अस्िमता विमर्श की संकीर्णताओं से मुक्ति का पाठ
अस्मिता विमर्श की संकीर्णताओं से मुक्ति का पाठ प्रस्तुत विषय पर संवाद का आयोजन करके आपलोगों ने एक मौजू विषय पर ध्यान खींचा है। इसके लिए बधाई के हकदार हैं। समस्या जितनी बोलने में है उससे ज्यादा इसके विमर्श को खोजने में है। हिन्दी में अस्मिताएं ही अस्मिताएं हैं। किंतु विमर्श नहीं है। अस्मिता की सैध्दान्तिकी नहीं है। अस्मिता की आलोचना नहीं है। हमें अस्मिता पर बात करने में मजा आता है। विवाद करने में मजा आता है उसे दूर करने अथवा उसकी वैज्ञानिक व्याख्या तैयार करने में मजा नहीं आता। हम विमर्श के नाम पर विमर्श करने में दिलचस्पी लेते हैं यह तो कुल मिलाकर 'कला कला के लिए' की तरह है। 'विमर्श के नाम पर विमर्श' अथवा ' अस्मिता अस्मिता का खेल' हमारी उसी पुरानी मानसिकता का द्योतक तो नहीं है जिसमें विवाद के विषय वे होते थे जो वास्तव नहीं होते थे अथवा वास्तव सवालों से ध्यान खींचने के लिए उठाए जाते थे। हमारी मुश्किल यह है कि हम अस्मिता की ओट में यथार्थ सवालों से भाग रहे हैं। अस्मिता अथवा पहचान का निर्माण्ा और उसकी प्रक्रियाओं को पूरी जटिलताओं के साथ खोला जाना चाहिए। कहीं सामयिक सा...