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कौन सी चीज इतिहास बनाती है और किस पर शर्म करें!

 भारतीय मीडिया खासकर हिन्दी मीडिया में शर्म, अपमान, पराजय, हार, असफलता और रोष की भाषा कब बोली जाती है कभी सोचा है आपने ? केवल खेल की खबरों की रिपोर्टिंग करते समय। जनता के मुद्दे पर नहीं। सरकार की नीतियों की आलोचना करते समय नहीं। विपक्ष की भूमिका और दायित्वों की बात करते समय नहीं। या किसी बड़े सार्वजनिक नुकसान पर नहीं। वहां एक गहरी तटस्थता दिखाई जाती है। मैं आपको आज (11जुलाई2011)प्रसारित होनेवाले टी वी ख़बरों से एक उदाहरण दूं। ये ख़बरें एक ही चैनल की हैं, दो अलग चैनलों की नहीं। ताकि चैनल की नीति, समाचार चयन और भाषा की एक मामूली झलक आपको मिल सके। कल की दो बड़ी ख़बरों में से एक खेल जगत की थी और एक कालका मेल के दुर्घटनाग्रस्त होने की। स्टार न्यूज पर वेस्टइंडीज और भारत के बीच चल रहे टेस्ट मैच सीरिज पर ख़बर थी। ख़बर का सार था कि धोनी की विश्व रैंकिंग में नम्बर वन टीम ने ये सीरिज जीत ली है और कल का टेस्ट ड्रा रहा है। प्रस्तुति की भाषा थी कि धोनी की नम्बर वन टीम ने सातवें रैंक की वेस्टइंडीज की टीम से मैच ड्रा कर लिया। इसकी प्रस्तुति इस प्रकार थी कि भारत में उन लाखों दर्शकों को कितनी शर्म...

औरत को नंगा करके किसे सुख मिलता है ?

अभी उत्तरप्रदेश के सोनभद्र जिले के करहिया गाँव में जागेश्वरी नाम की महिला को डायन बता कर जीभ काट लेने की घटना पर ठीक से चर्चा भी नहीं हुई थी कि पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में एक सोलह साल की नाबालिग लड़की को नंगा करके पूरे गाँव में 'सजा' के तौर पर घुमाने की घटना सामने आई है (इंडिया टी वी 8 अगस्त 2010)। लड़की का कसूर प्यार करना बताया जाता है। पूरे दृश्य में प्रेमी कहीं नहीं फ्रेम में आता। बेबस भागती नंगी लड़की, ढोल -नगाड़े बजाते गाँववाले जिनमें महिलाएँ, पुरूष और बच्चे सभी हैं दिखाई दे रहे हैं , ये सब जंगल में हांका करती शिकारियों की टोल और निरीह पशु का दृश्य तैयार करते हैं। भागती हुई नंगी लड़की को एक पुरूष पकड़कर बदतमीजी कर रहा है तब भी दृश्य में कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दे दे रही। इंडिया टी वी दावा कर रहा है कि उसकी ख़बर का असर हुआ है और कुछ लोगों, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्त्ताओं को वीडियो फुटेज दिखाकर बाइट लेने की कोशिश कर रहा है। वे नेता जो वामपंथी रूझान के हैं सिर्फ ख़बर सुनकर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहते और वे नेता जिनका वामपंथ से बैर है , जो वाम को कोसने का कोई भी मौका न...

शिष्ट भाषा के चालू मुहावरे

    स्त्री के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक भेद-भाव का बड़ा क्षेत्र भाषा है। आम तौर पर स्त्री के साथ किए गए और किए जा रहे अन्याय और चालाकियों को उजागर करते हुए विद्वानों ने लोकोक्तियाँ, मुहावरों और गालियों का उदाहरण दिया है। यानि स्त्री के साथ किए जा रहे या हुए सामाजिक-सांस्कृतिक भेद-भाव का सबसे मूर्त उदाहरण लोकभाषा को बतलाया है। यह बहुत बड़ी चालाकी है। लोकभाषा की तरफ उंगली उठाने के पहले यह नहीं भूलना चाहिए कि लोक में प्रचलित विश्वास और मान्यताओं की पुष्टि प्रदान करनेवाला और वैध ठहरानेवाला शिष्ट समाज ही होता है। सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया में शिष्ट समाज के थोथे नियमों को इस प्रक्रिया में शामिल जाति और समुदाय अपना लेते हैं।   स्त्रियों के लिए भाषिक अपमान के सारे मुहावरे लोक में खोजकर निर्णय सुनाना ग़लत है। हिन्दी के शिष्ट बुद्धिजीवियों ने लोक से जुडने का बड़ा दम भरा है। उन्हीं से पूछा जाना चाहिए कि लोक की यह बीमारी भी उनके यहाँ है क्या ?क्या शिष्ट साहित्य में बिना सीधे-सीधे गाली दिए स्त्रियों के लिए हीनतामूलक संदर्भों का निर्माण नहीं किया गया ?जब रामचन्द्र शुक्ल रीतिक...

भाषा में वर्चस्व निर्माण की प्रक्रिया

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अमूमन भा षा का वर्ग या भा षा का स्त्रीबोध या स्त्री-भा षा जैसे पद-बंध सुनते ही ऐसा मालूम पड़ता है कि भा षा के प्रचलित विमर्श  के स्थिर जल में कंकड़ फेंक दिया हो। भा षा में वर्ग और स्त्री बोध या स्त्री-भा षा जैसे विभाजन क्यों। भा षा तो बहता नीर है , अनंत है , बह्मतुल्य है उसमें विभेद- वर्गीकरण कैसा ? पर यह वर्गीकरण भा षा के भीतर ही मौजूद था , है। भा षा को वैयाकरणिक प्रणाली से नियमित करने और विज्ञान के पद तक पहुँचाने में वर्चस्व शा ली पुरु ष तबके का हाथ रहा है। इन्होंने भा षा के नियम , विधान सबकुछ अपने को केन्द्र में रखकर तैयार किए। भा षा का वर्ग या मजदूरों या स्त्रियों की भा षा का अर्थ समाज में बोली जानेवाली भा षा (जो कि पुरु ष भा षा है) से एकदम भिन्न कोई भा षा है , ऐसा नहीं है। भा षा वही है जो समाज में प्रचलित है लेकिन उसके श ब्द , रूप आदि में स्त्री का संसार शा मिल होगा जो समस्त स्त्री जाति के अनुभव और चिंतन का संसार होगा।  भा षा के विकास में वर्गों की भूमिका होती है लेकिन अलग-अलग वर्गों की अलग-अलग भा षा नहीं होती। रामविलास श र्मा के अनुसार '' भा षा समू...

भाषा में वर्गहीनता और लिंगविहीनता का छद्म

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भा षा का प्रयोग और भा षि क संकल्पनाएं वर्गाधारित रही हैं। भा षा को लेकर जितनी भी धारणाएं है उन सबमें एक आम राय है कि भा षा निरपेक्ष नहीं होती। बोलना कभी भी निरपेक्ष नहीं रहा है। भा षि क व्यवहार उदासीनता का व्यवहार नहीं हुआ करता न   ही भाषा केवल सम्प्रे ष ण का माध्यम है। भा षा की भूमिका इससे कहीं बड़ी है। भा षा वर्चस्व के संबंधों के सम्प्रे ष ण का भी माध्यम है। ये वर्चस्व के संबंध वर्ग , लिंग , नस्ल , रा ष्ट्र आदि कई स्तरों पर अभिव्यक्त होते हैं। इसी कारण वि श्व की प्रत्येक भा षा में साहित्य के आरंभिक झगड़े भा षा के झगड़े हैं। और ऐसा भी नहीं है कि ये झगड़े अंतिम नि ष्कर्ष पर पहुँच चुके हों बल्कि किसी भी नए विचार के संदर्भ में भा षा का विवाद उठ खड़ा होता है। वह विचार साहित्यिक हो , सांस्कृतिक या राजनीतिक सभी का निपटारा भा षा के अंतर्गत होता है।     भाषा को लेकर मार्क्स की धारणा है कि भाषा अधिरचना का हिस्सा होती है। उसमें परिवर्तन तब होता है जब आधार में परिवर्तन होता है। आधार की तुलना में यह परिवर्तन धीमी गति से होता है। भाषा में वर्ग का सवाल तब महत्वपूर्ण...