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स्त्री का स्व और आत्मकथा के मानक

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                 ' स्व ' या ' सेल्फ ' पुंसवादी समीक्षा में आत्मकथा लेखन का बुनियादी आधार है वह कहीं होता नहीं है बनाया जाता है। अर्जित किया जाता है। यह स्वाभाविक नहीं है। स्वाभाविक ' स्व ' वह है जो अंतर्भुक्त है। भरा-पूरा है। इंसान के होने की अनिवार्य शर्त है। आधुनिक अर्थ में ' स्व ' को हासिल करने की कोशिश इस स्वाभाविक स्व से दूर भागने की कोशिश है। यहां तक कि इस स्व की सहज स्वामिनी स्त्री को भी इसके कारण हीनताबोध कराया जाता है। क्योंकि स्त्री के स्व और संसार के बाहरी स्व के बीच बड़ा अंतर होता है। उसके अंतर्भुक्त स्व को स्व की कोटि से ही खारिज कर दिया गया। स्त्री के स्व की अन्यतम विशेषता होती है कि इसमें बहुत स्पेश होता है। अपने से ज्यादा दूसरे के लिए। यह एक किस्म की अंतर्क्रिया है स्वयं , अन्य तथा वास्तविक संसार के बीच।   स्व का निर्माण अंदर मौजूद सहज स्व की मौत है। स्व के निर्माण के क्रम में बाहरी बाधाएं , रुढ़ियां , प्रतिबंध आदि सब काम करते हैं। इनसे टकराते हुए , संघर्ष करते हुए ही इसका निर्माण संभव है। यह संसार के साथ मैं का अंतर्...