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फिलीस्तीन मुक्ति सप्ताह- फिलीस्तीन के बिना अधूरा है प्राच्यवाद

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                                                                           आलोचकगण जब ' ओरिएण्टलिज्म ' पर विचार करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि आखिरकार सईद को यह किताब लिखने की जरूरत क्यों पड़ी ?      यह किताब जब लिखी गयी थी तब सारी दुनिया में नए सिरे से नव्य-औपनिवेशिकता और नव्य-आर्थिक उदारतावाद की मुहिम शुरू हो चुकी थी। इस मुहिम का लक्ष्य नए किस्म की वैचारिक गुलामी था। द्वितीय विश्वयुध्दोत्तार दौर में मध्य-पूर्व से इसका सिलसिला आरंभ हुआ था और आज वह अपनी पकड़ में सारी दुनिया को ले चुका है। यही वह प्रस्थान-बिंदु है जिसके कारण ' ओरिण्टलिज्म ' का संदर्भ-सूत्र मध्यपूर्व और साम्राज्यवाद विरोध है। ' ओरिण्टलिज्म ' लिखने का मकसद विचार-विमर्श करना मात्र...

फिलीस्तीन मुक्ति का सपना और एडवर्ड सईद का प्राच्यवाद

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                                                    एडवर्ड सईद को सन् 1978 के पहले दुनिया में बहुत कम   लोग जानते थे। सन् 1978 में ' ओरिएण्टलिज्म ' किताब के प्रकाशन के साथ उनके विचारों और गतिविधियों की ओर सारी दुनिया के बुध्दिजीवियों और राजनीतिक कार्यक र् त्त ा ओं का ध्यान गया। ' ओरिएण्टलिज्म ' किताब को आलोचना में पैराडाइम बदलने वाली किताब के रूप में जाना जाता है। इस किताब ने आलोचना को बदलने के साथ ही सईद को भी बदला , पहले सईद को मध्य-पूर्व अध्ययन के दायर में रखकर विचार किया जाता था। किंतु इस किताब के प्रकाशन के बाद उन्हें एक नए स्कूल के नाम से जाना जाने लगा जिसे आलोचना में ' उत्तर औपनिवेशिक ' आलोचना कहते हैं।   यह मूलत: उत्तर आधुनिकता के अनेक लक्षणों से युक्त आलोचना स्कूल है। सईद का जन्म फिलीस्तीन में हुआ था , किंतु प...