है अथवा कहें कि आत्मकथा लेखन भी एक उपलब्धि हो सकती है, इस तरह नहीं सोचा गया था। यानि आत्मकथा लेखन के प्रति नजरिया 90 के दशक के बाद आमूल चूल बदलता है। आरंभ में आत्मकथा लेखन पुरूष विधा रही थी लेकिन अब यह स्त्री विधा बनती है। सबसे दिलचस्प चीज कि आत्मकथा लेखन की स...