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बहिणाबाई चौधरी- मैं अब अपने लिए-

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   बहिणाबाई चौधरी (1880-1905) महाराष्ट्र के जलगाँव जिले की कपास की खेती करनेवाली किसान स्त्री थी। बहिणाबाई की कविताएँ मूलतः किसानी के श्रम के दौरान लिखी गई कविताएँ हैं। भारत के अन्य हिस्सों में स्त्रियों की रचनात्मकता उनके जीवन के कार्यव्यापार के बीच से फूटी है , बहिणाबाई की कविताएँ भी उसी तरह से रची गई हैं। बहिणाबाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं लेकिन जीवन के गाढ़े अनुभव के दर्शन उनके गीतों में बिखरे हैं। मराठी के ओवी छंद में खानदेसी और वर्हाडी बोलियों में बहिनीबाई के गीत मिलते हैं। जो चीज ज्यादा आकर्षित करती है वह है परंपरा और रूढ़ियों के बीच से जगह बनाने की कोशिश। जीवन के प्रति ललक। भाग्य से संघर्ष की इच्छा। इस कविता में एक विधवा स्त्री की तकलीफ और परिस्थितियों से संघर्ष के साथ- साथ जीवन को सुंदर बनाने की इच्छा शामिल है।                                              ...

जिंदगी के विस्तार का लेखन है स्त्री आत्मकथा

   लेखन का एक बड़ा सरोकार है कि वह जिंदगियों को बचाता है। जीवन के प्रति आशा का संचार करता है। स्त्री लेखन की खूबी है कि यह न केवल आशा का संचार करता है बल्कि जीवन का अनुसरण करते हुए जीवन का विस्तार भी करता है। विशेष तौर पर स्त्री आत्मकथा की खूबी है कि यह जीवन का अनुसरण करती है। यह जीवन को विस्तार देनेवाला है। स्त्री जब आत्मकथा लिखती है तो वह अपनी निजी हानियों से उबरने के लिए आत्मकथा लिखती है। वह दया , करुणा आदि भाव को जगाने के लिए नहीं लिखती है। समाज में स्त्रियों की जो नारकीय अवस्था है वह किसी भी चेतनासंपन्न स्त्री को परेशान कर सकता है। ऐसे में स्त्री आत्मकथा कोई ट्रेन्ड सेट करने , वाद चलाने या इतिहास में अमर होने के लिए नहीं होती बल्कि इस नारकीय अवस्था के मूल्यांकन और पड़ताल के लिए होती है। इसमें वह आत्म (सेल्फ) को परिभाषित करने के संघर्ष से गुजरती है।  स्त्री आत्मकथा के इतिहास , भूगोल या परंपरा से मुक्त होने के पीछे कारण यह कि स्त्री वर्त्तमान में रहना चाहती है। इतिहास उसके वश में नहीं , उसकी शक्तियाँ उसके वश में नहीं , वह कभी किसी भी तरह के इतिहास लेखन के केन्द्र में...