भाषा में वर्चस्व निर्माण की प्रक्रिया
अमूमन भा षा का वर्ग या भा षा का स्त्रीबोध या स्त्री-भा षा जैसे पद-बंध सुनते ही ऐसा मालूम पड़ता है कि भा षा के प्रचलित विमर्श के स्थिर जल में कंकड़ फेंक दिया हो। भा षा में वर्ग और स्त्री बोध या स्त्री-भा षा जैसे विभाजन क्यों। भा षा तो बहता नीर है , अनंत है , बह्मतुल्य है उसमें विभेद- वर्गीकरण कैसा ? पर यह वर्गीकरण भा षा के भीतर ही मौजूद था , है। भा षा को वैयाकरणिक प्रणाली से नियमित करने और विज्ञान के पद तक पहुँचाने में वर्चस्व शा ली पुरु ष तबके का हाथ रहा है। इन्होंने भा षा के नियम , विधान सबकुछ अपने को केन्द्र में रखकर तैयार किए। भा षा का वर्ग या मजदूरों या स्त्रियों की भा षा का अर्थ समाज में बोली जानेवाली भा षा (जो कि पुरु ष भा षा है) से एकदम भिन्न कोई भा षा है , ऐसा नहीं है। भा षा वही है जो समाज में प्रचलित है लेकिन उसके श ब्द , रूप आदि में स्त्री का संसार शा मिल होगा जो समस्त स्त्री जाति के अनुभव और चिंतन का संसार होगा। भा षा के विकास में वर्गों की भूमिका होती है लेकिन अलग-अलग वर्गों की अलग-अलग भा षा नहीं होती। रामविलास श र्मा के अनुसार '' भा षा समू...